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नई नवेली : यह इस साल की अब तक की सबसे बकवास फ़िल्म है!

Poster for an Indian film showing two women in traditional attire, top smiling in red, bottom serious in pink, with the gold title 'NAYYI NAVELLI DAYAN AAYI' in the center.

डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी-

Film Nayyi Navelli : गलती से भी ये ‘मिश्टेक’ मत करना ….. कोई मुफ़्त टिकट दे, तो भी मत जाना। साथ में पॉपकॉर्न और समोसे का लालच दे, तो भी मत जाना। एक दिन की मज़दूरी देने का वादा करे, तो भी मत जाना। Iphone18 PRO गिफ्ट देने का लालच दे, तो भी मत जाना!

फ़िल्म में दशहरे के पहले दीपावली दिखाई गई है। रहस्य, अलौकिक शक्तियों, हास्य और रोमांचक घटनाओं से भरी इस फ़िल्म में थर्ड क्लास वीएफ़एक्स हैं। भारतीय लोककथाओं और पौराणिक संदर्भों का आपराधिक और हास्यास्पद इस्तेमाल किया गया है। ।

राम, हनुमान, हनुमान चालीसा, शिव स्तोत्र, भूत, डायन, हॉरर, कॉमेडी और रामायण का ऐसा अटपटा घालमेल है कि न डर पैदा होता है, न हँसी आती है। धार्मिक प्रतीकों का सतही इस्तेमाल फ़िल्म की कमज़ोरियों को और उजागर करता है।

दर्शक डायन, परिवार और अलौकिक रहस्य की कहानी देखने बैठते हैं, लेकिन फ़िल्म आगे चलकर रामायण, रावण और पौराणिक शक्तियों की लड़ाई में उलझ जाती है। शुरुआती हिस्से में बहू पर शक, परिवार की नोकझोंक और रहस्य दर्शकों को बाँधे रखते हैं, लेकिन दूसरे हिस्से में कहानी का फ़ोकस बदल जाता है। फ़िल्म अपनी मूल अवधारणा से भटकती चली जाती है।

इससे अच्छी तो कस्बों की रामलीलाएँ होती हैं! पौराणिक संदर्भ कथानक में ऊपर से जोड़े हुए लगते हैं। शायद सोच यह रही होगी कि दशहरे के आसपास फ़िल्म रिलीज़ हो रही है, तो राम-रावण की कहानी भी जोड़ दो। जोड़ दिया, यहाँ तक भी ठीक था, लेकिन फ़िल्म में इसे इतना नाटकीय बना दिया गया है कि पूरा प्रसंग प्रभावहीन और उबाऊ हो जाता है। पुराने किस्म के चुटकुले और कमज़ोर डरावने दृश्य जोड़ देने भर से कोई अच्छी हॉरर-कॉमेडी नहीं बन जाती।

नई नवेली बहू को घर सँभालने की ज़िम्मेदारी दी गई थी, लेकिन फ़िल्म ने उसके सिर पर पूरा रामायणकाल ही लाद दिया! न बहू का रहस्य ठीक से खुलता है, न हॉरर का असर जमता है और न कॉमेडी दर्शकों को हँसा पाती है। नतीजतन, मनोरंजन की उम्मीद लेकर सिनेमाघर पहुँचा दर्शक अंत में ख़ुद को ठगा हुआ महसूस करता है। इसके निर्देशक हैं बालाजी मोहन और मुख्य कलाकारओं में यामी गौतम धर, आदिनाथ कोठारे, आदित्य कुलश्रेष्ठ, सुनीता राजवर और मीता वशिष्ठ आदि हैं। निर्माता हैं आनंद एल. राय और हिमांशु शर्मा

भिया, बॉलीवुड में जब कोई एक फ़ॉर्मूला चल निकलता है, तो हमारे फ़िल्ममेकर उसकी ऐसी लकीर पीटते हैं कि दर्शक सिर पकड़ ले। ‘स्त्री’ और ‘मुंज्या’ की कामयाबी के बाद अब हर किसी को हॉरर-कॉमेडी की हाँडी में अपनी दाल पकानी है। जब ‘नई नवेली’ का ढोल पीटा गया, तो लगा था कि दशहरे की छुट्टी में कोई कुरकुरा मनोरंजन मिलेगा। मगर सिनेमाघर से बाहर निकलते वक्त यही ख़याल आता है कि ‘नवेली’ तो ठीक है, पर इसमें ‘नया’ कुछ भी नहीं है!

फ़िल्म की सबसे बड़ी कमज़ोरी इसकी लचर पटकथा है। हॉरर के नाम पर वही पुराने, घिसे-पिटे फ़ॉर्मूले हैं। वीएफ़एक्स कई जगह इतने कच्चे लगते हैं कि तरस आता है। मध्यांतर के बाद तो रफ़्तार इतनी सुस्त पड़ जाती है कि लगता है, डायरेक्टर साब ये ही भूल गए हैं कि क्लाइमैक्स को किस दिशा में ले जाना था। यामी गौतम मोहिनी के रोल में वह थोड़ी असहज और सपाट लगी हैं।

जी. वी. प्रकाश कुमार का संगीत ढेंचू है। ‘भाभी तबाही’ और ‘फटा पटाखा’ जैसे गाने जबरन ठूँसे लगते हैं और कहानी के बहाव में रोड़ा अटकाते हैं। पूरी फिल्म दर्शक के धीरज की परीक्षा लेती है। आप सिनेमा देखने जा रहा हैं या अपनी सहनशक्ति की परीक्षा देने ?

अझेलनीय फिल्म है रे बाबा।

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