दयाशंकर शुक्ला सागर-
“एक दिन हम सबको मरना है”
17-18 अक्टूबर की दरमियानी रात दिल दहला देने वाले दो हादसे हुए। एक दक्षिण अमेरिका के ग्वायाकिल शहर में और दूसरी भारत के ग्वालियर शहर में। दक्षिण अमेरिका में एक फादर चर्च में मौजूद श्रद्धालुओं को जीवन की नश्वरता और मृत्यु की सच्चाई पर उपदेश दे रहे थे कि “एक दिन हम सबको मरना है” और तभी ठीक उसी पल, उनके पीछे मुख्य दीवार पर टंगा विशाल और भारी लकड़ी का क्रॉस ईसा मसीह की मूर्ति सहित अचानक दीवार से उखड़ गया और फादर के सिर पर जा गिरा और उनकी मौत हो गई।

दूसरा हादसा उसी रात मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले के एक 125 साल पुराने प्रसिद्ध शीतला माता मंदिर के पास की दरमियानी रात को घटित हुआ है। शारदीय नवरात्रि के अवसर पर देवी दर्शन के लिए उमड़ी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ पर धान से लदा एक बेकाबू ट्रक चढ़ गया, जिसमें 15 लोगों की कुचल कर मौत हो गई और 26 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। हादसा यूं हुआ कि ढलान पर आने के बाद ट्रक के अचानक ब्रेक फेल हो गए और ट्रक पूरी तरह से ड्राइवर के नियंत्रण से बाहर हो गया।
इधर देश में ईश्वर को लेकर एक बेमानी-सी बहस चल पड़ी है कि ईश्वर है या नहीं है? मैं इस बहस को बेमानी इसलिए कह रहा हूं कि अपनी रिसर्च में मैंने पाया कि ईश्वर के होने या न होने से इस दुनिया या इस ब्रह्मांड पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। ईश्वर अगर है भी तो वह किसी काम का नहीं क्योंकि किसी भी तरह के मानवीय या गैर मानवीय काम में उसकी कोई दिलचस्पी है। वह दुनियावी कार्यों में दखल नहीं देता। नहीं तो वह क्रास को पादरी के सिर पर गिरने से तो रोक ही सकता था। पादरी को मारने के कई तरीके हैं उसके पास। यह तरीका तो ईश्वर के प्रति विश्वास को हिला देता है। फिर भी उसने यही तरीका चुना। ईश्वर अगर दुनियावी कामों में दखल देता तो ट्रक की ब्रेक कम से कम उस ढलान पर फेल नहीं होती, जहां सैकड़ों श्रद्धालु शीतला माता के दर्शन के लिए फूल मालाएं खरीद रहे थे।
तो मनुष्य का जीवन बस इत्तेफाक पर चल रहा है। आप कहेंगे इस इत्तेफाक या संयोग को भी ईश्वर संचालित कर रहा है तो आप फिर कभी न खत्म होने वाले सवालों के फेर में पड़ जाएंगे जिनका कोई उत्तर किसी के पास नहीं है। इसीलिए ईश्वरवादी अंत में कंटिंजेंसी के तर्क पर उतर आते हैं। यानी कि ऐसी कोई सत्ता होनी चाहिए जो अपना कारण खुद हो या बिना कारण के हो।
कंटिंजेंसी तर्क कहता है कि अगर कोई निर्मित चीज या कहें कि नम्बर एक चीज है तो उसको बनाने वाला नम्बर दो होगा, आप पूछेंगे कि नंबर दो को किसने बनाया तो जवाब आयेगा कि नम्बर तीन ने बनाया, फिर पूछिये कि नंबर तीन को किसने बनाया तो जवाब आयेगा कि नम्बर चार ने बनाया। इस तरह ये अनंत तक जाएगा। तो ये बेकार की बहस है जिसका उत्तर आपको कभी नहीं मिलेगा।
दर्शन और आध्यात्म की किताबों में ईश्वर होने की तीन शर्तें हैं-ईश्वर अगर कोई है और वह न्यायपूर्ण और करुणवान है और सर्वशक्तिशाली है। लेकिन वास्तविक दुनिया में जहां इतनी गरीबी भुकमरी है, बेइंसाफी है, दर्द है दुख है, चालबाजियां हैं, मुझे तो ईश्वर कहीं न्यायपूर्ण और करुणवान नहीं दिखा। हां, सर्वशक्तिशाली हो सकता है पर उसके सर्वशक्तिशाली होने का क्या फायदा जो वह अपने बंदों की ही मदद न कर पाए।
पोस्ट पर आई कुछ चुनिंदा प्रतिक्रियाएं भी पढ़िए…
अश्विनी कुमार त्रिवेदी-
माफी चाहता हूं सर…
मेरा अनुभव है कि ईश्वर है। चूंकि मैं मानता हूं कि ईश्वर है तो यह भी मानता हूं कि प्रारब्ध भी जरूर होता होगा। प्रारब्ध से कोई नहीं बच पाया। स्वयं ईश्वर भी। हम इंसान जाने और अनजाने में न जाने कितने अपराध करते हैं। कभी हिसाब तक नहीं लगाते। जो अपराध देश की न्याय व्यवस्था में परिभाषित हैं, उनमें तो सजा मिल जाती है या सुधार का अवसर मिल जाता है। लेकिन, कुछ अपराध ऐसे होते हैं, जो हम मानते ही नहीं कि यह भी अपराध है। उनकी सजा प्रारब्ध के रूप में मिलती है। जो लोग भूखे मर रहे, मुफलिसी में जी रहे, हो सकता है, उन्होंने कभी किसी जन्म में ऐसा अपराध किया हो, जिसकी सजा बाकी हो तो वह सजा भुगत रहे हैं। इस दुनिया में निरपराध शायद ही कोई हो। हम भूल जाते हैं। लोग भूल जाते हैं। लेकिन, समय सब याद रखता है!
सादर
सविता मिश्रा-
ईश्वर है या नहीं ये हम अपने लाभ और हानि के अनुसार तय कर लेते है मेरे पति की मृत्यु हुई तो ईश्वर से विश्वास उठ गया किवाओ मेरे छोटे छोटे बच्चों के साथ अन्याय नहीं कर सकता विवाह ही नहीं जो होना है हो के रहेगा। वही जब ब्रेन हैमरेज में नई कोमा में रही डॉक्टर्स ने लगभग मृत घोषित कर ही दिया बेटे ने पूरी रात दिया जलाकर महा मृत्युंजय मंत्र का जाप किया। और मुझे सुबह ही जोश आ गया। डॉक्टर्स नवीस मिरेकल कहा।
बेटे को शिव पर अटूट विश्वास हो गया। जो कि आज कल के विज्ञान का क्षेत्र है। इंजिनियर है। जो को ईश्वर और मेरी पूजा का हरदम तर्क दे कर मजाक उड़ाया था। मैं भी अब असमंजस में ही की क्या मनु जीवन की दो बड़ी घटनाएं हुई एक में विश्वास डगमगाया एक में अटूट विश्वास जागा आपका लेख कई लोगों के जीवन में सोचने में मजबूर कर देगा पर सही निर्णय तो आओ भी न दे पाए लेख में। कुछ तो निष्कर्ष निकलते दया जी।
आशीष मिश्रा-
इधर हाल में ऐसी बहुत घटनाएं हुई है कि व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह ईश्वर की पूजा में लीन है और अचानक दुर्घटना घटी और लोग बड़ी संख्या में काल कवलित हो गए, या ऐसी घटनाएं हुई कि लगा भगवान कहां है ऐसा कैसे हो गया, लोग अक्सर अपनी आस्तिकता में बहुत लापरवाह हो जाते है भगवान में इतने आश्रित हो जाते है कि वो मान लेते है अगर वो देवस्थल पर है तो उनके साथ कुछ नकारात्मक अनहोनी हो ही नहीं सकती जबकि वो सब कोई सकारात्मक चमत्कार की अपेक्षा में ही वहां जाते है, भगवान को इंसान ने अपनी बुद्धि ज्ञान से जितना समझा वैसा रूप हर धर्म में दिया पर वास्तव में वो किस रूप में है यह भगवान या उनके जैसा कोई परम विराट महातत्व ही जानता होगा पर पर वो एक अद्भुत ऊर्जा है जो ब्रह्मांड को संचालित किए है बगैर किसी भेदभाव या भाव के इसमें उसके होने या न होने के अहसास में हम भटक जरूर सकते है पर किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकते ,पादरी को एक दिन मरना ही था पर वो ऐसी मौत पाए जिसे आप मोक्ष भी कह सकते है या प्रभु यीशु का कोप भी यही मथुरा में यमुना में हरे कृष्ण कीर्तन करने वाले भक्तों की मौत पर या मध्य प्रदेश में बेकाबू ट्रक की चपेट में आने वाले या इसके पूर्व कुम्भ मेले आदि स्थलों पर भगदड़ में मरने वालों के लिए भी आप दोनों दृष्टि रखकर भगवान को होने या नकारने दोनों पर अपनी राय बना सकते हो।

