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उत्तर प्रदेश

वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक उपाध्याय केस में सुप्रीम सख्ती, गाजियाबाद पुलिस का नोटिस रद्द!

अभिषेक उपाध्याय को गिरफ्तारी और सख्त कार्रवाई से राहत, पुलिस के जवाब पर उठाए सवाल; सुप्रीम कोर्ट ने कहा- जांच के नाम पर किसी की निजी जानकारी की छानबीन नहीं होनी चाहिए…

नई दिल्ली/गाजियाबाद- राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी से जुड़ी खबरें प्रकाशित करने वाले पत्रकार अभिषेक उपाध्याय को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। अदालत ने गाजियाबाद पुलिस की ओर से सोशल मीडिया मंच एक्स (X) को भेजा गया वह नोटिस रद्द कर दिया है, जिसके जरिए पत्रकार का 1 जून 2026 से डिजिटल डेटा मांगा गया था। अदालत ने पुलिस आयुक्त के स्पष्टीकरण पर सवाल उठाते हुए कहा कि 18 अगस्त की कथित रोड रेज की घटना की जांच के लिए 1 जून से डिजिटल जानकारी मांगना जरूरत से ज्यादा व्यापक कार्रवाई थी।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने 14 अक्टूबर को अभिषेक उपाध्याय को गिरफ्तारी और अन्य दंडात्मक कार्रवाई से मिली अंतरिम सुरक्षा को भी अंतिम आदेश तक जारी रखने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि 22 अगस्त से पहले की अवधि की कोई भी जुटाई गई जानकारी पत्रकार के खिलाफ इस्तेमाल नहीं की जाएगी। पुलिस को उनकी गाड़ी भी दो दिन के भीतर छोड़ने का निर्देश दिया गया।

पुलिस के जवाब में विरोधाभास, सुप्रीम कोर्ट ने उठाया सवाल

अभिषेक उपाध्याय ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि गाजियाबाद पुलिस आयुक्त की ओर से दाखिल हलफनामे में बताया गया कि एक्स से उनका डिजिटल डेटा इसलिए मांगा गया था, ताकि उन्हें खोजा जा सके और मामले की जांच आगे बढ़ाई जा सके।

लेकिन पत्रकार का सवाल है कि जब पुलिस 20, 21 और 22 अगस्त को उनकी तलाश में छापेमारी कर रही थी, तो फिर 1 जून से डिजिटल डेटा मांगने की जरूरत क्यों पड़ी? जिस अवधि का डेटा मांगा गया, उसी दौरान उन्होंने अयोध्या स्थित राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी को लेकर अपनी खबरों की शृंखला प्रकाशित की थी।

सुप्रीम कोर्ट ने भी इस समयावधि पर सवाल उठाया। अदालत ने कहा कि 18 अगस्त को हुई कथित रोड रेज की घटना के सिलसिले में 1 जून से 22 अगस्त तक का डिजिटल डेटा मांगना जरूरत से ज्यादा व्यापक कदम प्रतीत होता है। अदालत ने पुलिस के नोटिस को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि जांच के लिए निजी जानकारी मांगने की शक्ति का इस्तेमाल भी उचित और आनुपातिक तरीके से होना चाहिए।

राम मंदिर की खबरों के स्रोत तक पहुंचने की आशंका

अभिषेक उपाध्याय ने जून 2026 में राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी से जुड़े मामले पर खबरों की एक शृंखला प्रकाशित की थी। उनका कहना है कि इसी दौरान उन्हें मामले से जुड़े इनपुट मिले थे और 7 जून को उन्होंने इस खबर को सार्वजनिक किया। इसके बाद उन्होंने इस मामले से जुड़े कई गवाहों के बयान भी सामने रखे।

पत्रकार के मुताबिक, उनकी खबरों के आधार पर विशेष जांच दल (एसआईटी) ने भी कुछ लोगों से संपर्क किया और उन्हें आरोपपत्र में गवाह बनाया। ऐसे में एक्स से मांगे गए डिजिटल डेटा के जरिए उनके पत्रकारिता संबंधी संपर्कों और खबरों के स्रोतों की पहचान उजागर होने की आशंका थी।

अभिषेक उपाध्याय ने सवाल उठाया है कि आखिर पुलिस को यह पता लगाने की जरूरत क्यों पड़ी कि राम मंदिर से जुड़ी खबरों के लिए उन्हें जानकारी किसने दी थी। हालांकि, पुलिस ने अदालत में डेटा मांगने का उद्देश्य पत्रकार को तलाशना और जांच आगे बढ़ाना बताया था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में जून में प्रकाशित राम मंदिर से संबंधित खबरों की शृंखला का उल्लेख किया, लेकिन पुलिस की मंशा को लेकर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया।

गिरफ्तारी पर रोक, डेटा इस्तेमाल करने पर भी पाबंदी

सुप्रीम कोर्ट ने अभिषेक उपाध्याय को मिली अंतरिम सुरक्षा को जारी रखते हुए उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि 22 अगस्त से पहले की अवधि में जुटाई गई जानकारी का इस्तेमाल उनके खिलाफ नहीं किया जाएगा।

पीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति की निजी जानकारी हासिल करने के लिए जांच एजेंसियों को यह दिखाना होगा कि मांगी गई जानकारी जांच के लिहाज से जरूरी और उचित है। यदि जांच के दूसरे तरीके उपलब्ध हों और वे अपर्याप्त साबित न हुए हों, तो व्यापक डिजिटल जानकारी मांगने को उचित नहीं ठहराया जा सकता।

अदालत ने इस मामले में पत्रकारों के काम पर पड़ने वाले संभावित असर को भी रेखांकित किया। उसने कहा कि जांच के नाम पर किसी व्यक्ति की निजी जानकारी की असीमित छानबीन नहीं होनी चाहिए। पुलिस को पूरी छूट देने से खोजी पत्रकारिता के अधिकार भी प्रभावित हो सकते हैं। अदालत ने निजी डेटा की गोपनीयता सुरक्षित रखने के लिए दिशानिर्देशों की जरूरत पर भी टिप्पणी की।

रोड रेज के मामले में दर्ज हुई थी एफआईआर

अभिषेक उपाध्याय के खिलाफ गाजियाबाद के इंदिरापुरम थाने में 18 अगस्त 2026 की कथित रोड रेज की घटना को लेकर एफआईआर दर्ज की गई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि उनकी कार एक मोटरसाइकिल से टकराई और इसके बाद उन्होंने शिकायतकर्ता के साथ गाली-गलौज की तथा जातिसूचक टिप्पणी की।

पत्रकार ने इन आरोपों से इनकार किया और दावा किया कि उनके खिलाफ दर्ज मामला राम मंदिर से जुड़ी उनकी खोजी खबरों के कारण उन्हें निशाना बनाने की कार्रवाई है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में एफआईआर को चुनौती दी और गिरफ्तारी से सुरक्षा मांगी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें संबंधित उच्च न्यायालय में एफआईआर रद्द कराने की मांग उठाने की अनुमति दी है। अदालत ने मामले के आरोपों के गुण-दोष पर कोई अंतिम राय नहीं दी है। इसलिए एफआईआर में लगाए गए आरोप और पत्रकार की ओर से लगाए गए प्रतिशोध के आरोप, दोनों अभी अपनी-अपनी कानूनी प्रक्रिया के अधीन हैं।

अभिषेक उपाध्याय ने कहा- सत्य के साथ खड़ा रहूंगा

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अभिषेक उपाध्याय ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अदालत ने पुलिस आयुक्त के स्पष्टीकरण में विरोधाभास की ओर ध्यान दिलाया है। उन्होंने इस बात पर सवाल उठाया कि कथित रोड रेज की घटना अगस्त में हुई, लेकिन पुलिस जून से डिजिटल डेटा क्यों मांग रही थी।

उन्होंने अपने पोस्ट में राम मंदिर से जुड़ी खबरों और उन खबरों के लिए मिले इनपुट का जिक्र करते हुए कहा कि पत्रकारिता के स्रोतों की पहचान उजागर होने का खतरा था। उन्होंने अपने गुरुदेव आचार्य श्रीराम शर्मा के आशीर्वाद का उल्लेख करते हुए कहा कि अन्याय के बीच भी उनका मनोबल बना रहेगा।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश इस मामले में निजी डिजिटल डेटा की मांग पर महत्वपूर्ण सवाल उठाता है। यह भी स्पष्ट करता है कि किसी आपराधिक जांच में पुलिस की शक्तियों का इस्तेमाल नागरिकों की निजता और खोजी पत्रकारिता के अधिकारों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

नोटिस रद्दीकरण का आदेश…

Page from the Supreme Court of India with bright green highlight showing petition details and dates (informational image).
Page from an official document with sections 11–13, the text highlighted in bright green across multiple lines.
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