अभिषेक उपाध्याय-
कुछ रिश्ते आपके जीवन भर की पूंजी होते हैं। वे जीवन के कांटों की बाड़ में किसी गुलमोहर सा खिलते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड अनूप अवस्थी से मेरा ऐसा ही रिश्ता है। साल 2002 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के लॉ एंट्रेंस एग्ज़ाम में हुई धांधली के ख़िलाफ़ मेरा आमरण अनशन हो, या राम मंदिर की रिपोर्टिंग पर सुप्रीम कोर्ट के दरवाज़े तक पहुँची क़ानूनी लड़ाई हो, अनूप का साथ हर मुश्किल परिस्थितियों में किसी साए की तरह बना रहा।
ये साल 2002 के जुलाई महीने के हिंदुस्तान अखबार के इलाहाबाद एडिशन की पेपर कटिंग है।

मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय के VC दफ़्तर के आगे आमरण अनशन पर लेटा हूँ, और एडवोकेट अनूप तनकर मेरे बगल में बैठा है।
वो साल 2002 था, ये साल 2026 है। तब भी हम जीते थे, अब भी हम जीते हैं।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इतिहास में पहली बार लॉ एंट्रेंस का पूरा रिज़ल्ट बदला गया। विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपनी गलती स्वीकार की। ये भी उस दौर के अख़बारों ने छापा था।


इस दौरान विश्वविद्यालय प्रशासन से बातचीत करने से लेकर, रोज़ अनशन तुड़वाने के लिए आती पुलिस से भिड़ना, उलझना, ये सब अनूप के ही जिम्मे था।
न अनशन टूटने दिया, न एक भी मांग पर हमें झुकने दिया। आखिर में जो नतीजा आया, वो इतिहास बना।
राम मंदिर के खुलासे से चिढ़ी सरकार ने मुझे अरेस्ट करने की खातिर दिल्ली में जो छापा मारा, वो अनूप के ही ठिकाने पर मुझे ढूँढने की खातिर मारा। पर ये नियति का चक्र था कि वे मेरी तलाश में अनूप के घर घुसने के बजाए दिल्ली के पूर्व मेयर फरहाद सूरी के घर घुस गए।
इधर पुलिस मुझे अरेस्ट करने की खातिर यूपी से लेकर दिल्ली तक छापे मार रही थी, और उधर अनूप रात रात भर जागकर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल करने के लिए पिटीशन तैयार कर रहा था।
ये बेहद ही तनाव भरे दिन थे पर हमने उम्मीद की आखिरी लौ तक लड़ने का इरादा किया था।
अनूप के साथ उसकी पूरी टीम इस पिटीशन की खातिर दिन रात लगी हुई थी क्योंकि गिरफ़्तारी की आशंका चारों ओर दस्तक दे रही थी।
इस तस्वीर में अनूप के ठीक बगल में दिख रही जसलीन रात भर पिटीशन की ऑनलाइन ड्राफ्टिंग में मदद करती रही। जसलीन की इस मदद के बगैर ये काम किसी पहाड़ सरीखा था।
मेरे दाहिनी तरफ खड़ा शुभम पिटीशन की लिस्टिंग के किस कदर जी जान से जुटा रहा, इसे बयां करना मेरे लिए शब्दों से परे है।
जसलीन और शुभम दोनों ही अनूप के मार्गदर्शन में मेरी खातिर एक अनकहा युद्ध सा लड़ रहे थे।
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के चेयरमैन प्रदीप राय मेरे एक आग्रह पर जिस मज़बूती से साथ खड़े हुए, वो अकल्पनीय है।
सुप्रीम कोर्ट में उनके तर्कों ने सिर्फ मेरा ही नहीं, बल्कि न जाने कितने पत्रकारों का कलम के बूते पर लड़ते रहना आसान किया और ऐतिहासिक जीत दिलाई।
मेरी कविताओं की पहली किताब है- ‘राधिके विद्रोह कर दो’ जिसे संजना बुक्स ने छापा है। इसका शीर्षक भी अनूप ने ही दिया है। इस किताब की ‘शीर्षक’ कविता है-
“चुप्पियों की कनपटी पर
एक रोज़ पिस्तौल रख दो,
और यूँ गोली चलाओ,
शहर भर में शोर कर दो!
राधिके विद्रोह कर दो।”
अनूप जैसा एक दोस्त आपकी किस्मत में हो, तो आप चुप्पियों की कनपटी पर अभिव्यक्ति की पिस्तौल के सारे राउंड ख़ाली कर देंगे।
कुछ रिश्तों का यही हासिल होता है। हर डगमगाती कश्ती का कोई साहिल होता है।
सुप्रीम कोर्ट में अभिषेक उपाध्याय का केस लड़ने वाले एडवोकेट अनूप अवस्थी को जानिए
अनूप प्रकाश अवस्थी उत्तर प्रदेश के बहराइच के मूल निवासी हैं। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर तथा दिल्ली विश्वविद्यालय से विधि स्नातक (LL.B.) की उपाधि प्राप्त की है। उन्होंने जर्मनी की थियोडोर ह्यूस अकादमी, गुमर्सबाख में Coalition Building and Strategic Partnership विषय पर प्रशिक्षण प्राप्त किया है।
वे वर्ष 2010 से विधि व्यवसाय में सक्रिय हैं और वर्ष 2017 से भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (AOR) के रूप में कार्यरत हैं। नई दिल्ली के कनॉट प्लेस में उनका कार्यालय स्थित है। उनकी विधिक प्रैक्टिस मुख्यतः आपराधिक एवं कॉरपोरेट कानून के क्षेत्रों में केंद्रित है। उन्होंने अनेक जनहित याचिकाओं (PILs) के माध्यम से महत्वपूर्ण सार्वजनिक मुद्दों को न्यायालय के समक्ष उठाया है, जिनमें चर्चित विकास दुबे एनकाउंटर मामला भी शामिल है।
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