भड़ास4मीडिया : हरियाणा के कुरुक्षेत्र में दर्ज वीडियो प्रसारण और वसूली के मामले में लिविंग इंडिया न्यूज़ चैनल के मालिक अतुल अग्रवाल समेत छह पत्रकारों को अदालत से जमानत मिल गई है। कुरुक्षेत्र की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) डॉ. मोहिनी की अदालत ने 15 अक्टूबर 2026 को अतुल अग्रवाल, चैनल के एडिटर सौरभ उपाध्याय, इंटर्न रिपोर्टर सुदेश नैन, ड्राइवर लवप्रीत और नीतू की नियमित जमानत अर्जियां मंजूर कर लीं। चैनल में अकाउंट/डायरेक्टर के तौर पर काम करने वाले मनीष अग्रवाल ने जमानत अर्जी नहीं लगाई थी, फिर भी अदालत ने उन्हें जमानत का लाभ दिया, क्योंकि उनके खिलाफ लगी सभी धाराएं जमानती हैं।
अदालत ने पुलिस की वह अर्जी भी खारिज कर दी, जिसमें अतुल अग्रवाल की आठ दिन की और रिमांड तथा मनीष अग्रवाल की आठ दिन की नई पुलिस रिमांड मांगी गई थी।
यह मामला थाना थानेसर सिटी (कुरुक्षेत्र) में 10 अक्टूबर 2026 को दर्ज FIR नंबर 235 से जुड़ा है। FIR भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 308(6), 336(4), 338, 339 और 351(2) तथा IT एक्ट के तहत दर्ज की गई थी। जांच के दौरान इसमें साजिश की धारा 61(2) BNS जोड़ी गई और IT एक्ट की धारा 66E की जगह धारा 65 व 66 लगाई गईं।
शिकायतकर्ता नवीन सैनी कुरुक्षेत्र में कार सेल्समैन हैं। उनकी शिकायत के मुताबिक, उनका दोस्त गौरव उनसे कुछ समय से किसी को नशा करते हुए दिखाने वाला वीडियो मांग रहा था और इसके बदले पैसे मिलने की बात कह रहा था। नवीन ने अप्रैल और मई 2026 में अपने दोस्तों के साथ कैलाश नगर की गली नंबर 8 में नशेड़ी होने का अभिनय करते हुए वीडियो बनाए। उन्होंने ये वीडियो 4 अक्टूबर 2026 को व्हाट्सऐप पर गौरव को भेज दिए। कुछ दिन बाद उनके दोस्तों ने उन्हें एक न्यूज़ रिपोर्ट भेजी, जिसमें उनका यही अभिनय दिखाया गया था।
शिकायत में आगे कहा गया है कि गौरव ने नीतू से वीडियो बनाने के पैसे मांगे। गौरव ने नीतू से यह भी कहा कि अभिनय वाला वीडियो उन्होंने ही बनवाने को कहा था, लेकिन उसे असली घटना बताकर प्रसारित कर दिया गया, जिससे पूरे शहर में उनकी बदनामी हुई। आरोप है कि इस पर नीतू ने वीडियो हटाने के बदले 20 लाख रुपये मांगे और रकम न देने पर रेप के झूठे केस तथा दूसरे मामलों में फंसाने की धमकी दी। शिकायत के अनुसार नीतू ने यह भी कहा कि उन्होंने चैनल मालिक अतुल अग्रवाल से बात कर ली है और आधी रकम उन्हें देनी होगी। साथ ही उन्होंने धमकी दी कि सच बताने पर उनका “बॉस” उन्हें मरवा देगा।
ये सभी आरोप शिकायतकर्ता और अभियोजन पक्ष के हैं। अदालत ने इन पर कोई अंतिम राय नहीं दी है।
सहायक लोक अभियोजक अभिनव बंसल ने जमानत का विरोध किया। उन्होंने कहा कि वसूली की धारा 308(6) में 10 साल तक की सजा हो सकती है। अभियोजन के मुताबिक आरोपियों ने साजिश के तहत अभिनय वाले वीडियो को असली बताकर चलाया और उन्हें वीडियो की एडिटिंग की पहले से जानकारी थी। अभियोजन ने यह भी कहा कि लवप्रीत से इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बरामद होने बाकी हैं और कैमरामैन नितिन अभी गिरफ्तार नहीं हुआ है, इसलिए गवाहों को धमकाने, सबूतों से छेड़छाड़ और फरार होने की आशंका है। अभियोजन ने इसे “हाई प्रोफाइल” मामला बताते हुए कहा कि इसमें हरियाणा सरकार को बदनाम करने की कोशिश हुई है और कई बड़े लोग साजिश में शामिल हो सकते हैं।
रिमांड की अर्जी में पुलिस ने कहा था कि अतुल अग्रवाल की निशानदेही पर चंडीगढ़ स्थित चैनल दफ्तर से पेन ड्राइव और चैनल के मालिकाना हक से जुड़े दस्तावेज बरामद करने हैं। वहीं मनीष अग्रवाल की निशानदेही पर मुंबई से लैपटॉप बरामद करना है।
बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता दीपक कुमार सरसा और गजे सिंह ने पैरवी की। जमानत अर्जी में कहा गया कि आरोपियों को झूठा फंसाया गया है और प्रसारित वीडियो प्रामाणिक है, जिसका मकसद केवल कानून लागू करने वाली एजेंसियों और जनता को नशे के खतरे के प्रति सचेत करना था। अदालत में बहस के दौरान बचाव पक्ष ने कहा कि मामला उस कार्यक्रम से जुड़ा है जिसमें हरियाणा के युवाओं में बढ़ती नशाखोरी को उठाया गया था, और वीडियो को उस स्थिति के एक चित्रण (enactment) के तौर पर दिखाया गया था।
बचाव पक्ष का आरोप था कि सरकार नशे पर रोक लगाने के बजाय इसकी रिपोर्टिंग रोकने और अपनी छवि बचाने के लिए पत्रकारों को फंसा रही है, और यह प्रेस की आज़ादी दबाने की कोशिश है। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि धारा 338 बनती ही नहीं, बाकी सभी धाराएं जमानती हैं, और अतुल व मनीष अग्रवाल को गिरफ्तारी के आधार नहीं बताए गए।
अदालत ने कहा कि धारा 338 BNS मूल्यवान प्रतिभूति (valuable security), वसीयत या इसी तरह के दस्तावेजों की जालसाजी पर लागू होती है, और अभियोजन का ऐसा कोई आरोप नहीं है। वीडियो से कथित छेड़छाड़ इस धारा के दायरे में नहीं आती, इसलिए शिकायत के आधार पर धारा 338 नहीं बनती।
अदालत ने माना कि बाकी सभी धाराएं जमानती हैं। साजिश की धारा 61(2) की प्रकृति मूल अपराध पर निर्भर करती है, इसलिए जब मूल अपराध जमानती हैं तो यह धारा भी जमानती मानी जाएगी। सुप्रीम कोर्ट के सतेंदर कुमार अंतिल बनाम CBI फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने दोहराया कि जमानत नियम है और जेल अपवाद।
गिरफ्तारी के आधार के मुद्दे पर अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पंकज बंसल फैसले के हवाले से जांच अधिकारी को निर्देश दिया कि अतुल और मनीष अग्रवाल को गिरफ्तारी के आधार और अरेस्ट मेमो दिए जाएं। आदेश के अनुसार ये दस्तावेज अदालत में ही उनके वकील को सौंप दिए गए। वकील और परिजनों से 30 मिनट की मुलाकात की मांग को अदालत ने यह कहते हुए निरर्थक माना कि दोनों को जमानत मिल चुकी है।
हर आरोपी को 50 हजार रुपये का बेल बॉन्ड और इतनी ही राशि का एक जमानतदार देना होगा। शर्तों के मुताबिक आरोपी अदालत की अनुमति के बिना देश नहीं छोड़ेंगे, तय तारीखों पर हाज़िर होंगे, ऐसा ही अपराध दोबारा नहीं करेंगे, और गवाहों को प्रभावित करने या सबूतों से छेड़छाड़ करने की कोशिश नहीं करेंगे।
आदेश वाले दिन केवल सुदेश नैन के बेल बॉन्ड जमा हुए और उनका रिलीज़ वारंट तुरंत जारी कर दिया गया। लवप्रीत, सौरभ उपाध्याय, अतुल अग्रवाल, नीतू और मनीष अग्रवाल के बॉन्ड उस दिन जमा नहीं हुए थे। अदालत ने अतुल अग्रवाल और मनीष अग्रवाल को न्यायिक हिरासत में रखने और 23 अक्टूबर 2026 को पेश करने का निर्देश दिया। यानी दोनों को जमानत तो मिल चुकी है, लेकिन उनकी रिहाई बेल बॉन्ड जमा होने के बाद ही हो सकेगी।
अदालत ने साफ किया कि आदेश में कही गई किसी भी बात को मामले के गुण-दोष पर राय नहीं माना!
नशे पर बने एक वीडियो से शुरू हुआ यह मामला अब पत्रकारिता की आज़ादी और पत्रकारिता की जवाबदेही, दोनों से जुड़े सवाल उठा रहा है। अदालत ने पुलिस की रिमांड मांग ठुकराकर और सभी धाराओं को जमानती मानकर आरोपियों को राहत दी है। लेकिन वीडियो किन हालात में बना, उसे किस रूप में प्रसारित किया गया, और 20 लाख रुपये की मांग के आरोपों में कितनी सच्चाई है, इन सवालों का जवाब निष्पक्ष जांच और अदालत में पेश तथ्यों से ही मिलना चाहिए।

