घर-घर तिरंगा से तिरंगा लहराने पर जेल और विरोध में मार्च को रोकने की कोशिशों तथा संबंधित खबर को महत्व नहीं भी आज का मुद्दा है। अखबारों ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को भी महत्व दिया है कि हिन्दू से मु्स्लिम बने तो पुरानी जाति के आधार पर पिछड़ा वर्ग आरक्षण नहीं मिलेगा। साधारण सुविधा के लिए तो यह शर्त है लेकिन अंकिता भंडारी की हत्या के आरोपी को राज्यपाल बना दिया गया है। हिन्दुओं की रक्षा करने वाली सरकार के समर्थन में प्रदर्शनकारियों को पीटने वालों को अंकिता भंडारी के परिवार की चिन्ता नहीं है। दिल्ली में धरना दे रहे उसके माता पिता को हिरासत में ले लिया गया। यह खबर द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर प्रमुखता से है। राहुल गांधी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर मांग की है कि जांच पूरी हुए बिना दुष्यंत गौतम को राज्यपाल न बनाया जाए।
संजय कुमार सिंह
कॉक्रोच जनता पार्टी और केंद्र सरकार के दूसरे विरोधियों ने आज कनाट प्लेस के सेंट्रल पार्क में तिरंगा फहराने आने की अपील की है। सरकार (एनडीएमसी के निदेशक) ने प्रशासनिक कारणों से इसे बंद रखने का आदेश दिया है (देशबन्धु)। दिल्ली हाईकोर्ट ने तिरंगा फहराने के लिए जुटने की अपील पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है और पुलिस ने कहा है, गतिविधियों को नियंत्रित करेंगे (अमर उजाला)। भारतीय जनता पार्टी के एक प्रवक्ता ने आरोप लगाया है कि प्रदर्शनकारी देश में बांग्लादेश दोहराना चाहते हैं (दैनिक भास्कर)। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जजों को कोई डरा धमका नहीं सकता है। लोया लुहान देश में इसकी जरूरत पड़ी यही बहुत है। जजों के लालच में होने के भी उदाहरण हैं। लेकिन खबरों में ना तेवर है ना धार। तिरंगे से भारतीय जनता पार्टी के प्रेम और संबंध के बारे में आप जानते हैं। नरेन्द्र मोदी की सरकार ने इससे संबंधित नियमों में ढेर सारे परिवर्तन किए हैं और घर-घर झंडा अभियान चला चुके हैं। अब उनके शासन में मोटे तौर पर झंडा फहराने के लिए लोगों को जेल भेजा जा चुका है।
प्रचारक इसे सही और जरूरी या मजबूरी भी बता रहे हैं। इस तरह, अभी भी मामला नैरेटिव बनाने का ही चल रहा है। पहले कांग्रेस भ्रष्ट थी, हिन्दू विरोधी भी। भाजपा के 12 साल से ज्यादा सत्ता में रहने के बावजूद कांग्रेस का भ्रष्टाचार साबित नहीं हुआ। रॉबर्ट वाड्रा को भी सजा नहीं हुई। हिन्दुओं के ‘रक्षक’ अंकिता भंडारी को न्याय नहीं दिलाने के लिए सक्रिय नहीं हैं। चुनाव चोरी, वोट चोरी के ‘सबूत’ नहीं मिले हैं और शिकायतों पर कार्रवाई तो नहीं ही हो रही है। आज मेरे 10 में से चार अखबारों – दैनिक भास्कर, द हिन्दू, हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड एसएसआर (स्पेशल समरी रिवीजन) की खबर है।
आप जानते हैं कि एसआईआर ही जबरदस्ती और कायदे कानूनों से परे रहकर किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने होने दिया है। कम से कम बंगाल में इससे भाजपा की सरकार बनने के तमाम लक्षण हैं और एसआईआर की गड़बड़ियां जग जाहिर हैं। अब चुनाव आयोग ने खुद एसएसआर का आदेश दिया है। कहने की जरूरत नहीं है कि एसआईआर में भारी गड़बड़ी हुई है और इसीलिए एसएसआर करना पड़ रहा है। इसमें धन की बर्बादी से लेकर मतदाताओं की परेशानी और बीएलओ की मौत (आत्महत्या से भी) शामिल है। यह सब किसी की गलती से हो या मनमानी से उसके खिलाफ कार्रवाई होनी ही चाहिए पर अभी खबरों में वह मुद्दा ही नहीं है।
आज मुद्दा कॉक्रोच जनता पार्टी का तिरंगा मार्च है। इसीलिए, टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड भले एसएसआर की खबर है लेकिन दो कॉलम में ही है। सीजेपी के मार्च की खबर इसके बराबर में तीन कॉलम में है। इसका शीर्षक है, (दिल्ली) हाईकोर्ट ने सीजेपी का मार्च रोकने से मना कर दिया; पुलिस ने कहा नियंत्रण करेगी। इसके साथ छपी खबर के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के जवाब में कहा है कि जरूरत पड़ने पर मोबाइल इंटरनेट को बंद किया जाना जरूरी है। इससे आप समझ सकते हैं कि देश में क्या चल रहा है और खबरें कैसी छप रही हैं। इन्हीं खबरों में एक खबर यह भी है कि चुनाव आयोग ने अगर एसआईआर के बाद एसएसआर का आदेश दिया है तो सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त से लेकर दोनों चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी किया है।
दि इंडियन एक्सप्रेस ने पांच कॉलम की लीड से बताया है कि जंतर-मंतर मामले में भी सुनवाई होगी। खबर के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म 6 में एसआईआर से संबंधित संशोधनों के बारे में जवाब मांगा है। यही नहीं, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा है कि विपक्ष के याचिकाकर्ताओं को अपना आचरण स्पष्ट करना होगा। इस मामले में आपकी राय चाहे जो हो, मुझे लगता है कि जो मामला सुप्रीम कोर्ट को स्वतः संज्ञान लेकर ठीक कर देना चाहिए था वह महीनों से चल रहा है। इतनी याचिकाओं के बाद भी अगर कुछ नहीं हुआ है, जनता को परेशानी जारी है, सरकारी धन की बर्बादी हो ही रही है तो अब याचिकाकर्ता जो भी हों, आचरण स्पष्ट करने से क्या होगा, पता नहीं।
आज देशबन्घु की लीड का शीर्षक है, प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई को लेकर केंद्र को नोटिस। उपशीर्षक है, जंतर मंतर प्रदर्शन स्थल मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने मांगा जवाब। यह खबर मेरे दस अखबारों में आज किसी और में लीड नहीं है। सरकार का विरोध लोकतंत्र में जायज है। इसे रोकने के लिए पुलिस की बदसलूकी की कोई जगह नहीं है लेकिन कील लगी और करंट मारने वाली लाठियों का उपयोग करने वाली सरकार के जमाने में सांसदों, विपक्ष के नेता के साथ बदसलूकी और जबरदस्ती हुई है। चोटिल तो कई लोग हुए हैं। इसके बावजूद सीजेपी के तिरंगा प्रदर्शन की खबर आज लीड नहीं है। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, सड़क का घमासान अब शीर्ष कोर्ट में। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, SIR में बड़े पैमाने पर नाम हटाने के लिए CEC से जवाब तलब। इसके साथ की एक खबर का शीर्षक है, कोई भी न्याय पालिका को डरा धमका नहीं सकता : सुप्रीम कोर्ट।
आप जानते हैं कि लोकतंत्र में वोट का कितना महत्व है। सुप्रीम कोर्ट की जानकारी में लाखों लोग मताधिकार से वंचित रहे, फिर भी चुनाव हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा और अखबारों में छपा है कि ये लोग अगली बार वोट दे लेंगे और ट्रिब्यूनल की कार्रवाई का रफ्तार भी सबको पता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में क्या कार्रवाई की और क्यों नहीं की से अलग मुद्दा यह है कि खबर ना तब छपी ना अब छपी और अगर ऐसा डर के कारण है और देश का मीडिया डरा हुआ है तो सुप्रीम कोर्ट नहीं डरेगा कहने की जरूरत भी क्यों पड़नी चाहिए थी। खबर इसपर भी होनी चाहिए थी जो आज नहीं है।
दि एशियन एज का अलग ही अंदाज है। पहले पन्ने पर अक्सर सरकारी प्रचार की खबरें होती हैं और आज भी हैं। लीड का शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, एनडीएमसी ने सेंट्रल पार्क बंद किया; सीजेपी मार्च से पहले कनाट प्लेस में तनाव की स्थिति। सेकेंड लीड का शीर्षक है, लद्दाख सर्वोच्च प्राथमिकता : प्रधानमंत्री ने 3.3 हजार करोड़ की परियोजनाओं का खुलासा किया।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।



