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बिहार

अमर उजाला के पटना ब्यूरो चीफ जीवन ज्योति के सवालों से ही घबरा गये पटना पुलिस के SSP कार्तिकेय शर्मा!

Collage thumbnail showing Patna Police media chats, screenshots, and a police officer, with bold Hindi headlines suggesting a controversy about a FIR and removal from a group.

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी (Samrat Choudhary) के राज में महिला सुरक्षा के दावों की हकीकत देखिए। पटना के गांधी मैदान थाना क्षेत्र में एक महिला के घर में घुसकर उसके साथ मारपीट की गई। महिला ने पुलिस से गुहार लगाई, लेकिन FIR दर्ज नहीं हुई। नतीजा? पुलिस की निष्क्रियता के बीच महिला पर दोबारा हमला हुआ।

सवाल यह है कि जब राजधानी पटना में ही महिलाओं की शिकायतों पर कार्रवाई नहीं होगी तो सुरक्षा के बड़े-बड़े दावों का आखिर मतलब क्या है?

मैंने इसी मामले में पटना के SSP कार्तिकेय शर्मा से Patna Police Media Group में सवाल पूछा कि आखिर महिला की शिकायत पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? उम्मीद थी कि पुलिस कप्तान जवाबदेही दिखाएंगे। मामले का संज्ञान लेंगे और पीड़िता को न्याय दिलाने की दिशा में कदम उठाएंगे। लेकिन महोदय ने कार्रवाई के सवाल का जवाब देने के बजाय मुझे ही ग्रुप से बाहर का रास्ता दिखा दिया!

SSP साहब, क्या आपको लगता है कि पत्रकारिता आपके मीडिया ग्रुप की सदस्यता की मोहताज है? क्या ग्रुप से बाहर होते ही पत्रकार की कलम रुक जाएगी? क्या पत्रकारिता का मतलब सिर्फ आपकी प्रेस विज्ञप्तियां छापना, पुलिस के पक्ष में बाइट चलाना और आपकी उपलब्धियों का बखान करना है?

महोदय, पत्रकार पुलिस का प्रचार विभाग नहीं है। पत्रकार का काम सवाल पूछना है और पुलिस का दायित्व उन सवालों का जवाब देना है।

एक महिला के साथ दो-दो बार मारपीट हुई। शिकायत पर FIR दर्ज नहीं होने का सवाल उठा। लेकिन पीड़िता की परेशानी पर जवाब देने के बजाय पत्रकार को ही ग्रुप से बाहर कर देना आखिर किस मानसिकता का परिचायक है? अगर यह कार्रवाई मेरे सवाल पूछने के कारण की गई है तो यह केवल एक पत्रकार को ग्रुप से हटाने का मामला नहीं, बल्कि पुलिस की जवाबदेही और सवालों के प्रति उसके रवैये पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

SSP साहब, आपकी कुर्सी संवैधानिक व्यवस्था और कानून के प्रति जवाबदेही से बड़ी नहीं है। मीडिया ग्रुप में किसे रखना है और किसे हटाना है, यह आपका प्रशासनिक निर्णय हो सकता है, लेकिन सवालों को दरवाजे के बाहर खड़ा करके आप पत्रकारिता की आवाज नहीं दबा सकते।

आपके ग्रुप में रहूं या न रहूं, जनता के सवालों के साथ खड़ा रहूंगा। आपकी प्रेस विज्ञप्तियों से इतर भी खबरें हैं। पुलिस की तारीफ से इतर भी पत्रकारिता है। और वर्दी के सम्मान के साथ-साथ जवाबदेही की मांग करना भी पत्रकार का अधिकार है।

याद रखिए महोदय, पत्रकार को ग्रुप से बाहर किया जा सकता है, सवालों को नहीं।

महिला को न्याय मिला या नहीं? FIR दर्ज हुई या नहीं? शिकायत पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और सवाल पूछने वाले पत्रकार को ग्रुप से हटाने की वजह क्या है?

सवाल जारी रहेंगे, महोदय। क्योंकि पत्रकारिता आपकी सुविधा से नहीं, जनता के सरोकारों से चलती है।

अमर उजाला पटना के ब्यूरो चीफ जीवन ज्योति की आपबीती…

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