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उत्तराखंड

दुष्यंत गौतम को राज्यपाल बनाकर मोदी सरकार ने उत्तराखंड का अपमान किया है!

नई दिल्ली/उत्तराखंड: अंकिता के परिवार की मांग के बीच दुष्यंत कुमार गौतम को सिक्किम का राज्यपाल नियुक्त करने पर सवाल। कांग्रेस ने फैसले को उत्तराखंड की भावनाओं की अनदेखी बताया, परिवार ने नियुक्ति रद्द करने और सीबीआई जांच की निगरानी सुप्रीम कोर्ट से कराने की मांग की।

अंकिता भंडारी हत्याकांड में कथित VIP की भूमिका की जांच पूरी होने से पहले भाजपा नेता दुष्यंत कुमार गौतम को सिक्किम का राज्यपाल नियुक्त किए जाने पर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार घिर गई है। उत्तराखंड में इस फैसले को लेकर विरोध तेज हो गया है। सवाल उठाया जा रहा है कि जब अंकिता का परिवार अपनी बेटी को इंसाफ दिलाने के लिए लगातार संघर्ष कर रहा है और मामले में कथित VIP की भूमिका की जांच की मांग कर रहा है, तब सरकार ने गौतम को संवैधानिक पद पर नियुक्त करने का फैसला क्यों लिया?

आलोचकों का कहना है कि यह फैसला उत्तराखंड के लोगों की भावनाओं की अनदेखी करता है। इसे सरकार के उस रवैये के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें जनता की नाराजगी और पीड़ित परिवार की मांगों के बावजूद राजनीतिक फैसले लिए जा रहे हैं। हालांकि, गौतम पर लगाए गए आरोप अभी साबित नहीं हुए हैं। उन्होंने आरोपों से इनकार किया है और आरोप लगाने वालों के खिलाफ मानहानि की कार्रवाई शुरू की है।

‘मैं चाहे ये करूं, मैं चाहे वो करूं, मेरी मर्जी’ जैसी राजनीति का आरोप

दुष्यंत गौतम की नियुक्ति को लेकर उठ रहे सवाल केवल एक व्यक्ति को राज्यपाल बनाए जाने तक सीमित नहीं हैं। विवाद इस बात पर भी है कि क्या सरकार को ऐसे संवेदनशील मामले में पीड़ित परिवार की मांगों और जनता की भावनाओं का ध्यान नहीं रखना चाहिए था?

अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर उत्तराखंड में लंबे समय से विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं। परिवार और सामाजिक संगठनों ने लगातार मांग की है कि हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए तीन लोगों से आगे बढ़कर कथित VIP की भूमिका की भी जांच की जाए। ऐसे में जांच पूरी होने से पहले गौतम को राज्यपाल नियुक्त किए जाने से सरकार के फैसले की टाइमिंग पर सवाल उठ रहे हैं।

आलोचकों के मुताबिक, लोकतंत्र में सरकार के पास फैसले लेने का अधिकार जरूर है, लेकिन जनता की नाराजगी और न्याय की मांग को नजरअंदाज करना राजनीतिक रूप से भारी पड़ सकता है। सरकार के लिए चुनौती यह है कि वह इस नियुक्ति को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब दे और स्पष्ट करे कि अंकिता के परिवार की मांगों पर क्या कार्रवाई की जा रही है।

अंकिता के माता-पिता इंडिया गेट पर धरने पर बैठे, राहुल-प्रियंका ने की मुलाकात

दुष्यंत गौतम की नियुक्ति के विरोध में अंकिता के माता-पिता 14 अक्टूबर को दिल्ली के इंडिया गेट पर धरने पर बैठ गए। उनकी मांग थी कि सीबीआई जांच पूरी होने तक गौतम की नियुक्ति पर रोक लगाई जाए।

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा भी धरनास्थल पर पहुंचे और परिवार से मुलाकात की। राहुल गांधी ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से अपील की कि जांच पूरी होने तक नियुक्ति पर आगे कार्रवाई न की जाए।

15 अक्टूबर की सुबह दिल्ली पुलिस ने धरने पर बैठे अंकिता के माता-पिता और कुछ कांग्रेस नेताओं को हिरासत में लिया। बाद में उन्हें छोड़ दिया गया। अंकिता के पिता ने सरकार को 24 घंटे का अल्टीमेटम देते हुए नियुक्ति रद्द नहीं होने पर देशव्यापी आंदोलन की चेतावनी दी।

उत्तराखंड में भी विरोध, कांग्रेस ने उठाए सवाल

दुष्यंत गौतम की नियुक्ति के खिलाफ उत्तराखंड कांग्रेस ने भी प्रदर्शन किया। 13 अक्टूबर को देहरादून में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल के नेतृत्व में पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं ने गांधी पार्क में मौन प्रदर्शन किया।

कांग्रेस ने आरोप लगाया कि गौतम को राज्यपाल नियुक्त करने का फैसला अंकिता के परिवार की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला है। पार्टी नेताओं ने सवाल उठाया कि जब मामले में कथित VIP की भूमिका की जांच की मांग बनी हुई है, तब ऐसी नियुक्ति करने की क्या जरूरत थी?

कांग्रेस नेताओं ने यह भी आशंका जताई कि राज्यपाल के संवैधानिक पद पर नियुक्ति से संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई को लेकर व्यावहारिक मुश्किलें पैदा हो सकती हैं। हालांकि, राज्यपाल को संविधान के अनुच्छेद 361 के तहत पद पर रहते हुए कुछ कानूनी संरक्षण प्राप्त हैं, लेकिन इसे हर परिस्थिति में स्थायी या पूर्ण आपराधिक छूट के रूप में देखना सही नहीं होगा।

चार साल बाद भी कथित VIP को लेकर सवाल

19 वर्षीय अंकिता भंडारी ऋषिकेश के पास वनंतरा रिजॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट के रूप में काम करती थीं। सितंबर 2022 में उनकी हत्या कर दी गई थी। इस मामले में रिजॉर्ट मालिक पुलकित आर्य और उसके दो कर्मचारियों सौरभ भास्कर तथा अंकित गुप्ता को मई 2025 में अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई।

इसके बावजूद अंकिता के परिवार का कहना है कि मामले में कथित VIP की भूमिका को लेकर सवालों का जवाब नहीं मिला है। परिवार ने दुष्यंत गौतम का नाम लेते हुए आरोप लगाए हैं, जबकि गौतम ने इन आरोपों को खारिज किया है।

राज्य सरकार ने 2026 में मामले के कथित VIP पहलू की जांच के लिए सीबीआई जांच की सिफारिश की। परिवार अब इस जांच को सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में कराने की मांग कर रहा है। परिवार की मुख्य आपत्ति यह है कि जांच पूरी होने से पहले गौतम को राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर नियुक्त क्यों किया गया।

युवाओं की नाराजगी सरकार के लिए चुनौती

अंकिता भंडारी मामले में उत्तराखंड के युवाओं और सामाजिक संगठनों का विरोध लंबे समय से जारी है। इस प्रकरण ने महिला सुरक्षा, प्रभावशाली लोगों की जवाबदेही और जांच की पारदर्शिता जैसे सवाल खड़े किए हैं।

दुष्यंत गौतम की नियुक्ति के बाद यह नाराजगी एक बार फिर सामने आई है। आलोचकों का कहना है कि जनता की भावनाओं के विपरीत लिए गए फैसले सरकार की छवि को नुकसान पहुंचा सकते हैं। लोकतंत्र में किसी भी सरकार की जवाबदेही केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं होती, बल्कि उसे जनता के सवालों का जवाब भी देना होता है।

अंकिता के परिवार की मांग है कि उनकी बेटी की हत्या से जुड़े सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच हो और कथित VIP की भूमिका स्पष्ट की जाए। ऐसे में सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वह परिवार की आशंकाओं को दूर करने के लिए पारदर्शी कार्रवाई करेगी या नियुक्ति को लेकर उठ रहे विरोध के बीच अपनी स्थिति पर कायम रहेगी।

अंकिता भंडारी मामले में अब बहस केवल एक नियुक्ति तक सीमित नहीं है। यह सवाल भी सामने है कि लोकतंत्र में सत्ता के फैसलों के साथ जनता की भावनाओं, पीड़ित परिवार के अधिकारों और निष्पक्ष जांच की मांग को कितनी गंभीरता से लिया जाता है।


दुष्यंत गौतम को राज्यपाल बनाकर मोदी सरकार ने उत्तराखंड का अपमान किया है। यह इस अहंकार का प्रतीक है कि मैं चाहे ये करूँ, मैं चाहे वो करूँ, मेरी मरजी। लेकिन ये लोग भूल गए कि आज राजतंत्र या तानाशाही नहीं, लोकतंत्र है। युवाओं से टकराकर वैसे भी सरकार ने अपनी फजीहत करा ली है।
-विष्णु राजगढ़िया, वरिष्ठ पत्रकार

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