प्रवीण-
बीते कुछ दिनों में जर्नलिज्म या जर्नलिस्ट होने की परिषाभाओं की बाढ़ सी आ गई है. मजेदार बात तो ये है कि वो लोग भी जर्नलिस्ट होने की परिभाषा लिख रहे हैं जिन्होंने बीते 12 सालों में मोदी सरकार की दलाली करने के अलावा कुछ भी नहीं किया है.
लेकिन बहस उससे आगे की होनी चाहिए. एक पूरा रोडमैप बना लिया है उन लोगों को काम करने से रोकने का जो सरकार के खिलाफ जमीन पर उपजे गुस्से को सामने ला रहे थे.
दिल्ली पुलिस जर्नलिस्ट के लिए जो गाइडलाइन्स लेकर आती है, वही गाइडलाइन्स प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया भी जारी कर देती है. बहुत सारे सो काल्ड पत्रकार भी उन्हीं गाइडलाइन्स का समर्थक करते हुए दिखते हैं.
ये सब तब चुप रहे हैं, जब स्टेट जर्नलिस्ट को काम करने से रोकता है. उन्हें निशाना बनाता है. उनके मोबाइल, कैमरा, लैपटॉप छीन लिए जाते हैं. सोशल मीडिया हैंडल्स को बैन कर दिया जाता है.
जिन लोगों के जर्नलिज्म को लेकर ये बहस हो रही है, अगर वो ना होते तो क्या 20 जुलाई को जिस तरह से दिल्ली पुलिस ने आंदोलन करने आए युवाओं से बर्बरता की वो सामने आ पाती?
वो सामने नहीं आती तो क्या 12 साल में पहली बार मोदी सरकार के खिलाफ इतना बड़ा आंदोलन खड़ा हो पाता, जिससे पहली बार मोदी सरकार के एक मंत्री का इस्तीफा हो जाता.
लेकिन एक प्लान तरीके से उन लोगों को फ्रस्ट्रेट किया जा रहा है जो ग्राउंड पर जाकर सिर्फ आंदोलन की हकीकत को बयां कर रहे थे.
तब संविधान में पत्रकार के लिए अलग से कोई अधिकार ही नहीं है जो किस हक से उनसे पीआईबी या किसी मीडिया संस्थान में काम करने के कार्ड मांगे जा रहे हैं.
इस देश में ऐसी कौन सी इमरजेंसी चल रही है कि सड़क वो जो रहा है उसे कोई रिकॉर्ड नहीं कर सकता है? ये कब से मना हुआ है?
जिस तरह से आंदोलनकारियों के साथ जर्नलिस्ट को डिटेन किया जा रहा है. पुलिस नए तरीके अपनाते हुए ग्राउंड पर राइट विंग के गुंड़ों को पत्रकारों और आंदोलनकारियों को परेशान करने की खुली छूट दे रही है.
मतलब ऐसा कोई तरीका ही नहीं छोड़ा जा रहा है, जिससे आंदोलन हो पाए या फिर जर्नलिस्ट जो भी लोग तमाम पाबंदियों के बाद सड़क पर विरोध करने जा रहे हैं उन्हें रिपोर्ट कर पाएं.
सड़क पर आंदोलन होने से रोकना आखिर दुनिया के किस लोकतंत्र में देखने को मिलता है. पुलिस, कोर्ट, प्रशासन सब कुछ सरकार की गोद में जाकर बैठ गया है. जब ये संस्थान लोगों के लिए हैं ही नहीं तो फिर टैक्स के पैसे से इनका खर्च क्यों उठाया जा रहा है?
किसी तरह की नैतिकता की उम्मीद तो इस सरकार और सिस्टम में की ही नहीं जा सकती है. ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जब इतने लोग सड़क पर उतर आए हैं तो वो इंसान अपना पद छोड़ना तो दूर, सामने तक नहीं आ रहा है.
जब की बेशर्मी चल रही है इस पूरे तंत्र में. लेकिन सवाल यही है कि आखिर तब तक? खुद को खुदा समझने का खयाल पालने वाले ना जाने कितने आए और गए हैं.

