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आज के अखबार : पंजाब में अमित शाह की चुनावी चालों का सच; पेगासस के बावजूद खुफिया जानकारी ‘शून्य’

Newspaper headline: 'Pathan drops TMC, catches Gujarat land' with a Vadodara update on a land dispute

कहा जा सकता है कि द टेलीग्राफ को जियो प्लैटफॉर्म्स लिमिटेड का विज्ञापन नहीं मिला या इतना पैसा नहीं मिला कि शुरू के पांच पन्नों पर छापा जाए इसलिए उसने दि इंडियन एक्सप्रेस की पुरानी खबर सिंगल कॉलम में छाप दी। तथ्य यह भी हो सकता है कि बाकी ने इसी कारण नहीं छापा हो। जब नीचता, अनैतिकता, बेशर्मी आम है तो कुछ भी हो सकता है। वैसे, यहां यह खबर पूरी नहीं है।

संजय कुमार सिंह

हिन्दुओं का भला करने के नाम पर सत्ता में आई सरकार ने सांसद खरीदने और दल बदल करने के लिए मुस्लिम सांसद युसूफ पठान को उनकी पसंद, जरूरत और मांग की जमीन का आधा हिस्सा उपहार में और आधे से थोड़ा कम सस्ते में देने का फैसला किया है। इसकी पूरी कहानी कल दि इंडियन एक्सप्रेस में छपी थी जो सरकारी सुविधा और अधिकारों के उपयोग से दल-बदल को प्रोत्साहन देने का उदाहरण है। इससे पहले इंडियन एक्सप्रेस ने ही चुनाव आयोग से संबंधित खबर छापी थी। तब यह आरोप लगाया गया था कि कांग्रेस पार्टी ने इंडियन एक्सप्रेस को मोटा विज्ञापन दिया था इसलिए यह खबर छपी। सरकार समर्थकों ने इंडियन एक्सप्रेस के साथ रिपोर्टर की भी आलोचना की, सोशल मीडिया पर ट्रोल किया।

आज इंडियन एक्सप्रेस की कल की यह खबर किसी और अखबार में पहले पन्ने पर नहीं है। बोफर्स के जमाने में इंडियन एक्सप्रेस का खुलासा कई अखबारों में छपता था। हालत ऐसी हो गई थी कि कुछ खास तरह की खबरें द हिन्दू को लीक कराई जाती थीं। युसूफ पठान को सरकारी धन से रिश्वत देने की यह खबर आज सिर्फ द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर है। जियो प्लैटफॉर्म्स लिमिटेड का विज्ञापन द टेलीग्राफ और नवोदय टाइम्स को छोड़कर आज अंग्रेजी और हिन्दी के मेरे सभी अखबारों में पहले पन्ने से पहले है। ये विज्ञापन कानूनी बाध्यता भी हैं और हिन्दी के अखबारों में अंग्रेजी में छापने का कोई मतलब नहीं है। अब जब अनुवाद कंप्यूटर से हो जाता है तब ये विज्ञापन अंग्रेजी में ही छप रहे हैं जबकि पहले हिन्दी में (भी) छपते थे।

अखबार दूसरी भाषा में विज्ञापन छापने के अतिरिक्त पैसे लेते थे। अपने खर्च पर अनुवाद करवाकर छापते थे क्योंकि तब विज्ञापन का मकसद प्रचार होता था अब सिर्फ पैसे पाना है। इंडियन एक्सप्रेस की पिछली खबर के बाद से वोट चोरी का मामला काफी गंभीर हो गया है। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी हमलों का मुकाबला अपने ढंग से कर रही है लेकिन मीडिया के उसके लोग भी सरकार के बचाव में काम कर रहे हैं। लोकतंत्र में आंदोलन और विरोध आम है। भारतीय जनता पार्टी जब सत्ता में नहीं थी तो विरोध करती रही है लेकिन अब वह हर विरोधी से अलग-अलग तरीकों से निपटती है। इनमें भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तार लोगों से लेकर प्रणय राय और विरोधियों को दिमागी नक्सल कहना शामिल है। गिरफ्तार लोगों में 80 साल के स्टेन स्वामी भी रहे हैं जिन्हें सिपर के लिए परेशान किया गया और अंततः वे जेल में ही मर गए।

उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे युवा छात्र सितंबर 2020 से यूएपीए मामले में 6 साल से अधिक से जेल में हैं। लेकिन मुकदमा शुरू नहीं हुआ है। सोनम वांगचुक के साथ भी ऐसी ही कोशिश हुई। हालांकि, वे जल्दी छूट गए। अभी तिरंगा फहराने वाले युवा जेल में हैं। कैमरे पर अपराध स्वीकार कर चुके गुंडे, पुलिस वर्दी में पुलिस वालों के साथ मिलकर मारपीट करने के आरोप में पकड़े, देखे और रिकार्ड किए गए लोगों के खिलाफ कार्रवाई की कोई खबर नहीं है। ऐसी व्यवस्था में जब वोट चोरी, चुनाव चोरी और चुनाव आयोग पर कब्जा, मुख्य चुनाव आयुक्त की मनमानी की खबरें हैं तो आज शेखर गुप्ता का एक लेख (विचार) दैनिक भास्कर में पाठकों को भ्रमित करने के लिए ही है।

अंग्रेजी के पाठकों पर शायद कम असर करे इसलिए हिन्दी में। दैनिक भास्कर ने हिन्दी में प्रकाशित किया है तो यह देश और हिन्दी के पाठकों के साथ चल रही साजिश का उदाहरण है। कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसे देशद्रोही लोग दूसरों को देशभक्ति का सर्टिफिकेट बांट रहे हैं। संयोग से यह लेख ऐसे समय में छपा है जब हिन्दी के एक और महान संपादक, एक और गुप्ता यानी दैनिक जागरण के संजय गुप्ता संघ के कार्यक्रम में बोल आए हैं। बुलाए जाने पर गर्व महसूस किया है। इससे पहले भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के समर्थन में वैश्य और अग्रवाल समाज से जुड़े कई संगठन और संस्थान खुलकर सामने आए हैं।

आज दैनिक भास्कर में पहले पन्ने पर छपी खबर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हवाले से है। इसका शीर्षक है, समाज को बांटने वाली सोच देश की दुश्मन, हमें मिलकर लड़ना होगा। अमर उजाला में इसी खबर का शीर्षक है – राष्ट्र हित में एकजुट हों सभी दल देश के दुश्मनों से साथ लड़ें। कहने की जरूरत नहीं है कि चुनाव चोरी के आरोपों के बीच देश हित में सभी दलों से एकजुट होने के लिए कहना सत्ता में बने रहने की कोशिशों का हिस्सा है। सत्ता में आने से पहले 50 दिन में सपनों का भारत और 100 दिन में विदेश में रखा काला धन वापस लाने की बात करने वाले नरेन्द्र मोदी झोला उठाकर चल देने वाले थे और नीयत में खोट निकलने पर किसी भी चौराहे पर आने वाले थे। लेकिन अब वह सब मुद्दा नहीं है।

मार्गदर्शक मंडल में जाने की उम्र होने के बाद भी सत्ता से चिपके रहने के उपायों के बीच संघ प्रमुख का यह कहना कि भारत में तख्ता पलट की मंशा सफल नहीं होगी – मायने रखता है। कहने की जरूरत नहीं है कि नरेन्द्र मोदी आदर्श प्रधानमंत्री भी साबित हुए हों तो 12 साल बाद उन्हें बदलने या हटाने की मांग करना और चाहे जो हो देशहित के खिलाफ तो नहीं ही हो सकता है। आपको उनका काम पसंद हो तो भी वही प्रधानमंत्री क्यों रहें? सरकार के खिलाफ युवाओं के विरोध से परेशान संघ (और सत्तारूढ़ भाजपा भी) युवाओं को प्रभावित और परेशान दोनों करने में लगे हैं। दैनिक भास्कर की लीड है, संघ का फोकस… जेन-जी के लिए शाखा बढ़ेंगी, मंडल-बस्ती पर काम। संघ प्रमुख की खबर का शीर्षक है, प्रदर्शन राजनीतिक औजार बन समाज में दरारें बढ़ा सकते हैं।  

अखबार का संपादकीय है, संघ प्रमुख ने अपने उदबोधन में फ्रांस, बांग्लादेश व नेपाल में चल रहे युवा आंदोलनों का जिक्र करते हुए कहा कि आंदोलन से किसी समस्या का हल कभी नहीं निकला है, आंदोलन समस्या के समाधान के लिए होना चाहिए। ठीक है कि संघ प्रमुख ने कहा है तो खबर है, इसपर संपादकीय लिखा जा सकता है लेकिन समस्या नरेन्द्र मोदी हों, दिखाई दे रहा है कि वे सत्ता छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं, चुनाव से उनको हराया नहीं जा सकता है तो आंदोलन ही होगा और रास्ता क्या है। नेपाल, बांग्लादेश का अपना डर दिखाकर युवाओं को डराया नहीं जा सकता है और संघ के लिए यह एक समस्या हो सकती है तो संघ पोषित लोग ऐसे लेख लिखकर नागरिकों को भ्रमित कर रहे हैं। अगर पहले के आंदोलनों से लाभ नहीं हुआ तो सत्ता बदली ना? एक ही आदमी को क्यों सत्ता में बने रहना चाहिए जब व तमाम यू टर्न ले चुका है और देश को कोई लाभ नहीं दिख रहा है। 

लॉरेंस बिश्नोई गैंग के काम को ही देखिए। जेल में बंद कोई गैंगस्टर इतने अपराध कैसे करवा पा रहा है – का कोई जवाब नहीं है। चिन्ता तो नहीं ही है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, जांच से पता चला है कि बाइक सवार का संबंध लॉरेंस बिश्नोई गैंग के नेता से था। दैनिक भास्कर में खबर छपी है, टाइगर से पहले बिग बी, आमिर, अक्षय की रेकी की…. सुरक्षा देख प्लान बदला। आप समझ सकते हैं कि खुफिया सूचनाओं का क्या हाल है। पुरानी खबर यह है कि देश के विशिष्ट नागरिकों, पत्रकारों के फोन में पेगासस के जरिए उनकी निगरानी की जाती है। खबर बता रही है कि अपराधियों की सूचना नहीं है। यह स्थिति एक दो दिन के शासन से नहीं बन सकती है और बन चुकी है इसलिए भी सरकार बदलना जरूरी है। ऐसे में संघ जो कर रहा है करे पर मीडिया के लोग और उसके संपादक क्यों कर रहे हैं?  

एक गैंगस्टर के मामले में तो यह स्थिति है लेकिन देश के गृहमंत्री ने कहा है और नवोदय टाइम्स में प्रमुखता से छपा है, पंजाब में नशा तस्करों को पाताल से भी ढूंढ़ निकालेंगे। बराबर में खबर है कि नशा विरोधी कार्यकर्ता की हत्या हो गई। मुख्यमंत्री विदेश में थे। लौटकर आने की खबर के साथ ही खबर है कि जांच का काम सीबीआई को सौंप दिया। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार – अमित शाह ने कहा है कि पंजाब सरकार ने एक मामला सीबीआई को दिया; बाकी भी स्थानांतरित करे। आप जानते हैं कि तमाम मामलों में केंद्र सरकार जबरन सीबीआई, ईडी और एनआईए से जांच करवाती रही है। पंजाब में नशे का मामला पुराना और अलग है तथा केंद्र सरकार के लिए इस बार यह मुद्दा चुनावी है इसलिए सीबीआई जांच के आदेश खुद नहीं दिए और केंद्रीय गृहमंत्री कह रहे हैं कि पंजाब सरकार बाकी मामले भी सीबीआई को ट्रांसफर करे।

पुराने कई मामले गवाह हैं कि सीबीआई की जांच से संबंधित आरोपियों को भले परेशान किया जा सके, साबित कुछ नहीं हुआ है। अरविन्द केजरीवाल ने अपने मामले में जो साबित कर दिया वह तो ऐतिहासिक है लेकिन अभी वह मुद्दा नहीं है। मुद्दा यह है कि जो सरकार देश को एक गैंगस्टर से राहत नहीं दिला पा रही है, 12 साल से केंद्र में सत्ता में है फिर भी नशे पर रोक नहीं लगा पाई है वह अब क्या कर लेगी और अगर रोकना ही है तो सीबीआई जांच का आदेश केंद्र सरकार ने क्यों नहीं दिया। तमाम मामलों में तो देती रही है। भाजपा की घटिया राजनीति के कारण अजीब स्थिति है। मीडिया में यह सब नहीं के बराबर आता है। पूर्व सूचना के अनुसार आज हिन्दी अखबार देशबन्धु और अंग्रेजी अखबार दि एशियन एज नहीं आया है।

कहने की जरूरत नहीं है कि पंजाब में नशा चुनावी मुद्दा है। वे दावा और चुनौती भी देते रहते हैं लेकिन सच्चाई यह है कि आतंकवाद खत्म करने के दावे के बावजूद हादसे हो जाते हैं। 2019 में घुस कर मारने के बाद और बावजूद पहलगाम हुआ। नाम (धर्म) पूछकर मारा गया। जवाब में ऑपरेशन सिन्दूर क्यों और कैसे बंद हुआ – पता ही नहीं चला। नक्सल वाद खत्म करने के नाम पर 2000 लोगों को मार डाला गया लेकिन नागरिक भगदड़ में मर जा रहे हैं। सरकार हादसे रोकने से ज्यादा जोर खबरें मैनेज करने और चुनाव जीतने में लगाती है। प्रचारक विपक्ष को पप्पू समझते और बनाते हैं। आज हिन्दी अखबारों की इन खबरों के अलावा अंग्रेजी अखबारों – दि इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स और द हिन्दू के अनुसार, अमेरिका से करार हो गया, बहुत करीब है, पूर्ण होने को है जैसी खबरें हैं।

द टेलीग्राफ की लीड के अनुसार कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल राज्य सरकार से कहा है कि वह पूजा पंडाल में भगदड़ की जांच के लिए हाईकोर्ट के किसी जज की सेवाएं नहीं दे सकता है लेकिन राज्य सरकार अपनी पसंद के किसी जज को नियुक्त कर सकती है। आप जानते हैं कि बंगाल भाजपा ने हाईकोर्ट के जज को चुनाव लड़ाया था और अब वे सांसद हैं। मुद्दा यह नहीं है कि 2016 में कलकत्ता में पुल गिरा था तो ममता बनर्जी ने उसे ऐक्ट ऑफ गॉड कहा था और नरेन्द्र मोदी ऐक्ट ऑफ फ्रॉड कह रहे थे। अब पूजा पंडाल में भगदड़ से 19 लोग मर गए तो बंगाल सरकार ना जिम्मेदारी लेने का तैयार है ना इसे किसी तरह का संदेश मान रही है।     

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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