दयाशंकर शुक्ला सागर-
तुम्हें भूलना आसान नहीं थापा….
वह 90 का दशक था। तब नया-नया रिपोर्टर बना था। एकदम फ्रेश। लखनऊ के ‘दैनिक जागरण’ की सिटी टीम में। सिटी इंचार्ज थे प्रेम सिंह जी। बीट मिली थी सिविल सप्लाई। इस बीट में तब ज्यादा खबरें होती नहीं थीं। होती भी तो सस्ते गल्ले के दुकानों के राशन-वाशन की।
किसी सोर्स ने खबर दी कि फूड कारपोरेशन आफ इंडिया के भंडारगृह में लाखों कुंतल गेहूं खुले में रखा था जो कारपोरेशन की लापरवाही के कारण सड़ गया। अब यही गेहूं राशन की दुकानों पर भेजने की तैयारी है। तब यह भंडारगृह तालकटोरा इंडस्ट्रियल एस्टेट में कहीं था। मैंने बड़े उत्साह से कहा था-‘थापा भाई गज़ब खबर मिली है आज। बस अच्छी फोटो हो जाए तो मजा आ जाए।’
उन दिनों थापा भाई का बड़ा जलवा था। उनका पूरा नाम राम बहादुर थापा था लेकिन हम उन्हें थापा भाई कह कर बुलाते थे। नाटा नेपाली कद, मंगोलियन नैन-नक्श। बादामी आकार की और मुड़ी हुई चीनी या तिब्बती शैली की आँखें। होंठों के ठीक ऊपर एक बहुत ही हल्की, साफ और बारीक पेंसिल जैसी मूंछ, जिसने कसम खा रखी हो कि वह अब और नहीं बढ़ेंगी।

उन दिनों फोटो जर्नलिज्म में थापा बड़ा नाम था। 1992 में अयोध्या में कारसेवकों के गुस्से और भारी हंगामे के बीच जान जोखिम में डालकर उन्होंने ढांचा ध्वंस की सबसे पहली और बेहद खास तस्वीरें कैमरे में कैद की थीं। वह कारसेवकों की नजरों से बचते-बचाते फिल्म रोल को छिपाकर लखनऊ स्थित अपने अखबार के दफ्तर तक सुरक्षित पहुंचे, जिसके बाद वह तस्वीरें देश-दुनिया की सुर्खियां बनीं।
हम नए रिपोर्टर उनकी बहुत इज्जत करते थे। जब वह मुस्कुरते थे तो बहुत आकर्षक लगते थे।
खैर, मैं और थापा मेरे बजाज स्कूटर से तालकटोरा की गलियों से होते हुए फूड कारपोरशन के गोदाम पहुंचे। किसी तरह गेट के अंदर जाने दिया गया। सामने खुले में सड़े हुए गेहूं के पहाड़ थे। सारा गेहूं सड़ कर काला पड़ गया था। हमें और थापा को अंदर आता देख सुपरवाइजर सिक्योरिटी वालों के साथ दौड़ता हुआ हमारे पास आ गया। उसने छूटते ही कहा- ‘यहां तस्वीर खींचना मना है।’ उसने धमकाया अगर तस्वीर खींची तो कैमरा जब्त कर लेंगे। मैं मायूस हो गया। बिना यहां की भयावह तस्वीरों के इस खबर का कोई मतलब नहीं था। मैंने कहा-‘फोटो नहीं खींचेंगे आप गो-डाउन दिखा तो दीजिए।’ वह इस बात पर किसी तरह राजी हो गया।
हम गोदाम परिसर में उसके साथ घूमने लगे। सुपरवाइज़र साथ ही चिपका था। मैंने कई बार थापा को कोहनी मारी और आंखों से इशारा किया कि चुपके से फोटो ले लें। लेकिन थापा ने मेरे इशारों पर ध्यान भी नहीं दिया। वह गले में कैमरा लटकाए हमारे साथ बस घूम रहे थे, जैसे कोई टूरिस्ट हों। फोटो खींचने की कोई एक कोशिश तक नहीं की उनने। अंत में लौटते वक्त मुझे सबके सामने कहना पड़ा कि थापा भाई, आप फोटो खिंचो, बाद जो होगा हम देख लेंगे। ऐसे थोड़ा मना कर सकता है कोई। क्या ये सेना के असलहों का गो-डाऊन है।
सुपरवाइजर मेरी बातें सुन थोड़ा घबराया। लेकिन थापा ने मेरी यह बात भी अनसुनी कर दी। और गुस्से से मेरा पारा हाई हो गया। जैसे ही हम वापस गेट के बाहर निकले मैं थापा भाई पर बरस पड़ा। मैंने कहा-‘आपको हम लोग इत्ता बड़ा फोटोग्राफर समझते थे लेकिन मायूस कर दिया आपने।’ गुस्से में आदतन मैंने और भी कुछ बुरा भला कुछ चुभने वाला कहा होगा। याद नहीं। पर उनने जवाब में एक शब्द नहीं कहा। मुस्कुराए तक नहीं।
मैं निराश भाव से शाम को दफ्तर आया। मूड खराब था। वो हाथ से खबरें लिखने का जमाना था। अखबार के सादे रद्दी पेपर पर हम डाट पैन से खबरें लिखते थे। सिटी इंचार्ज प्रेम भाई ने मेरा मूड देख कर कहा-क्या बात है सागर इतने उदास क्यों हो आज? मैं फटने वाला था तभी मेरे पीछे से किसी ने आठ दस ब्लैक एंड वाह्इट तस्वीरें मेज पर बिखरा दीं। काले सड़े गेहूं के पहाड़ की तस्वीरें। अलग-अलग एंगल से। मैंने पीछे पलट कर देखा तो थापा भाई खड़े मुस्कुरा रहे थे। मैं हतप्रभ रह गया। मैंने उन पर नजर रखी थी। मुझे याद है एक बार भी कैमरे का लेंस अपनी आंखों से नहीं लगाया था उनने। यानी हमारे साथ घूमते वक्त वह गले में कैमरा लटकाए हुए ही ब्लाइंड तस्वीरें खींच रहे थे। मेरी अनुभवहीन बुद्धि में तब समझ आया कि फोटो खींचने के लिए लैंस से देखना जरूरी नहीं। तस्वीरें तो ऐसे भी खींची जा सकती हैं।
उन्होंने अपने लंबे करियर में यूपी के कई मुख्यमंत्रियों, बड़े राजनेताओं की ऐतिहासिक और अनसुनी तस्वीरों को क्लिक किया। हाल के वर्षों में वे भारतीय जनता पार्टी के कार्यक्रमों और संगठन के लिए भी निरंतर छायांकन करते रहे। राजनीतिक फोटो जर्नलिज्म के अलावा उन्होंने लखनऊ की बदलती तस्वीर, यहाँ की धरोहरों और आंदोलनों की कई नायाब तस्वीरें अपने अखबारों के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाईं।
कैमरे के जरिए इतिहास दर्ज करने वाले इस बहुचर्चित छायाकार का लखनऊ के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में बेहद मुफलिसी के आलम में निधन हो गया। सुबह ही खबर मिली और मन उदासी में डूब गया। उनसे जुड़ी सारी यादें आंखों के लैंस के सामने से गुज़रने लगीं। ये किस्सा याद आया।
सबसे तकलीफदेह सच यह है कि इस समर्पित छायाकार के साथ मीडिया मालिकों और अन्य संस्थाओं ने, राजनेताओं, किसी ने इंसाफ नहीं किया। जिन ऐतिहासिक तस्वीरों को बेचकर बड़े मीडिया घरानों ने सुर्खियां बटोरीं और करोड़ों कमाए, उन तस्वीरों को अपनी जान पर खेलकर खींचने वाले थापा भाई को उसका वाजिब हक, रॉयल्टी या आर्थिक सुरक्षा कभी नहीं मिली। अपने अंतिम दिनों में जब वह गंभीर रूप से बीमार हुए, तो उनके पास इलाज तक के लिए पर्याप्त पैसे तक नहीं थे।
हालांकि उत्तर प्रदेश के पत्रकारों और साथी छायाकारों ने सोशल मीडिया और आपसी सहयोग के जरिए उनके लिए आवाज उठाई और सरकार से मदद की गुहार लगाई, लेकिन वह मदद भी उनके स्वाभिमान और जरूरतों के मुकाबले बहुत कम या देर से पहुँची।
यह कहानी सिर्फ आर.बी. थापा की नहीं, बल्कि देश के कई ऐसे महान पत्रकारों की है जो जीवन भर समाज और इतिहास को अपने कैमरे व कलम से जिंदा रखते हैं, लेकिन अंत में खुद व्यवस्था और कॉरपोरेट मीडिया की बेरुखी का शिकार हो जाते हैं। विनम्र श्रद्धाजलि भाई
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