
कल अनंत अंबानी की स्पीच ने दिल को छू लिया। एक बेटे को अपने परिवार के प्रति इतना प्रेम सम्मान और संस्कारों के साथ अपनी भावनाएं व्यक्त करते देखना सचमुच भावुक कर देने वाला पल था। मुकेश अंबानी की नम आंखों में एक पिता का गर्व प्यार और भावनाओं का समंदर दिखाई दे रहा था। आखिर हर पिता की सबसे बड़ी खुशी यही होती है कि जिस बेटे के भविष्य के लिए उसने दिन रात मेहनत की वह बेटा एक दिन उसके संघर्ष त्याग और संस्कारों का मान बढ़ाए अनंत की बातों ने यह एहसास कराया कि इंसान कितना भी बड़ा क्यों न बन जाए उसकी असली पहचान उसकी दौलत से नहीं बल्कि अपने परिवार के प्रति उसके प्रेम और सम्मान से होती है दुनिया की सारी दौलत एक तरफ और अपने बेटे के मुंह से अपने संस्कारों की खूबसूरती सुनकर पिता की आंखों में छलकते आंसू एक तरफ क्योंकि पिता के लिए इससे बड़ा गर्व और सुकून शायद ही कोई हो सकता है।
-श्वेता रूबी
शरद कुमार त्रिपाठी-
कल से सोशल मीडिया पर अंबानी परिवार के बच्चों के वीडियो देख रहा हूँ। जितने बड़े मंच, जितने बड़े कॉरपोरेट इवेंट्स और जितने बड़े लोग, उतनी ही सहजता से वहाँ बच्चे अपनी मस्ती में मग्न हैं। कोई चाचा अनंत अंबानी की गोद में खेल रहा है, कोई बुआ ईशा अंबानी से फोन या कार्ड लेने की जिद कर रहा है, कोई स्टेज पर फूलों की सजावट पर पेट के बल लेटा है, तो कोई अपने बाबा मुकेश अंबानी का फोन लेने के लिए मचल रहा है। नीता अंबानी पोते को प्यार से बुला रही हैं और आकाश अंबानी मंच पर भाषण दे रहे हैं, जबकि बच्चे पीछे अपनी दुनिया में मस्त हैं।
लेकिन इन वीडियो को देखते हुए मेरे मन में एक सवाल आया कि अगर यही सब हमारे मध्यमवर्गीय घरों में हो, तो क्या हमारी प्रतिक्रिया भी ऐसी ही होगी?
जरा अपने घर का दृश्य याद कीजिए। बाबा-दादी घर पर किसी रिश्तेदार से बात कर रहे हों या फोन पर कोई जरूरी बातचीत चल रही हो और बच्चे इस तरह उछल-कूद मचाने लगें, तो सबसे पहले आवाज आएगी— “चुप रहो! यहाँ से हटो! दिख नहीं रहा, बड़े लोग बात कर रहे हैं?” कई बार तो बच्चों को डाँटकर दूसरे कमरे में भेज दिया जाता है। फोन पर बात करने वाला व्यक्ति भी झल्ला जाता है और आसपास के लोग भी बच्चों को चुप कराने में जुट जाते हैं।
हमारे यहाँ चाचा, बुआ, ताऊ और दादा-दादी तो होते हैं, लेकिन कितनी बार हम उन्हें बच्चों की ऐसी शरारतों पर इस तरह सहजता से मुस्कुराते और प्यार से संभालते देखते हैं? अक्सर हमें बच्चों का शोर अपनी इज्जत, अनुशासन और दूसरों के सामने अपनी छवि से जोड़कर देखने की आदत होती है।
और अब एक तर्क आएगा— “अरे भाई, वो अंबानी हैं! उनके पास इतना पैसा है, उन्हें क्या फर्क पड़ता है?”
तो मेरे भाई, पैसा तो अडानी के पास भी है, महिंद्रा के पास भी है, अमिताभ बच्चन के पास भी है, टाटा-बिड़ला जैसे बड़े कारोबारी परिवारों के पास भी है। देश में न जाने कितने संपन्न परिवार हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या दौलत होने भर से कोई व्यक्ति बच्चों की शरारतों को इतनी सहजता से स्वीकार करना सीख जाता है? क्या पैसे से अपने स्वभाव में अपने आप धैर्य, अपनापन और बच्चों के प्रति इतनी सहजता आ जाती है?
नहीं! पैसा आपको सुविधाएँ दे सकता है, लेकिन स्वभाव और संस्कार अपने आप नहीं खरीद सकता।
बच्चों को अनुशासन सिखाना गलत नहीं है। बच्चों को यह समझाना भी जरूरी है कि कहाँ कैसे व्यवहार करना चाहिए। लेकिन अनुशासन और हर वक्त बच्चों को चुप कराते रहना, उनमें फर्क होता है। बच्चों की हर शरारत को अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लेना और उनकी मासूमियत को सहजता से स्वीकार करना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।
मुझे इन वीडियो में सबसे अच्छी बात यही लगी कि इतने बड़े आयोजन के बीच भी परिवार के लोग बच्चों को हर पल नियंत्रित करने, उन्हें डाँटने या अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप व्यवहार करवाने में नहीं लगे दिखते। वे अपने काम भी कर रहे हैं और बच्चों को अपनी उम्र के हिसाब से व्यवहार करने की जगह भी दे रहे हैं।
और एक बात, अगर इतने बड़े कारोबारी परिवार के लोग बच्चों की उछल-कूद से परेशान हुए बिना अपना काम जारी रख सकते हैं, तो हमारे घरों में ऐसा कौन-सा कारोबार चल रहा होता है कि बच्चों के थोड़ा शोर मचाते ही हमारा धैर्य जवाब दे जाता है? हमारे पास कौन-सा ऐसा रुपया-पैसा है, जो बच्चों की शैतानी से डूब जाएगा? न हमारे घर में हजारों करोड़ रुपये का कारोबार है, न मंच पर कोई अंतरराष्ट्रीय कॉरपोरेट मीटिंग चल रही है। फिर भी हम कई बार बच्चों की छोटी-छोटी शरारतें बर्दाश्त नहीं कर पाते।
यहाँ मैं यह नहीं कह रहा कि अंबानी परिवार के लोग हर मामले में आदर्श हैं या उनके बच्चों को कोई अनुशासन नहीं सिखाया जाना चाहिए। बात सिर्फ इतनी है कि उनके इन वीडियो में जो सहजता, धैर्य और बच्चों के प्रति अपनापन दिखाई देता है, उसकी सराहना करने में हमें संकोच नहीं करना चाहिए।
संस्कार सिर्फ बच्चों को डाँटकर चुप कराना नहीं होते। संस्कार बड़ों के उस व्यवहार में भी दिखाई देते हैं, जिसे देखकर बच्चे समझते हैं कि परिवार में प्यार, अपनापन और सम्मान का मतलब क्या है।
हम अक्सर अमीरों की आलोचना करने में देर नहीं लगाते, लेकिन जब उन्हीं के व्यवहार में कोई अच्छी बात दिखाई दे, तो उसे स्वीकार करने में भी उदारता दिखानी चाहिए।
सच स्वीकार कीजिए—इन वीडियो में बच्चों से ज्यादा उनके बड़ों का व्यवहार सीखने लायक है।
दौलत उनकी अपनी जगह है, लेकिन बच्चों के प्रति उनका यह सहज और स्नेहपूर्ण व्यवहार उनकी व्यक्तिगत खूबी है। और अगर हम अपने घरों में भी बच्चों की शरारतों को थोड़े अधिक धैर्य, प्यार और मुस्कान के साथ स्वीकार करना सीख लें, तो हमारे घर भी बच्चों के लिए थोड़े और खुशनुमा बन सकते हैं।
क्योंकि आखिर में बच्चे यह याद नहीं रखेंगे कि उनके घर में कितना पैसा था, बल्कि यह याद रखेंगे कि बचपन में उनकी शरारतों पर उन्हें कितना प्यार मिला था।
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