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सुख-दुख

सवर्ण अपने सोचने जीने कहने का तरीका नहीं बदलेंगे तो नष्ट हो जाएंगे!

लक्ष्मण यादव

Laxman Yadav : मैं जाति से अहीर हूँ. पुरुष हूँ. आज़मगढ़ के एक छोटे से गाँव में नाम मात्र की ज़मीन वाले किसान परिवार में पैदा हुआ. लेकिन परिवार वालों की थोड़ी संसाधन संपन्नता के चलते दो केंद्रीय विश्वविद्यालयों में पढ़ा और पिछले दस साल से डीयू में पढ़ा रहा हूँ. दिल्ली में रहता हूँ. ये सब मेरा प्रिविलेज़ है. इस सब के बिना मेरे जैसे करोड़ों लोग बेहद अमानवीय हालातों में जीने को मजबूर हैं. वे करोड़ों लोग इसे जैसे जी रहे हैं, उसे हम वैसा समझ भी नहीं सकते.

इन पहचानों में से ‘जाति’ मेरी सामाजिक स्तरीकरण में रची गई एक पहचान है. इसे मैंने चुना नहीं. लेकिन मैं इसे नकार नहीं सकता. जब जब मैं इसे नकारने की कोशिश करता हूँ, तब तब सामाजिक सांस्कृतिक निर्मितियाँ इसे मेरे ऊपर और गहरा थोप देती हैं. जब मुझ जैसे यूनिवर्सिटी टॉपर को प्रोफ़ेसर ने बोला था कि अहिरवे भैंस गाय चराना छोड़कर टॉप करने लगे, तब झटका लगा था. आज भी अक्सरहाँ क़दम क़दम पर वही अहसास चुभाया जाता है.

एक पढ़े लिखे सक्षम युवा के इस कमेंट को बार बार पढ़ते हुए मैं अपने कमरे में बैठकर सोच रहा हूँ कि जब मुझ जैसे कमोवेश ‘प्रिविलेज़्ड’ को ‘जाति’ नहीं छोड़ रही, तो उन करोड़ों लोगों को कैसे छोड़ देगी, जिनके साथ हर तरह का अन्याय ‘जाति’ देखकर किया जाता रहा और आज भी हो रहा है. सामाजिक न्याय के हमारे पुरखे सिखा गए कि हमें जाति मुक्त समाज बनाना है. हम इसे ही अपनी वैचारिकी का मूल मानकर लिखते बोलते काम कर रहे.

‘जाति’ के नाम पर जब यह सभ्यता इतनी क्रूर है, तो इसमें आर्थिक व लैंगिक पक्ष जोड़कर देखिए कि वे करोड़ों कैसा जीवन जी रहे होंगे. जाने कितनी गालियाँ जाति के नाम पर दी जाती हैं, जाने कितनी हक़मारी जाति के नाम पर की जाती है. जाने कितने लोगों के लिए जाति उनके इंसानी वज़ूद से बड़ी बनाकर थोप दी गई. ऐसे में जब आप ‘जाति’ शब्द देखकर ही चिढ़ जाएं, नज़रंदाज़ करने लग जाएं, तब समझिएगा कि आप भी इसमें शामिल हो चुके हैं.

सामाजिक स्तरीकरण के सबसे निचले पायदान यानी दलित आदिवासी ग़रीब अशिक्षित कामगार महिला की जगह ख़ुद को रखकर सोचिए, कितना भयावह है ये सब. वे इस मानसिकता से कैसे लड़ते आए होंगे. वंचितों शोषितों की पीढ़ियों ने कितना कुछ झेला होगा और आज भी झेल रहे होंगे. मैं तो इस कमेंट पर हंस कर टाल गया, लेकिन ये हंसकर टालने वाली बात वाकई है क्या? मुझे आज भी लगता है कि असली लड़ाई गाँव के करोड़ों वंचित हर रोज़ लड़ रहे होंगे.

बस इतना ही सोच पाया इस कमेंट को पढ़कर.

डीयू के शिक्षक लक्ष्मण यादव की एफबी वॉल से.


उपरोक्त पोस्ट पर भड़ास एडिटर यशवंत का कमेंट देखें-

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