सीजेआई की खबर राजनीति के पन्ने पर और राजनीति सिर्फ खबर हो गई। बंगाल पुलिस की नालायकी मुद्दा ही नहीं है। वह सीने पर गोली खाना और आजादी दिलाना हो गया है। जेन जी को पटाने की कोशिश में पत्रकारिता?
संजय कुमार सिंह
आज दो खबरें खास हैं 1) पश्चिम बंगाल में सरकार बदलने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री पर हमले की खबर है और 2) नेशनल ऐकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज (एनएएलएसएआर), हैदराबाद के छात्रों द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) न्यायमूर्ति सूर्यकांत को मुख्य अतिथि बनाने का विरोध। पहली खबर द टेलीग्राफ में पांच कॉलम की लीड है लेकिन दि एशियन एज में यह पहले पन्ने पर चार कॉलम की खबर है। टेलीग्राफ का फ्लैग शीर्षक है – ममता, शुवेन्दू ने एक-दूसरे पर आरोप लगाए, भाजपा ने कार को निशाना बनाने में भूमिका से इनकार किया। दि एशियन एज के शीर्षक में भीड़ का गुस्सा सिंगल कोट में है और शीर्षक में ही लिखा है, भाजपा का हाथ देखती हैं। फ्लैग शीर्षक में है, मर सकती थी। इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर पहले पन्ने पर है, कार के अंदर से ली गई फोटो के साथ है लेकिन शीर्षक में लिखा है, शुवेन्दू ने कहा, ‘भाजपा का हाथ नहीं है’। नवोदय टाइम्स में यह खबर दो कॉलम में है। शीर्षक है,’चोर-चोर’ के नारे लगे। बनर्जी का आरोप – कार पर कीचड़, जूते,पत्थर फेंके। देशबन्धु में यह खबर चार कॉलम में है। हिन्दी अंग्रेजी के बाकी अखबारों में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। द हिन्दू में खबर अंदर होने की सूचना पहले पन्ने पर है। शीर्षक है, पश्चिम बंगाल के जिले में ममता को विरोध का सामना करने पड़ा। देशबन्धु में भी यह खबर पहले पन्ने पर है। शीर्षक है – ममता बनर्जी के काफिले पर हमला। हाइलाइट किए हुए अंश हैं – 1) प्रदर्शनकारियों ने फेंके जूते-चप्पल, 2) अगर कार की खिड़कियां खुली होतीं तो मेरा सिर फट जाता, हम सब मारे जा सकते थे और 3) भाजपा को सुरक्षा दे रही है पुलिस। अमर उजाला में भी खबर अंदर होने की सूचना है, ममता का आरोप – काफिले पर पथराव। मुख्य न्यायाधीश के मामले में एनएएलएसएआर के छात्रों की विश्वविद्यालय से की गई अपील मेरे किसी भी अखबार में पहले पन्ने पर नहीं है। अकेले इंडियन एक्सप्रेस ने पहले पन्ने पर बताया है कि खबर अंदर राजनीति की खबरों के पन्ने पर है। टाइम्स ऑफ इंडिया की आज की लीड मौसम की खबर है जबकि द हिन्दू की लीड अंतरराष्ट्रीय खबर है।
आज के कई अखबार ज़ेन ज़ी को खुश करने की भाजपाई कोशिशों के शिकार लगते हैं। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, रंग लाया छात्रों का आंदोलन तो दि एशियन एज की लीड रणनीति की बात करती है। शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, दिल्ली के ज़ेन ज़ी आंदोलन के बाद उत्तर प्रदेश भाजपा ने युवा रणनीति को रीसेट किया। चार कॉलम की इस लीड के नीचे चार कॉलम की खबर का शीर्षक है, मोदी ने सीडब्ल्यूजी के पदक विजेताओं की मेजबानी की। ज़ेन ज़ी को खुश करने वाली आज की सबसे ज्यादा प्रचारित खबर है, “झारखंड वार्ता नाकाम रही, छात्र आज असेम्बली मार्च करेंगे”। झारखंड की यह खबर अलग-अलग शीर्षक है भिन्न अखबारों में लीड है। अमर उजाला में मुख्य शीर्षक है, झारखंड सिविल सेवा परीक्षा रद्द। उपशीर्षक है, तीन मांगें मानीं, दो पर बात अटकी, सीजीएल की सीबीआई जांच पर अड़े छात्र। फ्लैग शीर्षक है, छात्रों ने हेमंत सरकार को झुकाया…. जेपीएससी के तीन सदस्यों का इस्तीफा। आप समझ सकते हैं कि छात्रों की मांग लगभग पूरी हो चुकी है। सीजीएल की सीबीआई जांच की मांग पर बात अटकी हुई है। खबरों से स्पष्ट है कि छात्र इसपर अड़े हैं जबकि राज्य सरकार इसके लिए तैयार नहीं है। उल्लेखनीय है कि झारखंड में गैर भाजपा सरकार है और सीबीआई की जांच का मतलब सीबीआई होकर मामला केंद्र सरकार के हाथ में चले जाना। राज्य सरकार की दिक्कत और उसका कारण समझ जा सकता है। मुख्य मंत्री ने कहा है – गड़बड़ी पकड़ ली, युवाओं को मिलेगा न्याय। देखा जाए आज विधानसभा चलो की मांग का क्या होता है। दैनिक भास्कर, देशबन्धु और नवोदय टाइम्स भी यही खबर लीड है।
जेन जी से संवाद बढ़ाने की भारत सरकार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इन कोशिशों के बीच भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) का विरोध बढ़ता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट में एक युवा अधिवक्ता द्वारा गाली दिए जाने के बाद अब नेशनल ऐकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज (एनएएलएसएआर) हैदराबाद के छात्रों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत को दीक्षांत समारोह का मुख्य अतिथि बनाए जाने पर आपत्ति की है। इससे पहले, 7 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट की पीठ (जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू) ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सांसद महुआ मोइत्रा की “आप एक सांसद हैं। राजनीति में कदम रखने के बाद, क्या आप अंडों से डरती हैं? जबकि हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने सीने पर गोलियां खाई थीं?” मुझे लगता है कि मामला स्वतंत्रता सेनानियों से तुलना का नहीं है और न अभी देश को अंग्रेजों से आजाद कराना है। सच्चाई यह है कि सुप्रीम कोर्ट के सहयोग या अनदेखी से पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस हार गई और भाजपा की सरकार बनी है। भाजपा के लोग वैसे तो तृणमूल के गद्दारों को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं लेकिन जो अभी भी उनके खिलाफ है उसपर हमले कर रहे हैं, अपमानित कर रहे हैं। दूसरी ओर, राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि वह आम लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करे पर सच्चाई यह है कि सांसद भी सुरक्षित नहीं है और सुरक्षा के लिए उन्हें सुप्रीम कोर्ट की शरण लेनी पड़ रही है। उसपर सुप्रीम कोर्ट उनकी अपील सुने या न सुने पर चुनावी राजनीति को अंग्रेज सरकार से मुकाबले जैसा बनाना तो कहीं से उचित नहीं है। खासकर तब जब आज ही पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी पर हमले की खबर है। अखबारों ने इसे भी प्रमुखता नहीं दी है। भिन्न कारणों से या स्थितियों में दोनों ही खबर महत्वपूर्ण हैं। अदालती टिप्पणी, मुख्य न्यायाधीश का विरोध और फिर ममता बनर्जी पर हमला एक दूसरे से संबद्ध न भी हों तो देश के राजनीतिक-सामाजिक हालात बताते हैं और खबर रोकने से सच नहीं हो जाएगी। अखबार वही कर रहे हैं जो भाजपा करती रही है।
इसमें राहुल गांधी की रैली को रोकने, न होने देने की कोशिश और बाद में एक कामयाब कार्यक्रम को असफल कहना – अखबारों में नहीं, अपने नाम से की गई सोशल मीडिया पोस्ट में। वहीं कमेंट में एतराज किए जाने, सच बताने के बावजूद उसपर डटे रहना भी खबर है लेकिन मुख्य न्यायाधीश से संबंधित खबर को महत्व नहीं मिला, ममता बनर्जी पर हमले की खबर को भी वह महत्व नहीं मिला है जो मिलना चाहिए। यह सही है कि एनएएलएसएआर ने अभी तक सार्वजनिक रूप से न तो दीक्षांत समारोह की तारीख घोषित की है और न ही सीजेआई की उपस्थिति की आधिकारिक तौर पर पुष्टि की गई है। फिर भी जो हुआ, कम नहीं है क्योंकि इससे मिलता-जुलता एक और मामला टीआईएसएस (टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज) का है। वहां दो अगस्त को होने वाला 86वां दीक्षांत समारोह अचानक स्थगित कर दिया गया था। सीजेआई सूर्यकांत को वहां मुख्य अतिथि होना था। ऐसा भी नहीं है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश को किसी लॉ कॉलेज या विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में स्वीकार करने से इनकार करने या उनका विरोध करने का यह पहला मामला है। इससे पहले भी देश के विभिन्न लॉ संस्थानों में छात्रों द्वारा सीजेआई या वरिष्ठ जजों को मुख्य अतिथि बनाए जाने का विरोध या उनके बहिष्कार की घटनाएँ दर्ज हैं। प्रमुख ऐतिहासिक उदाहरण एनएएलएसएआर, हैदराबाद (वर्ष 2020) का है। तब जस्टिस एसए बोबडे को दीक्षांत समारोह का मुख्य अतिथि बनाए जाने का विरोध किया गया था। एनएलएसआईयू (नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी) बेंगलुरु के दीक्षांत समारोह के दौरान तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई की उपस्थिति को लेकर छात्रों में भारी असंतोष था। वर्ष 2018 में पूर्व सीजेआई दीपक मिश्रा मुख्य अतिथि थे। सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम जजों की ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस (जिसमें मास्टर ऑफ रोस्टर के अधिकारों के दुरुपयोग के आरोप लगाए गए थे) और सीजेआई के खिलाफ लाए गए महाभियोग प्रस्ताव की पृष्ठभूमि में छात्रों के एक समूह ने दीक्षांत समारोह में काली पट्टियां पहनकर और साइलेंट प्रोटेस्ट के जरिए अपना विरोध प्रकट किया था। राष्ट्रीय कानून विश्वविद्यालयों (एनएलयू) के छात्र अक्सर न्यायपालिका के फैसलों, मौखिक टिप्पणियों या प्रशासनिक निर्णयों पर अपनी असहमति व्यक्त करने के लिए दीक्षांत समारोहों में मुख्य अतिथि के चयन का विरोध करते रहे हैं।
इसलिए खबर को प्रमुखता नहीं देने का कोई मतलब नहीं है। मुझे लगता है कि खबरें ठीक से छपें तो फिर सब पहले जैसा हो सकता है। पोल खुल जाने के बाद अब तो भाजपा शायद झूठे आरोप भी नहीं लगा पाएगी। सीजेआई से बचकर जेन जी को खुश करने की कोशिशों की खबर देता मीडिया लीड के अंतरारष्ट्रीय और मौसम की खबरों की आड़ भी ले रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है, हाल की बारिश का देश में मॉनसून की कमी पर बहुत कम असर पड़ा है। द हिन्दू की लीड का शीर्षक होगा, नेतन्याहू ने गाज़ा के लिए ट्रंप के 15-सूत्री प्रस्ताव को ठुकराया। उपशीर्षक है, इज़राइली प्रधानमंत्री ने कहा कि जब तक हमास के हथियार पूरी तरह से नहीं हटा दिए जाते, तब तक इज़राइली सेना गाज़ा से पीछे नहीं हटेगी; चुनाव से पहले दक्षिणपंथी समर्थकों के दबाव के बीच उन्होंने यह बात कही और साथ ही कहा कि वे ट्रंप को ‘चुनौती’ देने के लिए भी तैयार हैं। झारखंड छात्र आंदोलन की खबर अंग्रेजी अखबारों में दि इंडियन एक्सप्रेस में लीड है। लेकिन द टेलीग्राफ में यह सेकेंड लीड है। टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स और द हिन्दू में यह खबर लीड नहीं है लेकिन पहले पन्ने पर है। हिन्दुस्तान टाइम्स में जगह कम है, सिंगल कॉलम की खबर है लेकिन कांवड़ियों के शोर और उनकी संख्या बढ़ने के विश्वास की खबर सेकेंड लीड है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


