अमर सिंह बुरी तरह बिदक गए थे। उन्होंने मुंबई के लीलावती अस्पताल से लेकर दिल्ली के मीडिया जगत तक की खाल खींचनी शुरू कर दी थी। “ऐसा कैसे हो गया? अमिताभ बच्चन की सुरक्षा को भेदा गया!”…

संजय सिन्हा-
आप मानें या न मानें, लेकिन समय बदल गया है। मीडिया का समय बदल गया है। बात अगर सिर्फ अखबारों की होती, तो आपको पता ही नहीं चलता, क्योंकि वहां आप सिर्फ संपादक को पहचानते हैं। संपादक गया तो जो अति जागरूक पाठक होते थे, उन्हें पता चलता था कि भले ही अखबार का नाम नहीं बदला, काग़ज़ नहीं बदला, आकार नहीं बदला, लेकिन संपादक बदल गया है, इसका पता संपादकीय पढ़ कर दो-चार दिनों में लग जाता था।
ख़ैर, संजय सिन्हा की कहानी आज अख़बार की नहीं है। आज कहानी है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की स्थिति बदल जाने की। कई लोग जो सच में मीडिया का सच नहीं जानते, बस आईटी सेल की तरह तोहमतें थोप देते हैं, उन्हें बहुत से सच को जानना और समझना चाहिए। बदले वक्त को भी समझना चाहिए।
मैं आपको एक सच्ची कहानी सुनाता हूं। सर्दियों के दिन थे। साल था 2005, शायद नवंबर-दिसंबर का महीना। सदी के महानायक अमिताभ बच्चन अचानक बहुत बीमार पड़ गए थे। उस समय वे दिल्ली में थे और उन्हें एस्कॉर्ट्स अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
ये टीवी का वो दौर था, जिसे हम ‘too close for comfort’ कहते थे। अमिताभ बच्चन को एस्कॉर्ट्स अस्पताल में हार्ट की तकलीफ समझ कर भर्ती कराया गया था। लेकिन डॉक्टरों ने बताया कि हार्ट में कोई दिक्कत नहीं है, समस्या पेट में है। और रातों-रात उन्हें मुंबई ले जाया गया, और लीलावती अस्पताल में भर्ती कराया गया।
टीवी स्क्रीन पर ब्रेकिंग न्यूज़ चलने लगी, “बिग बी की तबियत नाजुक”, “स्थिति गंभीर”। अब यहां से कहानी में संजय सिन्हा की एंट्री होती है।
उस दिन मेरी ड्यूटी बतौर शिफ्ट इंचार्ज रात 11 बजे से थी। रात 11 बजे का मतलब, शिफ्ट इंचार्ज पूरी रात सुबह 6 बजे शुरू होने वाले पहले बुलेटिन की तैयारी करता है। आप यूं समझ लीजिए कि सारा दिन तो ऑफिस में न्यूज़ डायरेक्टर, आउटपुट हेड और कई सीनियर लोग होते थे, लेकिन रात का राजा होता था (और है) शिफ्ट इंचार्ज।
तो उस रात शिफ्ट का इंचार्ज मैं था। सुबह का पहला बुलेटिन मेरे नाम। किसी खबर से बुलेटिन खोलने की तैयारी हम कर चुके थे कि अचानक एकदम सुबह-सुबह (तड़के) मुंबई से रिपोर्टर का फोन असायनमेंट डेस्क पर आया। असायनमेंट डेस्क ने मुझे बताया, संजय जी, रिपोर्टर अमिताभ बच्चन से आईसीयू में मिल कर आई है। उनका वीडियो भी बना लिया है। वो वहां जुगाड़ से घुस गई थी (रिपोर्टर की दोस्ती डॉक्टर या नर्स से थी और वो उनसे पूछ कर ही गई थी)।”
हमें तो लगा कि लॉटरी लग गई है। हमने बुलेटिन अस्पताल में अमिताभ बच्चन के ‘गुड मॉर्निंग’ से शुरू कर दिया। समय था एक्सक्लूसिव का। जिसके पास एक्सक्लूसिव वीडियो, वही न्यूज़ का किंग।
ज़ाहिर है बाकी चैनलों को बहुत मिर्ची लगी होगी। चैनलों की प्रतिस्पर्धा में एक अच्छी या बुरी बात यह होती है कि जिसके हाथ वीडियो लगा, वो किंग बना और जिसके हाथ वीडियो नहीं लगा, वह नैतिकता का ठेकेदार बन गया।
“ये कैसी रिपोर्टिंग है? ये तो ग़लत है। बेचारे बीमार आदमी के कमरे में कैमरा लेकर रिपोर्टर कैसे घुस गई? अगर अमिताभ बच्चन को इन्फेक्शन हो गया तो?” ऐसे चूके हुए रिपोर्टर कहते हैं, “मौका तो मेरे पास भी था, लेकिन मैं अनैतिक रिपोर्टिंग नहीं करता/करती।”
अमिताभ बच्चन की तबियत पर देश की नज़र थी। खबर उड़ी हुई थी कि उनकी तबियत बहुत अधिक गंभीर है। ऐसे में रिपोर्टर उनसे ‘गुड मॉर्निंग’ कहकर मुस्कुराती हुई मिली, और अमिताभ बच्चन ने उसका अभिवादन भी किया वो सब वीडियो पर था।
सुबह 8 बजे नई टीम, नए शिफ्ट इंचार्ज का समय था। मेरे साथी अखिल भल्ला सुबह शिफ्ट इंचार्ज थे। आते ही उन्होंने कहा, “संजय, आज तो मज़ा आ गया। सारे दिन का मसाला मिल गया है।” मैं मन ही मन खुश था। मैं रात भर के काम की लिस्ट अखिल को पकड़ा कर घर चला गया।
इधर अमिताभ बच्चन के ‘उन दिनों’ के सखा अमर सिंह की नींद खुली, तो उन्हें पता चला कि ‘आज तक’ पर अमिताभ बच्चन की खबर आ रही है। रिपोर्टर कमरे में जाकर उनसे मिल आई है। ऐसा कैसे हुआ? उनके दोस्त से कोई रिपोर्टर बिना उनकी अनुमति के कैसे मिल आई?
दोस्त का दिल दहल गया। उन्होंने ‘आज तक’ के ऑफिस में फोन किया। किसी ने अधिक भाव नहीं दिया। अब उनका ‘ईगो’ जाग गया। वो संसार में सभी के दोस्त थे। दोस्त तो मेरे भी थे, जब मैं जनसत्ता में था, तो वे प्रेस रिलीज़ लेकर छपवाने आते थे। फिर ज़ी न्यूज़ में था तो वे मुलायम सिंह यादव के इंग्लिश वाले सलाहकार (प्रवक्ता) थे। और मेरे कुछ दिनों के ‘सहारा न्यूज़’ के समय में वे पर्दे के पीछे सर्वेसर्वा (कुछ खास) थे।
धीरे-धीरे अमर सिंह को लोग नेता कम ‘सेटर’ के रूप में अधिक जानने लगे थे। फिल्मी कलाकार उनसे सलाह लेकर मुंह खोलते/खोलती थीं। नेता उनसे सटते थे, क्योंकि उनकी सेटिंग दूर तक (हर पार्टी में) थी। बहुत पहले ऐसे लोग अपने मन माफिक खबरों को छपवाने के लिए अखबार में संपादकों को सेट करते थे, लेकिन अमर सिंह ने सीधे हर संस्थान के मालिकों को सेट किया हुआ था।
अब सुनिए उस सुबह मेरे घर जाने के बाद हुआ- अमर सिंह बुरी तरह बिदक गए थे। उन्होंने मुंबई के लीलावती अस्पताल से लेकर दिल्ली के मीडिया जगत तक की खाल खींचनी शुरू कर दी थी। “ऐसा कैसे हो गया? अमिताभ बच्चन की सुरक्षा को भेदा गया!”
अब बाकी चैनल नैतिक हो चुके थे, और हम पिट रहे थे। मैंने आज तक अगस्त 2005 में ही ज्वाइन किया था। थोड़ा नया ही था। शुरुआत में नाइट ड्यूटी होने से अधिक लोगों से परिचय भी नहीं हो पाया था।
खैर, कहानी आगे बढ़ी। अमर सिंह ने बहुत हो-हल्ला किया। इतना ही नहीं, प्रेस कॉन्फ्रेंस करके ‘आज तक’ की इस हरकत की निंदा की। अब तलाश शुरू हुई- कसूरवार कौन? मुझे नहीं पता उस दिन उस रिपोर्टर का क्या हुआ, लेकिन मेरे पास न्यूज़ डायरेक्टर कमर वहीद नक़वी जी का फोन आया। हालांकि वे उस समय पारिवारिक छुट्टी मनाने गए, शायद गोवा में थे। उनका फोन आया, “संजय जी, आपने अमिताभ बच्चन की खबर कैसे चला दी?”
“कैसे चला दी? “रिपोर्टर सुबह अस्पताल गई थी। बच्चन साहब से मिली थी। तो इसमें न चलाने जैसी क्या बात थी? अच्छी ब्रेकिंग खबर थी तो उसे चलाना ही था। ये तो एक्सक्लूसिव खबर थी। पूरे देश की नज़र लोग अमिताभ बच्चन के स्वास्थ्य अपडेट पर लगी है, ऐसे में अमिताभ से मिल कर, उनसे बात करके रिपोर्टर आई है, लोग वाह-वाह कर रहे हैं।”
नक़वी जी बोले, “संजय जी, आप कुछ भी कर देते हैं। मुझसे एक बार पूछ लेते। अब ऊपर जवाब देना पड़ रहा है।” मैं घर में था और मुझे उधर अमर सिंह के उपद्रव का भान नहीं था।
मैंने कहा, “सर, आपको मुश्किल आ रही है तो ऊपर मैं बता दूंगा कि खबर आई तो चलनी ही थी। मुझे इसमें कुछ अटपटा नहीं लगा। रही बात पूछने की, तो आप छुट्टी पर हैं। अब आधी रात या तड़के फोन करके आपसे अनुमति क्यों लेता?”
नकवी जी ने कहा कि आप आउटपुट हेड से बात कर लेते। “सर, आउटपुट हेड भी छुट्टी पर अपने घर गए हुए हैं। तो किससे पूछता? और इसमें विवाद क्या है? अमिताभ बच्चन की खैरियत ही तो दिखाई गई है।”
नकवी जी समझ गए थे कि बात उतनी बड़ी या बुरी नहीं थी, असली मसला थे अमर सिंह। नकवी जी ने धीरे से कहा, “चेयरमैन पूछ रहे थे (चेयरमैन उस समय विदेश यात्रा पर थे)।” मैंने कहा, “आप उनसे कह दीजिए कि आप छुट्टी पर हैं, पीछे से लोगों ने खबर चला दी है। और रही बात मेरी तो मेरा जो होना है होगा। क्या होगा? नौकरी चली जाएगी? कोई बात नहीं।”
इधर अमर सिंह ने फोन पर इंटरव्यू दिया, प्रेस कांफ्रेंस की, गालियां दीं। जो संभव था, वो सब कर चुके थे। वो दोषियों को दंड देने की मांग कर रहे थे।
नक़वी जी का फोन रखा तो आउटपुट हेड का फोन आया। मेरा जवाब वही था, “मुझे जो उचित लगा, मैंने किया।” बात यहीं खत्म हो गई। सबने अपनी औपचारिकता पूरी कर ली।
हां, यह बताना ज़रूरी है कि इनपुट हेड आशुतोष, ने खुलकर अमर सिंह को जवाब दिया था। तब जबकि अमर सिंह ने आज तक पर अमिताभ की खबर दिखाए जाने की तीव्र निंदा की थी और चैनल पर गोपनीयता भंग का आरोप लगाते हुए कानूनी नोटिस भेजने तक की बात कह रहे थे। आशुतोष ने काफी बचाव किया था।
यह कहानी वहीं खत्म हो गई। मुझे शुरू में लगा कि मुझे मेमो दिया जाएगा, या शायद टाटा ही कर दिया जाऊंगा। मैं अमर सिंह को जानता था, वो किसी बात के पीछे पड़ते थे तो मूंछ की लड़ाई बना लेते थे। मैं रात में फिर ड्यूटी पर गया। पर मुझसे किसी ने कुछ नहीं कहा। न कोई मेमो, न किसी की डांट। दिन पर जो हुआ, रात में मेरे लिए बात खत्म हो गई थी। मेरी नौकरी बची रही थी और उसके बाद 16 साल तक बची रही, जब तक मैंने टाइम्स नेटवर्क के नए आने वाले न्यूज़ चैनल टाइम्स नाऊ नवभारत में जाने के लिए खुद इस्तीफा नहीं दे दिया।
अपने 16 साल के करियर में मैं आज तक में कई प्रमोशन पाया, चैनल हेड बना। ये कहानी नहीं, सच्चाई है। मैंने आज जो कहानी सुनाई, वो बहुत निजी भी नहीं है, क्योंकि उस समय के सभी लोगों के सामने की घटना है। फर्क बस इतना है कि संजय सिन्हा को हर बात सिलसिलेवार याद रहती है।
कहानी का मर्म क्या है? कोई कहानी बिना मर्म के पूरी हो सकती है?
मर्म यह है, वो मीडिया का ऐसा दौर था, जब किसी बाहरी शक्ति के कहने या चाहने मात्र से चैनल मालिक अपने स्टाफ को नौकरी से नहीं निकालते थे। नौकरी से निकाला जा सकता था, किसी अनुशासन के उल्लंघन पर, जांच के बाद। ऐसा नहीं था कि किसी ने कह दिया (चाहे प्रधानमंत्री ही क्यों न हों), और किसी की नौकरी बिना दोष सिद्ध हुए चली जाए।
मेरी समझ में तब ऐसा नहीं होता था। आप लाख कहें कि मीडिया ने घुटने कब नहीं टेके? लेकिन सच यही है कि तब नहीं टेके थे।
दोस्ती-यारी, विज्ञापन पाने की मजबूरी तब भी थी लेकिन ऐसा भी नहीं था कि सब कुछ उसी नाम पर न्योछावर था। किसी एक नेता, अभिनेता या विज्ञान दाता के इशारे पर सब हो जाए ऐसा नहीं था। अधिक से अधिक पूछ लिया जाता था। लेकिन नौकरी इतनी कच्ची नहीं होती थी। मेरी नौकरी बची रही।
दूसरी घटना आपको मैंने आपको कल बताई थी कि एक प्रतिष्ठित चॉकलेट कंपनी के खिलाफ मैंने व्यक्तिगत खबर चलाई थी कि कैसे चॉकलेट में लोहे का तार निकला। यह सच है कि खबर एक बार चलने के बाद रोक दी गई थी, जाहिर है, सेल्स हेड के कहने पर (विज्ञापन के दबाव में)। लेकिन मुझसे किसी ने यह नहीं पूछा था कि खबर चली कैसे? उल्टे मुझसे यह कहा गया था कि इस खबर पर कंपनी की जांच के बाद विस्तार से इसे मु्द्दा बना कर चलाएंगे, क्योंकि उन दिनों चॉकलेट में कीड़े की खबर खूब चल चुकी थी और कंपनी बहुत दबाव में थी।
लेकिन अब समय बदल गया है। किसी के कहने से नौकरी मिल सकती है, तो कहने से जा भी सकती है। पिछले 11 वर्षों में मीडिया में बड़ा बदलाव आया है।
रिपोर्टर झुके नहीं हैं, प्रबंधन मजबूर हो गए है (कर दिया गया है)। जिनके मन में संदेह है कि मीडिया पहले भी ऐसी ही थी, गोदी, लिबरांडू, कामी, वामी, तो सच्चाई यह है कि तब मीडिया ऐसी नहीं थी।
हो सकता है कुछ पत्रकार ऐसे रहे हो, हो सकता है आपका पाला छुटभैये चैनलों के ऐसे मालिकों, रिपोर्टरों से पड़ा हो, जो किसी और धंधे को बचाने के लिए मीडिया का सहारा लेकर बाजार में उतरते हैं, लेकिन मेनस्ट्रीम मीडिया तमाम व्यापारिक लोभ के बावजूद आंखों का पानी सूखने नहीं देती थी। उस काल में आंखों में हया का पानी था। वही साहस था।
मौका मिला तो कल आपको एक और कहानी सुनाऊंगा, जिसमें मीडिया का तना चेहरा आप देख पाएंगे। ये वो कहानियां हैं, जो कहीं छपी नहीं है, जो मेरी भोगी हुई हैं। मैं किसी और की कहानी नहीं सुनाता। अपनी सुनाता हूं। सच सुनाता हूं। कहानी सुनाते हुए मर्यादा का पूरा ख्याल रखता हूं। मेरे पास आज पाने और खोने को कुछ नहीं है। जो है बस यादें हैं। जो कहता हूं महाभारत के संजय की तरह सत्य कहता हूं। बिना लाग लपेट या किसी दुविधा के। ये सच है कि तब भी मीडिया का मतलब बिजनेस ही था। लेकिन बिजनेस लेटा हुआ नहीं था।
नोट-
- यह तो आप भी मानेंगे कि एक समय था जब आप किसी खबर की सच्चाई के लिए टीवी ही ऑन करते थे। न्यूज चैनल का ऑन किया जाना 2014 तक भरोसे के साथ कायम था।
- इस सच से आप इंकार नहीं कर सकते अब मीडिया चर्चा का मु्द्दा हो सकता है, लेकिन खबरों की सच्चाई से आपका भरोसा उठ गया है। और इसके लिए कोई नए आए पत्रकार जिम्मेदार नहीं है, वही पुराने वाले लोग ही हैं, जिन्होंने पहले भरोसा कायम किया था। सब इतना धीरे-धीरे हुआ है कि उन्हें भी पता नहीं चला कि कब क्या और कैसे हो गया।
- स्थिति पहले अगर निंदनीय थी तो अब दयनीय है।
- ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर मेरे शुरुआती दिनों की है- टीम आज तक।



