लखनऊ/देवरिया। वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर को लेकर एक बार फिर यूपी पुलिस की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में आ गई है। अमिताभ ठाकुर के पुलिस वैन से उतरते समय वीडियो रिकॉर्ड करने से मीडिया और मौजूद लोगों को कथित तौर पर मना किए जाने का मामला सामने आया है। इस घटना को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं और इसे “तानाशाही” करार दिया जा रहा है।
बताया जा रहा है कि जब अमिताभ ठाकुर को पुलिस वैन से उतारा जा रहा था, उस दौरान किसी भी तरह की वीडियो रिकॉर्डिंग की अनुमति नहीं दी गई। आरोप है कि मौके पर मीडिया कर्मियों की मौजूदगी भी न के बराबर थी, जिससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या मीडिया को जानबूझकर पूरी तरह दूर रखा गया।
इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर अमिताभ ठाकुर जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे। कई यूजर्स ने उत्तर प्रदेश पुलिस, डीजीपी यूपी, राज्य सरकार और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को टैग करते हुए आरोप लगाया कि सरकार आलोचनात्मक आवाज़ों से डर रही है और अब मीडिया की स्वतंत्रता पर भी सीधा अंकुश लगाया जा रहा है।
आलोचकों का कहना है कि किसी व्यक्ति को सार्वजनिक स्थान पर पुलिस वैन से उतारते समय वीडियो बनाने से रोकना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। उनका आरोप है कि यह न सिर्फ अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला है, बल्कि यह दिखाता है कि सरकार और प्रशासन पारदर्शिता से बचना चाहते हैं।
आजाद अधिकार सेना बलिया के जिला उपाध्यक्ष सिंहासन चौहान ने भड़ास से हुई बातचीत में बताया कि, आज 6 जनवरी को देवरिया कोर्ट में अमिताभ ठाकुर की जमानत याचिका पर सुनवाई होनी है। चप्पे चप्पे पर पुलिस का सख्त पहरा है। मीडियाकर्मियों को बहुत पीछे रोक दिया गया है। वहीं, अमिताभ के समर्थकों और पार्टी पदाधिकारियों तक को उनसे दूर रखा जा रहा है। फोटो वीडियो तक लेने की मनाही है। गजब हाल है।
फिलहाल इस मामले पर पुलिस या सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन घटना ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश में पुलिस की भूमिका, सत्ता की असहिष्णुता और मीडिया की आज़ादी को लेकर बहस तेज कर दी है।
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