
डिजिटल इंडिया में यूएसएड के 21 मिलियन डॉलर का अब तक पता नहीं चला है, सरकार और भाजपा फूहड़ राजनीति में लगी है मीडिया का बड़ा हिस्सा चीयर लीडर बना हुआ है, राजा का बाजा बजा रहा है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर के बाद अब फाइनेंशियल एक्सप्रेस का ‘फैक्टचेक’ आया है।
संजय कुमार सिंह
यूएसएड के 21 मिलियन डॉलर भारत आये कि नहीं, आये तो किसने खर्च किये और बांग्लादेश के लिए थे तो सरकार क्यों नहीं बोल रही है – यह सब अखबारों की खबरों से समझ नहीं आ रहा है। सच कहिये तो ज्यादातर अखबारों में आज ऐसी कोई खबर ही नहीं है। दूसरी ओर, इंडियन एक्सप्रेस की खबर अगर सही है तो दूसरे अखबार यही गाना क्यों नहीं गा रहे हैं, सरकार क्यों नहीं कह रही है और फाइनेंशियल एक्सप्रेस ने ट्रम्प के दावे का फैक्ट चेक कर क्यों कहा है, यूएसएड ने भारत के चुनावों के लिए 21 मिलियन डॉलर की सहायता नहीं दी। फाइनेंशियल एक्सप्रेस ने लिखा है कि इंडियन एक्सप्रेस ने जो जानकारी हासिल की है उसके अनुसार यह राशि 2022 में मंजूर की गई थी और इसमें से 13.4 मिलियन डॉलर का भुगतान हो चुका है। अगर मामला इतना ही सीधा है तो यह बात भारत सरकार क्यों नहीं कह रही है। भाजपा के नेता अलग आरोप क्यों लगा रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह ने डोनाल्ड ट्रम्प के एक वीडियो के साथ कल लिखा था, अब बोलो, यूएसएड के संबंध में अपने तीसरे बयान में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि 21 मिलियन डॉलर उनके दोस्त मोदीजी को वोटर टर्न आउट बढ़ाने के लिए दिये गये। इन्हीं के बयान पर तीन दिन से गोदी मीडिया, देश के उपराष्ट्रपति, बीजेपी के तमाम शीर्ष नेता, प्रवक्ता, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और आईसी सेल के पेड अनपेड लाखों पैदल सैनिक कांग्रेस / राहुल गांधी से हिसाब मांग रहे थे। अब मोदीजी बतायें कि ये 21 मिलियन कब कब कैसे कैसे उन्होंने प्राप्त किए या यह सिर्फ़ गप्प है?”
यह सब इसलिए कि वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत टंडन ने लिखा है, “ट्रंप ने यूएसएढ के 21 मिलियन डॉलर में मोदी का नाम लेकर सरकार को दबाव में ले लिया है। अब अमेरिका मोदी से वो सब करायेगा को उसे चाहिये। पहला काम वो टेस्ला की इलेक्ट्रिक कार की भारत के बाजार आसान शर्तो पर एंट्री कराएगा। ये हुआ तो भारत की ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री बैठ जाएगी। 60 लाख कारों की सालाना खपत वाला भारत एक बड़ा बाजार है। इसी तरह स्टील और एल्यूमीनियम में 25% इंपोर्ट ड्यूटी लगा कर ट्रंप भारत को इन दोनों धातुओं का डंपिंग यार्ड बना देगा। इन दोनों मामलों पर मोदी भारत का हित मनवाने में कामयाब हो जायेंगे ऐसा लगता नहीं है। मोदी अमेरिका को भारत में अपनी राजनीति चमकाने के लिये इस्तेमाल कर रहे थे। ट्रंप एक चालाक राजनीतिज्ञ है. उसने मोदी की कमज़ोरी भांप ली और अपनी जमीन को राजनीति के लिये इस्तेमाल करने की कीमत तो वसूलेगा ही। 2014 के बाद एक अजीब स्थिति पैदा हुई जब देश के उद्योगपतियों ने सीधे तौर पर राजनीति में हिस्सा लिया। खुल कर मोदी और उनकी ध्रुवीकरण की राजनीति का साथ दिया। हजारों करोड़ खर्च करके टीवी चैनल लगाए जो सिर्फ दो काम करते है मोदी का गुणगान और सामाजिक द्वेष पैदा करना। उद्योगपतियों को सोचना चाहिये कि जिसके लिए उन्होंने ये सब किया वो अब उनके साथ नहीं है। उसे सिर्फ अडानी को बचाना है।” स्पष्ट है कि मामला सिर्फ नरेन्द्र मोदी या संघ परिवार के चुनाव लड़ने और जीतने का नहीं है। इसका संबंध देश, राजनीत और आम आदमी की दशा से है और यह पहली बार है कि इतनी बड़ी संख्या में लोग मुफ्त के राशन पर जी और कुम्भ नहाकर खुश हैं।
मुद्दा यह है कि भारत को 21 मिलियन मिलने की बात हुई तो कांग्रेस पर थोप दिया गया, इसपर यकीन मुश्किल है तो इंडियन एक्सप्रेस ने कह दिया कि वह बांग्लादेश के लिए था और ट्रम्प ने साफ-साफ कहा कि यह पैसा उनके मित्र मोदी और भारत के लिए था तो फाइनेंशियल एक्सप्रेस ने ‘फैक्ट चेक‘ कर दिया। दूसरे अखबारों ने आज यह खबर ही नहीं छापी (पहले पन्ने पर)। और बात इतनी ही नहीं है। आज यह चर्चा भी अखबारों की सुर्खियों में नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि पैसे अगर भारत में आये और खर्च हुए हैं तो भारत सरकार को मालूम होना चाहिये, नहीं मालूम थे तो जब ट्रम्प ने कहा उसके बाद मालूम करके वास्तविकता बताई जानी चाहिये थी और मामले को घुमाने की कोशिश नहीं की गई होती तो (शायद) ट्रम्प को सीधे भारत और मोदी कहने की जरूरत नहीं पड़ती वरना क्यों पड़ी यह भी खबरों के लिए खोज का विषय है। अगर यह ट्रम्प-मोदी का दोस्ताना है तो अखबार यही क्यों नहीं कह रहे हैं। सरकार जो कर रही है वह तो दिख ही रहा है फिर भी आज दैनिक जागरण की लीड का शीर्षक है, यूएसएड की मदद से भारत में राजनीति प्रभावित करने वालों की पड़ताल शुरू। ईडी व अन्य एजेंसियां ऐसे एनजीओ, संस्थाओं और व्यक्तियों की पहचान में जुटीं। मुझे नहीं लगता है कि इन एजेंसियों को इसकी जानकारी अभी तक नहीं होना सामान्य है और अब अगर ये जांच कर रही हैं तो कुछ मिलेगा। कोई ताज्जुब नहीं अगर इस जांच का भी वही हो जो अदाणी के 20,000 करोड़ का हुआ है। जो गंभीरता से आवाज उठायेगा जेल जायेगा। सांसद हुआ तो सदस्यता चली जायेगी। आपको यह सब सामान्य और सही या अच्छा लगता हो तो लगे, मेरा सवाल है कि सरकार को पता कैसे नहीं है और इतना समय क्यों लग रहा है। यही नहीं देशी मामले में विदेशी हस्तक्षेप के इस उदाहरण को गंभीरता से लेकर सच्चाई बताने में सरकार और भाजपा जल्दी क्यों नहीं दिखा रही है। मीडिया तो जो कर रहा है वह आपको बता ही रहा हूं। फाइनेंशियल एक्सप्रेस की मानें तो ट्रम्प झूठ / गलत बोल रहे हैं। पर वह भी खबर नहीं है।

भारतीय (या बांग्लादेशी) चुनावों को प्रभावित करने की खबरों के संबंध में जो हो रहा है उसमें भारत सरकार से सवाल करना मुश्किल हो तो उसे जस का तस रिपोर्ट करने का माद्दा भी देश के ज्यादातर अखबारों में नहीं है। अगर सवाल पूछने या उठाने में सरकार से डर लगता है तो पाठकों को यह जानकारी देने में क्या दिक्कत थी कि भारत सरकार ने इस मामले में अभी तक कुछ नहीं कहा है। (जांच करायेंगे – कहने का कोई मतलब नहीं है।) और स्थिति इमरजेंसी वाली ही है, झुकने के लिए कहा गया तो रेंगने लगे। कुल मिलाकर, भारत में विदेश से सरकार या देश के मामलों में हस्तक्षेप के लिए 21 मिलियन अमेरिकी डॉलर की राशि आने और खर्च होने का आरोप है। दूसरी ओर सरकार को पता ही नहीं चला। जब ट्रम्प ने घोषणा कर दी जो रोज नई कहानी और वह भी अविश्वसनीय किन्तु सत्य किस्म की। यह सब तो खबर है ही। सहायता राशि नहीं आई है तो सरकार को कहना चाहिये कि नहीं आई है। अखबारों को इतना बताने में क्या दिक्कत होनी चाहिये। आप समझिये और तय कीजिये कि अखबार खरीद कर पढ़ना कितना सार्थक है। खासकर तब जब जो हो रहा है वह मेरे कुछ ही अखबारों में पहले पन्ने पर है। इंडियन एक्सप्रेस में इस मामले में पहले पन्ने पर कुछ नहीं है। यही नहीं, हिन्दुस्तान टाइम्स, दि एशियन एज, अमर उजाला और नवोदय टाइम्स में भी आज ऐसी कोई खबर नहीं है। टाइम्स ऑफ इंडिया में वाशिंगटन डेटलाइन से खबर का शीर्षक है, यूएसएड से संबंधित दावों से ट्रम्प ने ना विपक्ष ना ही सरकार को बख्शा। द हिन्दू ने दो कॉलम की खबर के रूप में कांग्रेस की मांग को पहले पन्ने पर रखा है। शीर्षक है, यूएसएड फंड्स पर ट्रम्प के दावों पर प्रधानमंत्री को जवाब देना चाहिये।
द टेलीग्राफ में यह खबर लीड है। फ्लैग शीर्षक है, ‘21 मिलियन डॉलर मोदी को’, विपक्ष के लिए गोला बारूद। मुख्य शीर्षक है, अबकी बार उसपर यूएसएड की मार। खबर इस प्रकार है, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को कहा कि यूएसएड ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को “मतदान बढ़ाने के लिए” 21 मिलियन डॉलर दिए है। एक दिन पहले उन्होंने इस फंडिंग को “किकबैक स्कीम” कहा था। उनकी ताजा टिप्पणी भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही है। भारत की सत्तारूढ़ पार्टी ने पूरे हफ्ते सहायता एजेंसी की फंडिंग प्राथमिकताओं पर व्हाइट हाउस से आने वाले बयानों का इस्तेमाल किया। ट्रंप ने इसे बंद करने का फैसला किया है। सरकार ने अभी तक के बयानों का उपयोग राहुल गांधी और कांग्रेस को निशाना बनाने के लिए किया है। अब जब व्हाइट हाउस में गवर्नर्स वर्किंग सेशन को संबोधित करते हुए ट्रंप ने लगातार तीसरे दिन मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए भारत को यूएसएड की फंडिंग का मुद्दा उठाया “और भारत में मतदान बढ़ाने के लिए मेरे मित्र प्रधानमंत्री मोदी को 21 मिलियन डॉलर दिए जाने की सूचना दी तो यह भी कहा कि हम भारत में मतदान बढ़ाने के लिए 21 मिलियन डॉलर दे रहे हैं। हमारा क्या? मैं भी चाहता हूं कि मतदान ज्यादा हो।” उन्होंने कहा।
एक दिन पहले, ट्रंप ने इस फंडिंग को “रिश्वत योजना” बताया था, जबकि इससे पहले उन्होंने कहा था कि यूएसएड ने भारत में मतदान के लिए 21 मिलियन डॉलर खर्च किए हैं, ताकि “किसी और को चुना जा सके”। ट्रंप ने यह नहीं बताया कि “कोई और” कौन था। भाजपा, जिसने पहले भी कांग्रेस पर चुनाव जीतने के लिए विदेशी मदद लेने का आरोप लगाया है, ने राहुल पर भारतीय लोकतंत्र को कमजोर करने का आरोप लगाने के लिए उनकी टिप्पणियों का इस्तेमाल किया। मोदी सरकार ने यह बताने से इनकार कर दिया है कि यह पैसा भारत में आया है कि नहीं और आया है तो सरकार की ओर से या एनजीओ की ओर से। जबकि इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट थी कि यह फंडिंग भारत के लिए नहीं बल्कि बांग्लादेश के लिए थी। कांग्रेस, जो भारत में आए सभी यूएसएड फंडिंग पर श्वेत पत्र की मांग कर रही है, ने ट्रंप की हालिया टिप्पणी पर भाजपा की चुप्पी पर सवाल उठाया, जबकि उसने उनके पिछले बयानों को सत्य मान लिया था। भाजपा के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने पहले का एक वीडियो क्लिप पोस्ट किया और कहा: “लगातार तीसरे दिन, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत में मतदान को बढ़ावा देने के लिए यूएसएड के फंडिंग प्रयासों के बारे में अपना दावा दोहराया।” उन्होंने ट्रंप का हवाला दिया, लेकिन मोदी का जिक्र नहीं किया।
दूसरी ओर, एक संवाददाता सम्मेलन में कांग्रेस मीडिया विंग के अध्यक्ष पवन खेड़ा ने मांग की कि मोदी “अपने मित्र अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप से बात करें और उन पर लगे इस आरोप का जोरदार खंडन करें कि अमेरिका उन्हें और भारत को मतदान बढ़ाने के लिए 21 मिलियन डॉलर देने वाला है।” उन्होंने मांग की कि आरएसएस-भाजपा और उसके इको सिस्टम का “नाम लेकर शर्मसार” किया जाना चाहिए और विदेशी फंडिंग के संबंध में “विश्वसनीय नागरिक समाज के सदस्यों, गैर सरकारी संगठनों, राजनीतिक दलों” के बारे में झूठ बोलने के लिए मुकदमा चलाया जाना चाहिए। खेड़ा ने रेखांकित किया कि “लोकतांत्रिक भागीदारी और नागरिक समाज” के उद्देश्य से यूएसएड ($3,65,000) का पहला बैच 2012-13 में ऐसे समय में आया था जब अन्ना हजारे आंदोलन अपने चरम पर था, अरविंद केजरीवाल अपनी पार्टी बना रहे थे और गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने की तैयारी कर रहे थे। खेड़ा ने सवाल किया “तो, इन पैसों से किसे फायदा हुआ? लोकसभा में 282 सीटें किसे मिलीं?” उन्होंने बताया कि कैसे “यूएसएड ने अक्टूबर 2016 में कैशलेस इंडिया अभियान शुरू किया, जो (मोदी के) नोटबंदी आपदा से एक महीने पहले था…” खेड़ा ने “मोदीजी के बहुप्रचारित स्वच्छ भारत अभियान” पर यूएसएआईडी की “मोहर” को भी चिह्नित किया।
कहने की जरूरत नहीं है कि जो चल रहा है उसकी यह रिपोर्ट है। अच्छी हो या बुरी – जरूरी है। दूसरे कई अखबारों में नहीं है। अनुवाद की गुणवत्ता के लिए माफी चाहता हूं। यह गूगल का अनुवाद है जिसका संपादन मैंने जल्दी में किया है। इसलिए संभव है पढ़ने में प्रवाह ठीक न लगे। मेरा मकसद मुद्दे की चर्चा करना है और बताना है कि बाकी के अखबारों के लिए यह खबर नहीं है और इसमें कांग्रेस के आरोप या पक्ष भी है। आपने भाजपा के आरोप तो पढ़ें होंगे पर कांग्रेस का यह जवाब नहीं जानेंगे तो वोट देने के लिए सही निर्णय कैसे कर पायेंगे? अगर ईवीएम ठीक हो और मतदाता सूची से छेड़-छाड़ नहीं हुई तो आपके वोट से ही सरकार बनेगी जो सिस्टम बनाएगी। वह शिक्षा, अस्पताल और सुविधाओं की बजाय कुम्भ स्नान या किसी अन्य धार्मिक गतिविधि से ‘मोक्ष’ दिलायेगा। आपको हिन्दुओं की भलाई जरूरी लगती हो तो एक बार सोचियेगा, देश को टाटा जैसा औद्योगिक साम्राज्य देने वाला पारसी समुदाय खत्म हो रहा है तो किसी को चिन्ता क्यों नहीं है और गंदे पानी में नहाकर खुद को खुशकिस्मत समझने वाले क्यों नहीं अपना पेट भरने भर भी कमा पा रहे हैं।
द टेलीग्राफ की खबर से लगता है कि पैसे आये नहीं हैं, आने थे और इसका कुछ हिस्सा ही आया है और अगर उसका उपयोग कांग्रेस ने किया तो भाजपा ने भी किया है और संभावना इसी की है कि कंग्रेस ने किया भी हो तो 2009 में या उससे पहले किया होगा। भाजपा को अगर कांग्रेस का विरोध करना है तो 2009 (या उससे पहले के लिये) कर रही है लेकिन 2014 से 2024 तक क्या हुआ उसपर चुप है। आरोपों के बावजूद। एक राजनीतिक दल के रूप में भाजपा यह सब कर रही है तो उसकी राजनीति और नैतिकता हो सकती है लेकिन अखबार सरकारी विज्ञापनों के लिए राजा का बाजा बजा रहे हैं तो उनकी विश्वसनीयता संदिग्ध है और यह आपको जानना चाहिये। मैं यही कोशिश कर रहा हूं। इसके लिए मैं रोज दो हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल आठ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद पेश करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं।


