अनुराग द्वारी-
डेस्क से पीड़ित रिपोर्टर प्रजाति के लिये …खबर तैयार है, घटना मंगवा लीजिए ….
मैं हास्य मानता हूं, आप विडंबना, दुर्घटना, हादसा कुछ भी कह लीजिये …. लेकिन न्यूज़रूम में अनुप्रास की अभिव्यक्ति के परिधान में जो व्यक्ति बैठे हैं, कविता उन्होंने बरसों से नहीं लिखी, लेकिन तथ्यों से उनकी स्वतंत्रता बनी हुई है …
साहित्य में जिस चीज़ को कल्पना कहते हैं, पत्रकारिता में उसे बरतकर वो अब कवि हो गए हैं … ज्यादातर वीर रस में लिखते हैं … लेकिन कभी कभी करूणा भी …
अब देखिये … सामने एक खबर आई … किसी की मृत्यु हुई थी … तस्वीर किसी और की लगा दी गई … जिनकी तस्वीर लगी, उन्होंने जीवित होने की आपत्ति दर्ज कराई …
कवि को लगता है ये अनावश्यक हस्तक्षेप है …. अब खबर तो चल चुकी है … कोई अपने जीवित होने का निजी तथ्य लेकर पूरी संपादकीय व्यवस्था को गलत ठहराने लगे, तो संस्था कैसे चलेगी?
कवि जी ने जिले के संवाददाता से बस पूछा होगा … नाम तो वही था?
जी … फिर? … इस “फिर” में पत्रकारिता के पिछले कई वर्षों का विकास समाया हुआ है…
पहले नाम मिलने पर खोज शुरू होती थी … अब नाम मिलते ही पूरी हो जाती है …
डेस्क पर बैठे इन कवियों की सबसे बड़ी उपलब्धि ये है कि इन्होंने समाचार को घटना की गुलामी से मुक्त कर दिया है … पहले कुछ होता था, तब खबर बनती थी … अब खबर बन जाती है, फिर संवाददाता को भेजा जाता है कि इसके समर्थन में कुछ घटित होता हुआ ले आए …
रिपोर्टर ने फोन किया … सर, यहां मामला कुछ और है … कवि जी नाराज़ हो जाते हैं, मामला कुछ और कैसे हो सकता है? मामला तो सुबह की मीटिंग में तय हो चुका है … लेकिन मामला बिगड़ा, या बॉस ने सवाल पूछा तो फिर कवि नाराज़ हो जाते हैं …
फिर सवाल … तुम मौके पर हो या हम?
रिपोर्टर कहना चाहता था कि मौके पर तो वही है … फिर उसे अपना वेतन याद आ गया…
ग्राउंड रिपोर्टिंग की यही दिक्कत है … वो ऐसे तथ्य उठा लाती है जो बनी-बनाई हेडलाइन में फिट नहीं होते … कभी पीड़ित का बयान अलग निकल आता है, कभी आरोपी कोई दूसरा होता है, कभी जिस गांव में मातम भेजा गया है, वहां लोग पूछते हैं … किस बात का?
इसलिए अब रिपोर्टर को सीमित जिम्मेदारी दी गई है … स्क्रिप्ट में जहां “फलां” लिखा है, वहां गांव का नाम भर दे … जहां “आक्रोश” लिखा है, वहां दो नाराज चेहरे भेज दे … जहां “मातम” लिखा है, वहां रोता हुआ कोई मिल जाए तो अच्छा है … बाकी खबर दिल्ली से तैयार है…
उसकी हैसियत परीक्षा के उस प्रश्न जैसी है जिसमें ऊपर लिखा रहता है … रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए … फर्क इतना है कि यहां सही उत्तर भर देने पर नंबर कट सकते हैं …
कवि जी भाषा के बड़े साधक हैं … पानी भरने से “जलप्रलय” तक और दो लोगों की बहस से “महासंग्राम” तक वे एक सांस में पहुंच जाते हैं … बस तस्वीर से व्यक्ति तक पहुंचने के लिए जो एक फोन करना पड़ता है, उसके लिए समय नहीं मिलता …. समय बहुत कीमती है… अगले
आधे घंटे तक यही बताना है कि खबर सबसे पहले हमने दिखाई … ये सबसे ज़रूरी है …
कभी कोई गलती पकड़ ले तो उसे “मानवीय भूल” कहा जाता है… ये व्यवस्था का सबसे मानवीय पक्ष है … कामयाबी संस्था की होती है, बॉस की … भूल किसी जूनियर की, ज्यादातर रिपोर्टर की …
जिस जीवित महिला की तस्वीर मृत्यु की खबर में चली, वो शायद सोच रही होंगी कि संपादक को फोन करके सुधार करवा लेंगी … लेकिन कवि पहले ये देखते हैं कि शिकायत कितने लोगों तक पहुंची है, उसको कितने लोगों ने रीट्वीट या टैग किया है … ख़ैर ..
मूल खबर…
टीवी9 और न्यूज़18 ने एबीपी की पत्रकार निधि तिवारी की फोटो लगाकर सुसाइड की खबर चला दी!


