
पीयूष त्रिपाठी-
आपस में मत लड़ो भाइयों! बिरादरी की इज्जत का तो ख्याल करो…. यह तस्वीरें अयोध्या की बताई जा रही हैं। जहां रविवार को स्थानीय पत्रकार साथी और लखनऊ व दिल्ली आदि से आए पत्रकार साथी आपस में ही लड़ गए। मारपीट की नौबत आ गई। तस्वीर में दिख रहे बहुत से भाइयों को मैं व्यक्तिगत रूप से भी जानता हूं।
दरअसल, अयोध्या में 25 नवम्बर को होने वाले ध्वजारोहण समारोह के लिए देश विदेश के पत्रकार वहां पहुंचे हुए हैं। जानकारी के मुताबिक ध्वजारोहण समारोह आयोजन स्थल के लिए पत्रकारों को कोई निमंत्रण या पास जारी नहीं किया गया है।
पता चला कि इसी बीच रविवार को अयोध्या के पत्रकारों को राम मंदिर परिसर घुमाने और दर्शन कराने की योजना बनाई गई थी। सूचना विभाग की तरफ से जिले के कुछ विशिष्ट पत्रकार व फोटोग्राफरों को इस हेतु सूचना दी गई थी कि साढ़े तीन बजे उन्हें राम मंदिर परिसर में प्रवेश दिलाया जाएगा। बताया यह गया था कि राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र पत्रकारों को परिसर भ्रमण कराएंगे। निर्धारित समय पर करीब 40 स्थानीय पत्रकार वहां पहुंच भी गए।
इसकी जानकारी बाहर से आए पत्रकारों को भी हो गई, तो वह भी पहले बैरियर पर इकट्ठा हो गए। मूलतः इसमें लखनऊ के पत्रकार साथी थे जिनकी संख्या लगभग 25 थी। वह भी अंदर जाने की जिद करने लगे। फिर क्या था,,,,, इसी बात पर बखेड़ा शुरू हो गया। एक बैरियर कूद फांद कर लखनऊ वाले पत्रकार राम मंदिर परिसर के पथ पर आगे बढ़ लिए। यह देख सुरक्षा में लगे अफसरों के कान खड़े हो गए और उसके बाद के दूसरे बैरियर को और तंग कर दिया गया। लखनऊ से गये और अयोध्या के स्थानीय पत्रकारों में आपस में जमकर तू-तू मैं मैं और ऐसी की तैसी हुई। ऐसे हालात पैदा हो गये कि फिर किसी को भी परिसर में अंदर न ले जाने का निर्णय सुरक्षा कारणों से ले लिया गया और सब “सम्माननीय पत्रकारगण” वहां से लौट आए।
मतलब आपस में लड़कर सभी ने अपनी बेइज्जती करा ली।
मेरा मानना है कि इसमें स्थानीय और बाहर से गये पत्रकार साथियों को आपस में लड़ना नहीं चाहिए था। सूचना विभाग को भी ध्यान रखना चाहिए था कि लखनऊ से गये पत्रकारों को भी सम्मान पूर्वक बुलाकर दर्शन करा देता क्योंकि यह लोग रोज-रोज तो अयोध्या जाते नहीं है। लखनऊ से गये पत्रकारों को भी ध्यान रखना चाहिए था कि अगर नहीं बुलाया गया तो वहां न जाते।
स्थानीय पत्रकारों को इस मुद्दे पर बाहर से आए अपनी ही बिरादरी के साथियों का इस मुद्दे पर समर्थन करना चाहिए था। आप दोनों ने ही बच्चों की तरह आपस में लड़कर अपनी बेइज्जती करा ली।
मैंने बीस साल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम किया है इसलिए जानता हूं कि वहां एक-एक विजुअल (Video clip) की क्या अहमियत होती है। यदि आप वहां रिपोर्टर के रूप में गये हैं और कोई एक विजुअल किसी दूसरे चैनल पर चलता दिख जाए तो तत्काल आपके चैनल का असाइनमेंट डेस्क आपको फोन करके पूछेगा कि यह विजुअल तुमने क्यों नहीं भेजा। भले ही आप रिपोर्टर के रूप में बारह – चौदह घंटे से बगैर कुछ खाए पीए वहां से जान दिए पड़े हों।
हालांकि अब टेलीविजन रिपोर्टिंग का स्वरूप बहुत बदल चुका है। जितने भी सरकारी कार्यक्रम होते हैं वहां से दूरदर्शन और एक चर्चित न्यूज एजेंसी कार्यक्रम का सीधा प्रसारण करते हैं जिसकी Live Feed यानी वीडियो कोई भी चैनल दिखा सकता है क्योंकि दूरदर्शन सबके लिए फ्री है।
आमतौर पर किसी भी सरकारी कार्यक्रम की Live Coverage में चैनल के रिपोर्टर और कैमरामैन की कोई आवश्यकता नहीं होती है। सब कुछ दूरदर्शन के जरिए मिलता है और वह भी शानदार वीडियो क्वालिटी के साथ। चैनल तो अपनी टीम इसलिए भेजते हैं कि उनका रिपोर्टर कार्यक्रम स्थल या आस-पास से Live जुड़ सके और वहां के माहौल से जुड़ी जानकारी दे सके और वहां की ख़बरें दिखा सके जिसे Side story कहते हैं।
अगर न्यूज चैनल या अखबार अपना रिपोर्टर न भेजें तब भी मुख्य कार्यक्रम उनके न्यूज चैनल और अखबार में मिस नहीं होगा क्योंकि DD यानी दूरदर्शन पर सब कुछ उपलब्ध है। बस आप अपने चैनल पर कटिया लगाइए और दिखाइए।
फिर भी चैनल दिल्ली और लखनऊ से अपनी हैसियत के अनुसार अपनी भारी भरकम टीम कार्यक्रम की कवरेज के लिए भेजते हैं। उदाहरण के लिए अगर अयोध्या की ही बात करें तो सभी बड़े न्यूज चैनल ऐसे अवसरों पर अपने चैनल के बड़े-बड़े और चर्चित चेहरों और उसके साथ तीन चार रिपोर्टर और कैमरामैन भी अयोध्या भेज देते हैं।
सभी बड़े चैनल अयोध्या में सरयू के किनारे या किसी और बड़े स्थल पर मंच भी सजा लेते हैं। कोई किसी बड़े कवि को जो मानस मर्मज्ञ हो गये हैं उन्हे अपने मंच पर Live Telecast के लिए बैठाता है तो कोई प्रख्यात लोक गायिका का तमगा लिए घूम रही एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी की पत्नी को।
देश की आबादी की तरह ही पत्रकारों की संख्या भी अब अत्यधिक हो चुकी है। किसी भी सरकारी कार्यक्रम में जाने के लिए पत्रकारों के बीच पास हासिल करने को लेकर मारामारी की स्थिति होती है। सरकार भी क्या करे आखिर कितने लोगों को पास जारी करे।
मेरा मानना है मीडिया घरानों जैसे अखबार और चैनल वालों को अब ऐसे कार्यक्रम में अपनी टीम भेजना बंद कर देना चाहिए लेकिन ऐसा हो नहीं सकता। क्योंकि अगर अखबार और चैनल कवरेज नहीं करेंगे तो विज्ञापन मिलना बंद हो जाएगा। इसीलिए चैनल तो ऐसे मौकों पर ग्लैमर का तड़का लगाना भी नहीं चूकते।
लाखों करोड़ों रुपए के पैकेज पर काम करने वाले देश के So Called चर्चित और बड़े पत्रकारों के साथ सभी प्रकार के बड़े छोटे पत्रकार जो पास पाने में सफल रहे हैं वह कार्यक्रम कवर करने के लिए पहुंच चुके हैं। कल जो पत्रकारों का आपस में झगड़ा हुआ वह नहीं होना चाहिए था।
लेकिन फिर भी मुझे पूरी उम्मीद है कि भविष्य में भी हमारे पत्रकार साथी गाहे-बगाहे ऐसे ही आपस में लड़ते रहेंगे और बेइज्जती कराते रहेंगे और सरकारी सिस्टम इस स्थिति का फायदा उठाता रहेगा क्योंकि पैसा तो वहीं से मिलना है विज्ञापन के रूप में जिससे चैनल और अखबार में काम कर रहे साथियों को समय से वेतन मिलता रहे।
घूम फिर कर सारा खेल पैसे का है। पैसा भी उसे ज्यादा मिलेगा जो सबसे ज्यादा तेल लगाएगा। इसके चक्कर में भले ही पत्रकार की कितनी भी बेइज्जती हो जाए। प्रभु श्रीराम के आराधक गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है कि-
आवत हिय हरषै नहीं, नैनन नहीं सनेह।
‘तुलसी’ तहाँ न जाइए, कंचन बरसे मेह॥
तस्वीरें सोशल मीडिया से ही प्राप्त हुई हैं।
वहीं, इस पूरे प्रकरण पर प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि- लोकल और बाहरी पत्रकार में नहीं सिविल ड्रेस में सुरक्षा कर्मी ने दिल्ली से आई महिला पत्रकार के कैमरे पर हाथ मार दिया था जिसके बाद विवाद बढ़ा था और राजस्थानी पत्रकार भी उनके समर्थन में आ गए थे। कुल 28 लोगों की सूची निपेंद्र मिश्र ने बनाई थी जिसमें सिर्फ अयोध्या जनपद के लोकल पत्रकारों का नाम था लेकिन दिल्ली और लखनऊ के पत्रकार जबरदस्ती उसमें घुसना चाह रहे थे इसके बाद दर्शन मार्ग पर दिल्ली की महिला पत्रकार अपना कैमरा ऑन करके शूट करने लगी थी सिविल ड्रेस में आए सुरक्षा कर्मी ने मना किया और कमरे पर हाथ मार दिया जिसको लेकर सभी पत्रकारों ने विरोध दर्ज किया था हंगामा हुआ और दीपेंद्र मिश्रा ने किसी भी पत्रकार को अंदर आने से मना कर दिया पत्रकारों को अंदर जाने का जो प्रोग्राम बनाया गया था उसे निरस्त कर दिया गया था।



