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सियासत

दिल्ली और बंगाल दोनों में बीजेपी की जीत का पैटर्न लगभग एक जैसा है!

डॉ नदीम अख्तर-

मुझे सबसे ज्यादा खुशी भवानीपुर सीट से ममता बनर्जी की हार पे है। बीजेपी के शुभेंदु अधिकारी ने उनको हराया। जैसा मैंने कल लिखा था कि बंगाल में केजरीवाल मॉडल लागू होने की भी संभावना (आशंका नहीं) है।

तो ये अक्षरशः लागू हो गया। केजरीवाल मॉडल। अरविंद केजरीवाल भी दिल्ली में अपनी विधान सभा सीट नई दिल्ली से हार गए थे। बीजेपी के प्रवेश वर्मा ने उनको हराया था।

दिल्ली और बंगाल दोनों में बीजेपी की जीत का पैटर्न लगभग एक जैसा है। बहुमत से काफी ज्यादा सीटें मिली हैं और sitting chief minister हार गया है।

कल मैंने दो मॉडल बताए थे। या तो ममता को रहने दिया जाएगा या फिर दिल्ली मॉडल की तरह उनको उखाड़ फेंका जाएगा। कि चलो। अब हटो। तुम्हारा काम पूरा हुआ। अब हम खुद राज करेंगे। ना महाराष्ट्र की तरह पार्टी तोड़ने की जहमत और ना बिहार की तरह sitting chief minister की ससम्मान विदाई का बोझ।

सीधे दिल्ली का केजरीवाल मॉडल। अब कोई नैतिक स्टैंड नहीं कि ईवीएम और चुनाव आयोग ठीक काम कर रहा है। ज़ाहिर है कि बीजेपी अब काफी आक्रामक राजनीति के मोड में आ गई है। अब उसे B TEAM की बिल्कुल ज़रूरत नहीं। क्षेत्रीय दलों को वह जड़ से उखाड़ फेंकने के रास्ते पे है।

जैसा मैंने कल लिखा था कि बंगाल फतह के बाद अब अगला नम्बर झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार का है। बस ये टाइमिंग की बात है कि सोरेन की विदाई कब होनी है। वैसे भी झारखंड जैसे प्रदेश में ईसाई मिशनरियों द्वारा आदिवासियों के धर्म परिवर्तन का मुद्दा बीजेपी के दिल के करीब है। सो बड़ा सफाई अभियान वहां होना तय है।

इसके बाद यूपी में अखिलेश यादव का नम्बर आएगा। एक बात कबीलेगौर है। यूपी में मायावती, ममता से ज्यादा समझदार निकलीं। बिना फजीहत करवाए चुपचाप राजनीतिक अज्ञातवास ले लिया।

इस चुनाव में बंगाली अस्मिता का मामला चला या नहीं, इस पे कोई टिप्पणी नहीं करूंगा। बंगाल में राजनीति 180 डिग्री घूमी है। लेफ्ट के राज़ से सीधे राइट के राज की तरफ। ममता की तृणमूल सत्ता में जरूर आई थी पर राज करने का पूरा कल्चर वहां लेफ्ट वाला ही था। अब वह एकदम बदल जाएगा।

बंगाल में बीजेपी की जीत का सेहरा सिर्फ एक आदमी के सिर पे बंधता है। वह हैं पीएम मोदी। उसे अमली जामा पहनाया गृह मंत्री अमित शाह ने। ये साफ दिख रहा है कि जनता ने वोट पीएम मोदी के ब्रांड पे दिया। अगर बंगाल चुनाव से मोदी शाह की जोड़ी हटा दी जाए तो बीजेपी के लिए वहां 50 सीट का आंकड़ा पार करना भी मुश्किल होता।

आखिर में एक बात और। जैसा मैंने अपनी पिछली कई पोस्ट्स में लिखा है कि ममता हारने के बाद ईवीएम और चुनाव आयोग को दोष देंगी। इसलिए अगर उनको अंपायर की निष्पक्षता पर संदेह है तो चुनाव ही ना लड़ें। पर ममता लड़ीं। और दिनभर जीत के दावे और ख़्वाब भी देखती रहीं, दिखाती रहीं।

ये सबसे हास्यास्पद रहा। अगर सिस्टम पे विश्वास ही नहीं था, तो चुनाव क्यों लड़ा? और फिर जीत के दावे क्यों करती रहीं? ममता ने अपने राजनीतिक अवसान का अपमान खुद चुना।

उनसे किसी को सहानुभूति नहीं।

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2 Comments

2 Comments

  1. Hemraj Raj

    May 5, 2026 at 10:15 am

    एकला चलो की राजनीति और जब खुद का उद्गम कांग्रेस को तोड़ कर रहा है तो टीएमसी को तो इसी तरह जाना था।
    दूसरा फैक्ट 90 लाख वोटर का नाम कटना और लाखों वोटर का ट्रेन में भरकर वोट दिलाने लाना।

  2. Hemraj Raj

    May 5, 2026 at 10:17 am

    एकला चलो की राजनीति और जब खुद का उद्गम कांग्रेस को तोड़ कर रहा है तो टीएमसी को तो इसी तरह जाना था।
    दूसरा फैक्ट 90 लाख वोटर का नाम कटना और लाखों वोटर का ट्रेन में भरकर वोट दिलाने लाना।
    मोदी शाह की गाली गलौज की राजनीति से वोटरों को जादा फर्क नहीं पड़ा।

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