गणेश झा-
यह डिजिटल मीडिया का युग है। डिजिटल मीडिया पर ढेरों पत्रकार भी खबरें और राजनैतिक विश्लेषण लिखते हैं। जो पत्रकार रिटायर हो चुके हैं और किसी अखबार से अब उनका सीधा जुड़ाव नहीं है वे भी डिजिटल मीडिया पर खूब लिखते हैं। उनके लिखे की अपनी साख है। ऐसे वरिष्ठ पत्रकारों की रिपोर्टें और विश्लेषण पढ़ने वाले पाठकों की संख्या भी हजारों में है।
बिहार में भी ऐसे सैकड़ों पत्रकार हैं जो डिजिटल मीडिया पर नियमित रूप से लिखते हैं और उनकी रिपोर्टें और विश्लेषण पढ़ने वाले पाठक भी हजारों में हैं। पर बिहार की नई सरकार को अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं हो रही है। इसलिए एक कड़ा कानून बनाकर ऐसे पत्रकारों के मुंह और कलम पर ताला लगा दिया गया है।
बिहार विधानसभा से सीसीए बिल पारित होकर कानून बन गया है। मतलब आप सोशल मीडिया पर बिहार की सरकार के खिलाफ न कुछ लिख सकते हैं और न कुछ बोल सकते हैं। वीडियो, कंटेंट, खबर जैसा कुछ भी अगर सरकारी तंत्र को लगा कि आपने खिलाफत में चलाया है तो आपको जेल में डाल दिया जाएगा। फिर कम से कम तीन महीने तक आपकी जमानत नहीं होगी।
जैसा कि बताया जा रहा है इस कानून में एक साल तक जेल में रखने की व्यवस्था है। क्योंकि डिजिटल मीडिया किसी के नियंत्रण में नहीं था इसलिए वहां सच्चाई दिख जाती थी। अब वह भी बंद कर दिया गया। मतलब पूरे तंत्र पर अब सरकार का कब्जा हो गया है। बिहार में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अब खत्म। अब कोई पत्रकार भी कुछ नहीं लिख पाएगा।
अचानक पैदा की गई इस गंभीर स्थिति का अंदाजा आप लगा सकते हैं। जब भी ऐसी स्थिति पैदा होती है तो उसका अवाम, सरकार और देश को बहुत बड़ा नुकसान होता है। लोकतंत्र अब सिर्फ संविधान की किताब में जिंदा बच रहा है?
बिहार के माननीय मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने सोशल मीडिया यूजर्स को सख्त चेतावनी दी है कि अगर किसी ने उनके खिलाफ अंटशंट लिखा तो वे उसे जेल में डाल देंगे। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर खिलाफ में कुछ भी लिखने से पहले सावधान हो जाएं, क्योंकि उनकी हर गतिविधि पर पैनी नजर रखी जा रही है और ऐसे लोग चिन्हित किए जा रहे हैं। सरकार की तरफ से कुछ लोगों को बाकायदा नोटिस भी भेजा गया है। सम्राट चौधरी का यह गैग ऑर्डर वाला वीडियो और सरकार की तरफ से कुछ लोगों को भेजा गया नोटिस भी पिछले कई दिनों से वॉयरल हो रहा है।
नीतीश कुमार लगभग 20 वर्षों तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे, और इन 20 वर्षों में कम से कम 10 वर्ष तक तो व सोशल मीडिया के दौर में भी मुख्यमंत्री रहे। व्यक्तिगत तौर पर नीतीश कुमार मोबाइल और सोशल मीडिया के सख़्त ख़िलाफ़ थे लेकिन कभी आपने सुना कि नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ किए गए किसी पोस्ट के कारण बिहार सरकार ने पोस्ट करने वाले को नोटिस भेजा है? नीतीश कुमार को छोड़ दीजिए अभी कुछ ही महीने हुए हैं निशांत कुमार को स्वास्थ्य मंत्री बने हुए और राजनीति में आए हुए और इन कुछ महीनों के दौरान उन्हें पागल, मंदबुद्धि, बलात्कारी पता नहीं क्या- क्या बोला गया लेकिन कभी सुना आपने कि उन्होंने किसी को क़ानूनी नोटिस भेजा है।
बिहार में प्रेस का गला घोंटने की कोशिश पहले भी कई बार हुई है। पर सरकारें इसमें कभी सफल नहीं हो पाईं। वर्ष 1982 में जब जगन्नाथ मिश्र बिहार के मुख्यमंत्री थे तो वे भी एक प्रेस बिल लेकर आए थे। बिहार प्रेस बिल में भी पत्रकारों को जेल में डालने के लिए ऐसा ही कड़ा कानून बनाया गया था। पर वह ज्यादा दिन चला नहीं। उस प्रेस बिल का जबरदस्त विरोध हुआ और बात तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक पहुंचाई गई। फिर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दबाव में जगन्नाथ मिश्र को वह प्रेस बिल वापस लेना पड़ा। बाद में मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र ने मीडिया से कहा था कि उन्हें प्रेस बिल नहीं लाना चाहिए था। जगन्नाथ मिश्र ने कहा था कि वे तो प्रेस बिल प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को खुश करने के लिए लेकर आए थे।
दरअसल, किसी बड़े तांत्रिक के कहने पर जगन्नाथ मिश्र ने दर्जनों बकरे कटवाकर उन बकरों के खून से स्नान किया था। उस तांत्रिक ने जगन्नाथ मिश्र को कहा था कि इस तांत्रिक क्रिया से मुख्यमंत्री पद की उनकी सत्ता अक्षुण्ण बनी रहेगी। पर कुछ पत्रकारों को जगन्नाथ मिश्र की इस तांत्रिक क्रिया की खबर हाथ लग गई और बिहार के साथ-साथ नेशनल मीडिया में भी ‘मुख्यमंत्री के रक्त स्नान कहानी’ वाली यह खबर चल गई। इस खबर के छपने से जगन्नाथ मिश्र की खूब किरकिरी हुई थी। इसी खबर से झुंझलाए मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र आनन फानन में प्रेस बिल वाला काला कानून लेकर आ गए थे।
बिहार के पत्रकारों को एक बार फिर वही सब झेलना पड़ रहा है। फिलहाल तो पत्रकार कुछ लिखने से परहेज करेंगे पर इस बार भी इस काले कानून से उनकी लड़ाई आखिर तक जारी रहेगी।


