रंगनाथ सिंह-
कॉकरोच पार्टी को भाजपा की साजिश बताने वाले कांग्रेसी अंधभक्त-
भाजपा आलाकमान छात्रों के अन्दर दबे आक्रोश को जज करने में चूक गया। सत्ता में रहने पर ज्यादातर लोग खुद को अपराजेय समझ लेते हैं। गौरतलब बात ये है कि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस भी इस आक्रोश को समझने में काहिल निकला। सोशल मीडिया पर कांग्रेस के घोषित समर्थक ने 19 जुलाई तक कॉकरोच पार्टी को भाजपा और संघ की साजिश बताया। 20 जुलाई को जब अच्छी भीड़ जुटी तब कांग्रेसियों की आँख खुली। लेकिन इसके बाद भी राहुल गांधी जंतर-मंतर नहीं गये बल्कि उन्होंने अपना अलग मोर्चा खोला और छात्रों से उनके पीछे आने की उम्मीद की मगर ऐसा नहीं हुआ।
23 जुलाई को जब सोनम वांगचुक ने अनशन तोड़ा तो फिर से कांग्रेस के कुछ बुद्धिजीवियों ने उन्हें बिका हुआ बताना शुरू कर दिया। तब कांग्रेसी बुद्धिजीवियों ने कहा कि अब आन्दोलन जनता का हो चुका है इसलिए उसे ऐसे किसी व्यक्ति की जरूरत नहीं जबकि जमीनी सच ये है कि सोनम वांगचुक को जबरदस्ती अस्पताल में भर्ती कराने के बाद ही इस आन्दोलन में जान आई। उसके पहले वहाँ दो-चार हजार लोग ही जुट रहे थे।
20 जुलाई के संसद मार्च को सफल बनाने के पीछे भी आम आदमी पार्टी, सपा, भीम आर्मी की बड़ी भूमिका थी। कांग्रेसी इस लिस्ट में भी पीछे थे। अखिलेश यादव ने अपनी पत्नी डिंपल को वहाँ भेजकर ज्यादा समझदारी का परिचय दिया। 25 जुलाई को आए इस्तीफे से साफ हो गया कि वांगचुक को पहले ही उसके बारे में मौखिक रूप से आश्वस्त किया जा चुका था, तभी उन्होंने अनशन तोड़ा।
कांग्रेस के बौद्धिक प्रकोष्ठ ने राहुल जी को समझाया कि कॉकरोच पार्टी इसलिए खड़ी की गयी है ताकि उनका छात्रों की गूँज कार्यक्रम किल किया जा सके। राहुल गांधी ने पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाना वाला कदम प्रधानमंत्री आवास पर जाकर उठाया। मेरी राय में वह बेहद अपरिपक्व हरकत थी मगर राजनेता पब्लिक का अटेंशन पाने के लिए बहुत कुछ करते हैं। इस प्रसंग को फिलहाल अनदेखा किया जा सकता क्योंकि वहाँ कोई अनहोनी नहीं घटी। मगर वहाँ भी राहुल जी पीएम और एचएम का इस्तीफा माँगने लगे।
प्रधान के इस्तीफ के बाद जिस तरह जंतर-मंतर खाली हो गया उससे साफ है कि राहुल जी की माँग को छात्रों ने ज्यादा तवज्जो नहीं दी। बाद में राहुल जी ने पुराना स्टैण्ड बदल दिया और पीएम से माफी की माँग करने लगे। जाहिर है कि उनकी माँग को केवल कांग्रेस बौद्धिक प्रकोष्ठ सुन रहा है।
पिछली बार जब राहुल गांधी की आलोचना में एक छोटी सी पोस्ट लिखी तो कांग्रेस के एक अंधभक्त ज्ञान देने लगे कि राहुल जी को मेरे जैसों के सलाह की जरूरत नहीं। तब मैंने उनसे इतना ही कहा कि उनके लिए आप जैसों की सलाह ही काफी है। वह सज्जन भी आदतन सिर के बल खड़े होकर महीने भर कॉकरोच पार्टी को भाजपा की साजिश बताते रहे।
कांग्रेस अंग्रेजों के जमाने से सत्ता में है। सत्ता में रहने का उसका वर्क एक्स करीब 70 साल का है। भारत विभाजन के बाद करीब 60 साल वह एकछत्र राज कर चुकी है। यही कारण है कि देश के बौद्धिक और भद्र लोक में कांग्रेस की पकड़ गहरी है। मगर इसी वर्ग के कांग्रेसी अंधभक्तों द्वारा दी गयी सलाहों की वजह से कांग्रेस की जमीन से पकड़ कमजोर होती गयी और वह डिफॉल्ट एंटी-हिन्दुत्व वोट के सहारे अपना अस्तित्व बचाए हुए है।
इस आन्दोलन से भाजपा के साथ-साथ कांग्रेस भी सबक ले सकती है कि जब युवाओं में धर्मेंद्र प्रधान के प्रति इतना आक्रोश था वह ऐसा कोई आन्दोलन क्यों नहीं खड़ा कर पायी जिसमें उनके पार्टी कैडर के अलावा सामान्य युवा भी शामिल होने के लिए आएँ। मुझे यकीन है कि कांग्रेस इन प्रश्नों पर विचार नहीं करेगी। कांग्रेस के अंधभक्त पिछले लोक सभा चुनाव की तरह पार्टी की हार को भी जीत समझकर जश्न मनाते नजर आएँ तो हैरत नहीं होगी। मगर यह बात कहीं तो दर्ज होनी चाहिए, इसलिए यह पोस्ट लिखी।


