दि एशियन एज की लीड। आंदोलन को देशव्यापी बनाने का एलान किया गया तो अखबार हेडलाइन मैनेजमेंट के शिकार हो गए। आज के अखबार आपको चाहे जो बता रहे हों सच्चाई यह है कि कॉक्रोचों का आंदोलन देशव्यापी करने का एलान भी किया गया है। आज द टेलीग्राफ का एक शीर्षक है, विपक्ष ने कहा जो स्थिति है उसके लिए प्रधानमंत्री जिम्मेदार हैं।
संजय कुमार सिंह
आज की एक सबसे बड़ी खबर दि एशियन एज में लीड है। देशबन्धु में यह सेकेंड लीड है। खबर मेरे किसी भी अन्य अखबार में लीड नहीं है। कॉक्रोच जनता पार्टी के आंदोलन से जब सरकार परेशान है, रात 12 बजे के बाद प्रधानमंत्री और तमाम मंत्रियों को काम करना पड़ रहा है और यह संदेश दिया गया है कि सोनम वांगचुक का अनशन खत्म हो गया तब यह खबर बहुत बड़ी है कि अगले दिन (असल में उसी दिन) देशव्यापी आंदोलन की अपील थी। यह अपील तमाम धमकियों, मुश्किलों, साजिशों, नाकामियों और असहयोग के बावजूद की गई है लेकिन मीडिया ने इसका भी कबाड़ा कर दिया। आज मेरे 10 अखबारों में से दो ने खुलकर प्रधानमंत्री के प्रचार की बेशर्मी की है। दि इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है, प्रधानमंत्री आगे आए… प्रश्नपत्र लीक के दोषियों को सजा देने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट्स, सख्त नए कानून आने वाले हैं। द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने छात्रों से संपर्क किया; सोनम वांगचुक ने अनशन खत्म किया। कहने की जरूरत नहीं है कि इन दोनों अखबारों ने बोफर्स घोटाले की रिपोर्टिंग में अच्छा नाम कमाया था और अभी भी सरकार विरोधी खबरें करने के लिए जाने जाते हैं। सत्ता से करीबी और सत्ता का दबाव भी दिखता रहा है लेकिन स्वेच्छा से प्रधानमंत्री का यह प्रचार रेखांकित करने लायक है। सरकार का ऐसा प्रचार कई अखबार करते हैं। पहले लगता था कि ऊपर के आदेश पर करते हैं लेकिन अब लगता है कि अखबारों में हर स्तर पर प्रचारक हैं, भर लिए गए हैं या वही रह गए हैं। इसलिए जो खबर लीड होनी चाहिए थी उसे छोड़कर सरकारी प्रचार करने वाले सभी मीडिया संस्थान प्रचारक हैं पर एक पीढ़ी को विरोध की पत्रकारिता सिखा कर खुद दुम हिलाने लगना शर्मनाक और पीड़ादायक है।
भाजपा सरकार का विरोध कर सकने वाले सभी मीडिया संस्थानों को जिस तरह कुंद और बेअसर किया गया है उससे अलग उसमें काम करने वाले लोग अभी भी रीढ़ दिखा सकते हैं पर वह अदृश्य हो चला है। मुख्यधारा की मीडिया से तो लगभग गायब ही है। अभी उसमें नहीं जाउंगा लेकिन जो खबरें हैं उसमें पेपर लीक के लिए अगर शिक्षा मंत्री दोषी ठहराए जा रहे हैं तो उन्हें संरक्षण देने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दूध का धुला नहीं माना जा सकता है। ऐसे में वे जो भी कर रहे हैं, वह मजबूरी की राजनीति है और उसे उनकी प्रशंसा के रूप में पेश किया जा रहा है जबकि उन्होंने कुछ नहीं किया है। जो करने का दावा, दिखावा या ढोंग कर रहे हैं उससे कुछ नहीं होना है। द हिन्दू का उपशीर्षक है, एक्टिविस्ट (सोनम वांगचुक) ने दो मंत्रियों की मौजूदगी में अपनी भूख हड़ताल खत्म की; मोदी ने देर रात सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि कैबिनेट आज पेपर लीक के मुद्दे पर चर्चा करेगी; केंद्र ने हायर एजुकेशन सेक्रेटरी का तबादला किया। इसमें हायर एजुकेशन सेक्रेट्री का तबादला कम महत्वपूर्ण नहीं है। मांग शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की थी तबादला सेक्रेट्री स्तर के अधिकारी का किया गया। जाहिर है, यह कोई कार्रवाई नहीं है और अक्सर कहा जाता है कि तबादला समान्य व्यवहार में आता है। जो भी हो, सरकार की पूरी कोशिश हेडलाइन मैनेजमेंट की है और जो कुछ हुआ वह सब देर रात संभवतः इसीलिए कि जो जैसे मिलेगा वैसे छप जाएगा और ज्यादातर अखबारों, खासकर इन दो अखबारों ने लगभग वही किया है। कहने की जरूरत नहीं है कि कार्रवाई की इस खबर के साथ सोनम वांगचुक के अनशन खत्म करने के प्रचार से यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि सरकार और शिक्षा मंत्री के खिलाफ चल रहा आंदोलन खत्म हो गया या हो रहा है या हो जाएगा। ऐसा होता तो इस खबर को यह ट्रीटमेंट दिया जाना ठीक हो सकता था। तकनीकी रूप से अभी भी गलत नहीं कहा जा सकता है लेकिन यह सरकार का प्रचार और सेवा ही है।
हिन्दू ने अपने मुख्य शीर्षक के साथ नौ लाइन की खबर छापी है जिसका तीन लाइन का शीर्षक है, विपक्ष ने कहा जब तक प्रधान पद पर हैं कोई बात नहीं होगी। जाहिर है, यह विपक्ष ने कहा है और सरकारी प्रचार के मुताबिक वह तो विदेशी धन के बल पर ऐसा विरोध करता रहता है। दि इंडियन एक्सप्रेस की मुख्य खबर इस प्रकार है, “विधेयक का प्रस्ताव तैयार है आज इसे मंत्रिमंडल के समक्ष रखा जाएगा…. पेपर लीक ने छात्रों और उनके अभिभावकों को भारी दुख दिए हैं : मोदी”। इसके साथ इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी ही पुरानी खबर के हवाले से सवाल किया है, क्या सरकार के इस कदम से लीक मामलों के अनंत ट्रायल, कानून की खामियां खत्म हो जाएंगी? अखबार ने पांच जून की अपनी खबर का उल्लेख करते हुए फिर बताया है, 2002 से 2025 तक के 45 प्रश्नपत्र लीक मामलों में सिर्फ दो लोगों को सजा हुई है। अमर उजाला और द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार, 2024 लीक के कथित नीट किंगपिन, संजीव मुखिया को सीबीआई की क्लीन चिट मिल गई है। बिहार पुलिस ने जिसे मुख्य आरोपी बनाया था उसे सीबीआई की चार्जशीट में छोड़ दिया गया है। अभी तक मामला ठंडे बस्ते में था। संसद में पूछे जाने पर सीबीआई ने मीडिया को बताया है कि एजेंसी ने मुखिया को बरी कर दिया है। यह सब क्यों और कैसे हुआ होगा, समझना मुश्किल नहीं है और साबित करता है कि जिस पैमाने पर गड़बड़ी हुई है वह शिक्षा मंत्री के बूते का है ही नहीं। यह अलग बात है कि लीक कराने वाला गिरोह अनुभवी होता या सरकार यह सब करने वाले अनुभवी लोगों की सलाह मान रही होती तो धर्मेन्द्र प्रधान खुद ही इस्तीफा दे देते और बाद में संजीव मुखिया की तरह क्लिन चिट पा जाते। अभी तो यह खबर इंडियन एक्सप्रेस में ऐसे है तो इसलिए कि उसे सरकार का प्रचार करना था। स्वेच्छा से या दबाव में वरना पत्रकारिता पढ़ने-जानने वाला कोई बच्चा भी ऐसा नहीं करेगा। द हिन्दू के मामले में भी लगभग यही बात है। एक खबर के सिलसिले में एक्स की पोस्ट और संबंधित विवरण के बारे में यहां लिख चुका हूं। जहां तक इंडियन एक्सप्रेस और द हिन्दू की लीड की बात है, द टेलीग्राफ की इसी खबर का शीर्षक है – ‘फास्ट ट्रैक’ प्रण से ‘बैंड एड’ नाराजगी।
इंडियन एक्सप्रेस और द हिन्दू जैसा कारनामा आज हिन्दी अखबारों ने भी नहीं किया है। हालांकि अमर उजाला और नवोदय टाइम्स कम भी नहीं हैं। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, फास्ट ट्रैक पर केंद्र, वांगचुक ने तोड़ा अनशन। नवोदय टाइम्स का शीर्षक है – मोदी बोले, पेपर लीक की फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई। उपशीर्षक है – वीडियो जारी कर कहा, पेपर लीक पर और सख्त कदम उठाएंगे। अमर उजाला में लीड के साथ छपा एक शीर्षक है, राहुल गांधी ने कहा है – शिक्षा को बर्बाद करने वालों को संरक्षण दे रही सरकार। पर इस खबर को किसी और अखबार ने महत्व नहीं दिया है। कल राहुल गांधी के आरोपों के साथ नड्डा के जवाब को जो महत्व दिया गया था उसकी चर्चा मैंने यहां की थी। देशबन्धु की लीड है, सरकार लोकतंत्र की हत्या कर रही है, छात्रों पर बर्बरता की जा रही है, उन्हें पीटा जा रहा है। खबर है कि राहुल गांधी और तमाम दूसरे लोग कल देर शाम गांधी स्मृति पहुंचे। इससे पहले उन्हें रोकने की जबरदस्त कोशिशें हुईं। सरकार की सेवा नहीं करनी होती तो कोई भी आज लीड का यही शीर्षक लगाता। लेकिन शीर्षक और लीड तो हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया का भी प्रचारक वाला है। हिन्दुस्तान टाइम्स के अनुसार – पेपर लीक से निपटने के लिए प्रधानमंत्री ने नए कानून का वादा किया; मंत्रिमंडल की बैठक आज। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, लीक से निपटने के लिए “फास्ट ट्रैक कोर्ट, विधेयक : प्रधानमंत्री”। कहने की जरूरत नहीं है कि सोनम वांगचुक का अनशन खत्म किए जाने को बड़ी घटना के रूप में पेश किया गया है और जिस ढंग से यह सब हुआ बताया जा रहा है उससे साफ है कि सब हेडलाइन मैनेजमेंट के लिए ही है। अनशन केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह की मौजूदगी में तोड़ा गया तो इसे भाजपाई कोशिश बताना आसान हो गया वरना कहने वालों ने तो यहां तक कह दिया था कि राहुल गांधी का धरना भी सरकार प्रायोजित था। अब सोनम को बेवफा साबित करना सबको अच्छा लग रहा है जबकि उनका अनशन जारी रखना बेमतलब हो गया था और जब सारी दुनिया अपील कर रही थी तब उन्होंने तिनके का सहारा नहीं लिया। यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है। कुल मिलाकर, जेन ज़ी को सक्रिय और एकजुट करने का श्रेय भारत के मुख्य न्यायाधीश और सोनम वांगचुक को ही है। दोनों भाजपा के समर्थक हैं संभव है कृपापात्र भी रहे हों। लेकिन जो किया उसका श्रेय नहीं देना और तथ्यों को अपने ही नजरिए से देखना, प्रचारित करना भारतीय समाज की खासियत है। तभी तो मुख्य न्यायाधीश सार्वजनिक तौर पर बता सकते हैं कि उनके पास वीडियो देखने का समय नहीं है।
कल देर रात जो हुआ उसकी रिपोर्ट कैसे की जानी चाहिए इसका उदाहरण आज दैनिक भास्कर ने पेश किया है। दैनिक भास्कर की खबर पर आने से पहले बता दूं कि अखबार में आज पहले पन्ने पर ही उत्तराखंड की एक परीक्षा का पेपर लीक होने की खबर है। आज की लीड खबर के बारे में दैनिक भास्कर का शीर्षक है, रात 12 बजे पीएम बोले – पेपर लीक पर कड़ी सजा का बिल आज, रात 12:40 बजे वांगचुक ने अनशन तोड़ा। सोशल मीडिया पर वांगचुक को पहले ही सबसे कमजोर कड़ी कहा जा चुका था लेकिन उनकी स्थिति में कोई दूसरा भी क्या करता। और 26 दिन अनशन पर रहने के बाद कुछ नहीं भी हुआ होता को कोई जान दे दे? नहीं दिया तो सबसे कमजोर कड़ी होना ही था और जाहिर है कि यह सब खबर का हिस्सा नहीं है। मुख्य बात यह है कि इसमें आंदोलन को राष्ट्रव्यापी बनाने, फास्ट ट्रैक कोर्ट के लॉलीपॉप को खारिज करने की खबर रह गई। सोनम वांगचुक को ही मुद्दा बना दिया गया जो खबर का बहुत छोटा हिस्सा हो सकता था या अलग चाहे जितनी बड़ी खबर हो सकती थी। दि एशियन एज ने सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमो की इस तकलीफ को भी प्रकाशित किया है कि छात्रों को नकारात्मक ढंग से पेश किया जा रहा है और सवाल किया कि उनकी चिन्ताएं सुनने के मुकाबले उनके इरादों पर उंगली उठाना क्यों आसान था? यह सब आज मुख्य धारा की मीडिया की खबर नहीं है। दि एशियन एज में जंतर मंतर पर भीड़ बढ़ने की खबर है। शीर्षक है यह विरोध नहीं क्रांति है। देश भर के युवा आए हुए हैं और स्कूली बच्चे अपने अभिभावकों के साथ आते हैं : यह हमारा भविष्य है। आप समझ सकते हैं कि मीडिया देश से कितनी बड़ी गद्दारी कर रहा है और मंदिर बनवाने वाले लोग कैसे हैं। द टेलीग्राफ का शीर्षक है, विपक्ष ने कहा जो स्थिति है उसके लिए प्रधानमंत्री जिम्मेदार हैं।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


