Connect with us

Hi, what are you looking for?

प्रिंट

आज के अखबार : ‘सीजेपी प्रधान के इस्तीफे पर अड़ी’ और ‘एनटीए में ऑपरेशन नीट एंड क्लीन’ का प्रचार

Hindi news headline and photo showing a police officer aiming a pellet gun at a shirtless man; caption covers Rahul Gandhi's claim about Delhi police firing pellets.

दिल्ली के कई अखबारों में दिल्ली की यह खबर पहले पन्ने पर इतनी सी भी नहीं है। क्या इन अखबार वालों को अपने बच्चों की, उनके भविष्य की या देश की चिन्ता नहीं है या वे सरकार से इतने डरे हुए हैं या वाकई मानते हैं कि हिन्दू खतरे में हैं – मैं नहीं जानता। ऐसे समय में सरकार के विरोध में गालियों की भाषा पर बात हो रही है। पत्रकारों और मीडिया मालिकों की नपुंसकता पर नहीं।

संजय कुमार सिंह

नरेन्द्र मोदी की भ्रष्ट और निकम्मी सरकार भारी दबाव में है। विरोधियों को डरा-धमका कर और बदनाम करके बच निकलने की उसकी चाल बेनकाब हो चुकी है। ऐसे में अयोग्य और भ्रष्ट साबित हो चुके एक मंत्री का इस्तीफा क्यों नहीं हो रहा है – आज भी समझना मुश्किल है या कोई मुश्किल नहीं है – आप जैसा चाहें मान सकते हैं। सोनम वांगचुक ने अपनी आलोचना के जवाब में कहा है कि इस्तीफा तो होना ही है। यह सरकार के लिए महंगा पड़ रहा है। फिर भी वे ऐसा नहीं कर रहे हैं तो देर-सबेर करना ही पड़ेगा। अनशन तोड़ने के लिए उसे मुद्दा बनाने का कोई मतलब नहीं था। मुझे लगता है कि नरेन्द्र मोदी की कार्यशैली मनमानी करने वाली रही है और जो हुआ वह करवाया गया है या होने दिया गया है। रोकना उसमें था ही नहीं। एक मंत्री के कार्यकाल में दो बार पेपर लीक हो जाना फिर भी नहीं हटाना बहुत कुछ कहता है। सबसे पहले कि मामला उतना ही नहीं है जितना दिख रहा है। इस लिहाज से आज अगर नवोदय टाइम्स की खबर का शीर्षक है, सीजेपी प्रधान के इस्तीफे पर अड़ी तो अमर उजाला में बैनर लीड का शीर्षक है, आक्रोश का असर…एनटीए से 47 अफसर बर्खास्त। लेकिन मेरा मानना है कि इन 47 अफसरों को शिक्षा मंत्री ने अभी तक बर्खास्त क्यों नहीं किया था और किया होता तो उनके इस्तीफे की मांग क्यों होती और नहीं किया था, अब कर रहे हैं तो उनके इस्तीफे की मांग क्यों नहीं की जानी चाहिए? इस तरह खबर छपने का कारण सूत्रों द्वारा लीक किया जाना हो सकता है पर मुद्दा वह नहीं है। मुद्दा यह है कि शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांगने का ठोस कारण है, हो नहीं रहा है और सरकार इधर-उधर के बहाने बना रही है। खुद प्रधानमंत्री वीडियो जारी कर रहे हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी ने मंत्रियों से कहा कि वे इंस्टाग्राम पर अपनी सक्रियता बढ़ाएं। पहले की सरकारें यह काम मीडिया के जरिए करती थीं। मोदी सरकार यह काम खुद कर रही है। इसलिए उसके पास काम के लिए समय ही नहीं है वह प्रचार और छवि निर्माण में ही लगी रहती है। मीडिया सवाल नहीं करता है, जवाब नहीं मिलता है इसलिए कुछ भी छप रहा है। आज अगर यह प्रचारित करने की कोशिश की गई है कि सरकार कानून बनाकर या बड़े पैमाने पर अधिकारियों का एक मुश्त तबादला करके ‘काम’ कर रही है तो वह व्यर्थ है। इंडियन एक्सप्रेस की लीड है, नए कानून के लिए विधेयक सोमवार को पेश किए जाने की संभावना। इस कानून के अनुसार, पेपर लीक मामले में 10 साल तक की जेल हो सकेगी और 10 करोड़ रुपए का जुर्माना होगा। तथ्य यह है कि सरकार (खुद प्रधानमंत्री) कई साल से कानून बनाने की बात करते रहे हैं पर बना नहीं है। वैसे भी, कानून बनाने से अपराध रुकता होता तो मेरी जानकारी में कोई ऐसा अपराध नहीं है जो कानून से रुक गया है। कानून इसलिए बनते हैं कि अपराध होते हैं, सजा देने के लिए जरूरी हैं। अपराध रोकने के लिए कानून बनते होते तो वेश्यावृत्ति रुक जाती। नोटबंदी से रुकने वाली थी, डिजिटल लेन-देन लागू होने से तो रुक ही जानी चाहिए थी। वास्तविकता यह है कि कानूनन के बावजूद पुरुष वेश्यावृत्ति भी होने लगी है। कानून किस काम का – या सजा हो ही रही हो तो अपराध कहां रुका। यही नहीं, सरकार और दिल्ली पुलिस पर आरोप है कि वह कानून के दायरे में नहीं है। ऐसे में कानून का कोई मतलब नहीं है। जहां तक एक साथ 47 अधिकारियों के तबादले की बात है – दैनिक भास्कर की खबर के अनुसार, एनटीए में कुल 25 सरकारी कर्मचारी ही हैं, जिन्हें हटाया वे सभी संविदा पर हैं।

एक तरफ तो सरकार लीक रोकने के लिए कोई जमीनी काम करने को तैयार नहीं है दूसरी ओर इसका विरोध करने वालों को कुचलने के लिए तमाम अन्याय और बर्बरता की जा रही है। इसी में एक है पेलेट गन का इस्तेमाल। राहुल गांधी ने कल एक प्रेस कांफ्रेंस में ऐसे युवक को पेश किया जिसके शरीर पर पेलेट गन के छर्रे लगने के निशान हैं और उसकी आंख भी जख्मी है। रोशनी बचेगी कि नहीं, पक्का नहीं है। 22 जुलाई के प्रदर्शन पेलेट गन से जख्मी होने का यह कोई पहले मामला नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस ने लेडी हार्डिंग अस्पताल में भर्ती एक मरीज की फोटो के साथ खबर की थी, सोशल मीडिया पर साप्ताहिक आउटलुक के पत्रकार के जख्मी होने की खबर है और अब यह तीसरा। सरकार ने अभी तक पेलेट गन का इस्तेमाल स्वीकार नहीं किया है। कानून के पालन के मामले में ऐसी सरकार चाहती है कि कानून बना देने भर से उसका विरोध रुक जाए। समर्थक इसीलिए, ऐसा प्रचार कर रहे हैं। कल सोनम वांगचुक का अनशन खत्म कराए जाने का प्रचार था। आज देशबन्धु की खबर के अनुसार, सरकार ने उन्हें (सोनम को) भरोसा दिया है कि वह पेपर लीक पर संसद में चर्चा कराएगी और आंदोलनकारी छात्रों पर कार्रवाई नहीं की जाएगी। द हिन्दू की लीड के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट सोमवार को उन दो नई याचिकाओं पर सुनवाई करने के लिए सहमत हो गया है, जिनमें राष्ट्रीय राजधानी में 20 जुलाई को छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की ज्यादतियों का आरोप लगाया गया है। यह घटनाक्रम भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत द्वारा शुक्रवार को खुली अदालत में यह स्पष्ट किए जाने के कुछ घंटों बाद हुआ कि इस मुद्दे पर पहले “कोई याचिका” दायर नहीं की गई थी। उन्होंने उन “गैर-जिम्मेदाराना” खबरों की आलोचना की जिनमें कहा गया था कि अदालत ने इस मामले को सूचीबद्ध करने से इनकार कर दिया था। यहां इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर गौरतलब है। इसके अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने एक अंतरिम आदेश के जरिए अदालत की कार्यवाही की रिकॉर्डिंग और उसके प्रसार को प्रतिबंधित कर दिया है। वकील ने अदालत को बताया कि पुलिसकर्मी छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अत्यधिक बल का प्रयोग कर रहे हैं; सीआरपीएफ का कहना है कि वह पैलेट (छर्रे) से लगी चोटों के बारे में मीडिया रिपोर्टों की पुष्टि कर रही है; सीजेपी ने  कहा है कि ‘पुलिस की बर्बरता’ को दर्शाने वाले वीडियो और तस्वीरों को संरक्षित करने के लिए एक वेबसाइट शुरू की जाएगी।

देश के मुख्य न्यायाधीश की खबर राजनीति के पन्ने पर और वह भी स्पष्टीकरण। आखिर इस स्पष्टीकरण की जरूरत क्यों पड़ी होगी? मेरे ख्याल से यह बताने के लिए कि मेरी नजर एंटायर पॉलिटिकल साइंस की डिग्री पर नहीं है। वैसे, ऐसा कहने वाला भारत का मुख्य न्यायाधीश कितना लाचार होगा कि वह फर्जी डिग्री के मामले में बोल ही सकता है, कार्रवाई नहीं कर सकता है। मुझे लगता है कि ऐसे समय में भारत के मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणियों और उनके यू-टर्न के संबंधित अंशों को भी याद किए जाने की जरूरत है। आपको याद होगा कि अप्रैल 2026 में दिल्ली हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ के समक्ष अरविंद केजरीवाल की केस स्थानांतरण सुनवाई से अलग होने की अपील वाली याचिका पर बहस हुई। इस सुनवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी। हाईकोर्ट ने इसे नियमों का उल्लंघन मानते हुए इंटरनेट से हटाने के निर्देश जारी किए और अवमानना की बात आगे बढ़ी। मई 2026 में वरिष्ठ अधिवक्ताओं से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्य कांत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कुछ अनियंत्रित और आधारहीन आरोप लगाने वालों की तुलना “कॉकरोच” और “पैरासाइट” (परजीवी) से की। इस टिप्पणी पर देशभर के युवाओं, आरटीआई ऐक्टिविस्ट और मीडिया में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। इसके बाद सीजेआई ने खुली अदालत में स्पष्टीकरण दिया कि उनके वक्तव्य को गलत संदर्भ में लिया गया; उनका आशय युवाओं को ठेस पहुंचाना नहीं बल्कि प्रणाली पर गलत तरीके से हमला करने वाले तत्वों से था। फिर भी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का गठन हुआ। 20 जुलाई 2026 को दिल्ली में विरोध प्रदर्शन हुआ। इस दौरान पुलिस बल प्रयोग की खबरें सामने आईं। 22 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट में एक अधिवक्ता द्वारा सीजेपी के प्रदर्शन पर हुई कथित पुलिस ज्यादती के वीडियो फुटेज देखने की अर्जी लगाई गई। सीजेआई सूर्य कांत की पीठ ने तत्काल सुनवाई से इनकार करते हुए मौखिक टिप्पणी की कि “अदालत का समय खराब न करें, हम वीडियो देखने में रुचि नहीं रखते”। 24 जुलाई 2026 को खुली अदालत में स्थिति स्पष्ट की गई। मुख्य न्यायाधीश ने शुक्रवार को खुली अदालत में स्पष्ट किया कि पूर्व में इस विषय पर औपचारिक याचिका प्रस्तुत नहीं की गई थी, इसलिए मीडिया में आई रिपोर्ट, कोर्ट ने मामले को सुनने से मना कर दिया, पूरी तरह भ्रामक थीं। 20 जुलाई को हुई पुलिस ज्यादतियों के आरोपों पर औपचारिक रूप से दायर की गई। दो नई याचिकाओं पर अब सुप्रीम कोर्ट आने वाले सोमवार को सुनवाई करने के लिए सहमत हो गया है। हालांकि, वीडियो रिकार्डिंग का प्रसारण प्रतिबंधित कर दिया गया है। जानकारों का कहना है कि मुख्य न्यायाधीश ने जो कहा या नहीं कहा तो मना करने में कई दिन नहीं लगाए होते तो यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट में भी था और वहां लंबी तारीख नहीं पड़ती। लेकिन उसी दिन आदेश दे दिया जाता तो उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाती और फिर बात वही होती, समय लगता, देर होती। अभी भी वही हो रहा है। जनता को राहत कहां है, सरकार पर नियंत्रण कहां है?

हिन्दुस्तान टाइम्स की आज की लीड भी खबर के रूप में सरकारी प्रचार है। बच्चे भी समझ रहे हैं कि सरकार जो कर रही है वह सिर्फ दिखावा है, अभी के दबाव से बचने की कोशिश है और ये प्रयास अगर किए ही जाने थे तो बहुत पहले किए जाने चाहिए थे। फिर भी इसे छह कॉलम की लीड बनाया गया है तो ‘खबर’ का दूसरा हिस्सा, शिक्षा मंत्री के इस्तीफे पर प्रदर्शनकारी दृढ़ – ज्यादा बड़ी खबर है और शुरू से है लेकिन प्रचार सरकार के काम या कदम का है। दि एशियन एज की लीड का पहला हिस्सा यही है कि सीजेपी प्रधान की बर्खास्तगी पर दृढ़ है और वार्ता का अगला दौर आज होगा। वैसे भी जो कदम स्वीकार नहीं किए गए, बहुत देर से उठाए गए हैं वह खबर कैसे हो सकती है खबर तो यह होनी चाहिए कि नड्डा के पास कितने अधिकार हैं? आप जानते हैं कि विदेशी पत्रकारों से कहा जा चुका है कि प्रधानमंत्री सीधे बात करते हैं, पत्रकारों या प्रेस कांफ्रेंस के जरिए नहीं करते हैं। यहां अपने समकक्ष एक मंत्री को हटाने की मांग के मामले में नड्डा दूत से ज्यादा कुछ हो ही नहीं सकते हैं फिर भी वे बात कर रहे हैं और उनकी बात लीड बन रही है तो यह प्रचार और टाइमपास ही है। इसीलिए राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रेंस करके छर्रे मारने का जो मामला उठाया वह पहले पन्ने पर नहीं है या सिंगल कॉलम में है या पीड़ित की फोटो के बिना है। द टेलीग्राफ में यह खबर दोनों की फोटो के साथ दो कॉलम में है। लीड कलकत्ता में प्रदर्शन की खबर और फोटो है। 

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।   

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन