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दिल्ली

अमित शाह, जे.पी. नड्डा और पीयूष गोयल ने बैठे-बिठाए पूरे देश में यह संदेश दे दिया कि सांसदों का बहुमत भाजपा नेतृत्व के साथ नहीं है!

संतोष भारतीय-

दिल्ली में संसद भवन के पास कांस्टीट्यूशन क्लब है। यह क्लब काफी पहले बना था, जिसका उद्देश्य था कि संसद के सदस्य, संसद के भूतपूर्व सदस्य और समाज के बुद्धिजीवी वर्ग के लोग यहां मिलें और आपस में विचार-विमर्श करें। यहां बहुत बुनियादी सी सुविधा थी, एक भवन भी था, एक महालनकर हॉल भी था, जिसमें बड़े-बड़े समारोह होते थे। धीरे-धीरे संसद के वर्तमान और भूतपूर्व सदस्यों ने यह निर्णय लिया कि इसे एक आधुनिक विचार केंद्र के रूप में बदला जाए। पिछले 20 सालों में धीरे-धीरे यहां नया भवन बना, नई सुविधाएं आईं, आधुनिक यंत्र लगे और यहां के सभा भवन न केवल दिल्ली में, बल्कि पूरे देश में विख्यात हो गए। पूरे देश के वे संस्थान जो महत्वपूर्ण गोष्ठियां या सभाएं करना चाहते थे, उन्होंने कांस्टीट्यूशन क्लब का प्रयोग करना शुरू किया। आज यह क्लब पूरे देश में गौरव का स्थान बन गया है और अब कई राज्यों में कांस्टीट्यूशन क्लब की तर्ज पर राज्यों के भी अपने कांस्टीट्यूशन क्लब बनाने की योजनाएं चल रही हैं।

इस क्लब को संचालित करने वाली एक समिति है, जिसमें सेक्रेटरी (प्रशासन) होता है और लगभग 11 की कार्यकारिणी होती है। अब तक इसका चुनाव बहुत सौहार्दपूर्ण वातावरण में लगभग सर्वसम्मति से होता आया था। इस बार यानी 2025 में मंगलवार, 12 अगस्त को जो चुनाव हुआ, वह बहुत ही निम्न स्तर पर पहुंच गया और इसने आने वाले समय में क्या होगा, इसकी आधारशिला रख दी।

12 अगस्त को संपन्न हुए चुनाव में वर्तमान सेक्रेटरी (प्रशासन), भारतीय जनता पार्टी के भूतपूर्व मंत्री और वर्तमान सांसद श्री राजीव प्रताप रूडी एक उम्मीदवार थे, और उनके मुकाबले में एक बड़े वर्ग ने भूतपूर्व मंत्री और भूतपूर्व सांसद श्री संजीव बालियान को खड़ा कर दिया। यद्यपि दोनों ही उम्मीदवार भारतीय जनता पार्टी के ही सदस्य हैं, लेकिन पता नहीं क्यों भारतीय जनता पार्टी के भीतर इस चुनाव को लेकर बहुत ही ज्यादा गर्मी पैदा हो गई। भारतीय जनता पार्टी के प्रख्यात सांसद श्री निशिकांत दुबे ने खुलेआम श्री राजीव प्रताप रूडी का विरोध करना शुरू किया और दल से जुड़े बाकी लोगों ने यह माहौल बनाया कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व श्री राजीव प्रताप रूडी को नहीं, बल्कि श्री संजीव बालियान को क्लब का अध्यक्ष बनाना चाहता है।

इस माहौल ने चुनाव को धीरे-धीरे मर्यादा की सीमा से नीचे गिरा दिया। जाट बनाम गैर-जाट हो गया, दलित बनाम उच्च जाति हो गया, बाहुबली बनाम गैर-बाहुबली हो गया और आखिर में लगने लगा कि यह कांस्टीट्यूशन क्लब के सेक्रेटरी (प्रशासन) का चुनाव नहीं, बल्कि भारत के राष्ट्रपति का चुनाव है।

यह चुनाव फिर भी अपनी गरिमा नहीं खोता, यदि मंगलवार को एक घटना न घटती। भारतीय जनता पार्टी की तरफ से तेजी से प्रचार किया गया कि भाजपा नेतृत्व श्री राजीव प्रताप रूडी को नहीं, बल्कि श्री संजीव बालियान को क्लब का अध्यक्ष बनाना चाहता है और इसके लिए श्री अमित शाह ने संजीव बालियान के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दे दिया है।

मंगलवार की शाम अचानक सुरक्षाकर्मी अलर्ट हो गए और एक कार आई। उस कार में से देश के गृह मंत्री श्री अमित शाह, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री जे.पी. नड्डा और देश के शक्तिशाली मंत्री पीयूष गोयल उतरे। इन्होंने एक साथ जाकर वोट डाला, जबकि दोनों उम्मीदवार राजनीतिक रूप से भाजपा से ही जुड़े हैं। इन्होंने वोट डालकर यह बता दिया कि वे संजीव बालियान के पक्ष में हैं। किसी को समझ में नहीं आया कि आखिर श्री राजीव प्रताप रूडी के खिलाफ भाजपा की क्या नाराजगी है। अगर अमित शाह पहले ही बुलाकर श्री राजीव प्रताप रूडी से कह देते कि उन्हें चुनाव नहीं लड़ना है, तो वे चुनाव नहीं लड़ते।

इतना ही नहीं, इन सारी घटनाओं ने देश की मीडिया का इतना ध्यान कांस्टीट्यूशन क्लब के चुनाव पर केंद्रित कर दिया कि सुबह से लेकर शाम तक यह खबर न्यूज़ चैनलों की बड़ी खबर बनती रही। 13 तारीख की सुबह 4:00 बजे जब परिणाम की घोषणा हुई, तब भी देश के सारे न्यूज़ चैनल वहां पर थे और कांस्टीट्यूशन क्लब दोनों नेताओं के समर्थकों से खचाखच भरा था। सभी का यह मानना था और पत्रकार भी वहां बताते दिख रहे थे कि कैसे उन्होंने श्री संजीव बालियान के पक्ष में और श्री अमित शाह के पक्ष में माहौल बना दिया। पहली बार देश के कोने-कोने से भूतपूर्व सांसद और सांसद, जो क्लब के सदस्य थे, अपना पैसा लगाकर दिल्ली आए और उन्होंने वोट डाला।

लेकिन परिणाम सारे अनुमानों के विपरीत निकला। सेक्रेटरी (प्रशासन) के पद पर श्री राजीव प्रताप रूडी 100 मतों से विजयी घोषित हुए। साथ ही कार्यकारिणी के चुनाव में सबसे ज्यादा मत भूतपूर्व सांसद प्रदीप गांधी को मिले — 500 मत — जिसने यह साबित किया कि जहां लोगों ने या क्लब के सदस्यों ने श्री राजीव प्रताप रूडी पर भरोसा किया, वहीं प्रदीप गांधी पर सबसे ज्यादा विश्वास किया।

श्री अमित शाह, श्री जे.पी. नड्डा और श्री पीयूष गोयल ने बैठे-बिठाए पूरे देश में यह संदेश दे दिया कि सांसदों और भूतपूर्व सांसदों का बहुमत भाजपा नेतृत्व के साथ नहीं है, बल्कि क्लब के सदस्य भाजपा के उस “आधिकारिक” उम्मीदवार — जिसका संकेत श्री अमित शाह ने वोट देकर दे दिया था — के विरोध में हैं और राहुल गांधी व अखिलेश यादव के समर्थन में हैं। पूरे देश में अपने आप यह प्रचार हो गया कि श्री राहुल गांधी, श्रीमती सोनिया गांधी और श्रीमती जया बच्चन ने खुला समर्थन श्री राजीव प्रताप रूडी को दे दिया, जिसकी वजह से वे कांस्टीट्यूशन क्लब के सेक्रेटरी (प्रशासन) बन गए। यद्यपि यह प्रचार बिल्कुल गलत है, सत्य यह है कि सांसदों और भूतपूर्व सांसदों ने क्लब के हित में, श्री राजीव प्रताप रूडी की मेहनत को देखते हुए अपना फैसला दिया।

अब अगले चुनाव में राजनीतिक दल अपने-अपने उम्मीदवार खड़े करेंगे, उनके लिए प्रचार करेंगे, उनके लिए पैसा खर्च करेंगे और यह चुनाव राजनीति की शतरंज पर पैसे के बल पर खेला जाएगा। जिस तरह विधानसभा और लोकसभा के चुनाव में हथकंडे अपनाए जाते हैं, वैसे ही आने वाले चुनाव में यहां भी अपनाए जाएंगे।

इतिहास किसे इस सारी घटना का दोषी मानेगा, इसे इतिहास पर ही छोड़ देते हैं।

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