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दिल्ली

कॉरपोरेट मीडिया ने बरसों तक भारतीय समाज की राजनीतिक स्मृतियां खुरच-खुरचकर मिटाई थीं लेकिन दिल्ली पुलिस की लाठियों ने उन्हें पुनर्जीवित कर दिया!

राकेश कायस्थ-

सब याद रखा जाएगा…

सिर पर चोट लगने से यादाश्त का वापस लौटना अब तक सिर्फ फिल्मों में होता था लेकिन दिल्ली में सचमुच हो गया। कॉरपोरेट मीडिया ने बरसों तक भारतीय समाज की राजनीतिक स्मृतियां खुरच-खुरचकर मिटाई थीं लेकिन दिल्ली पुलिस की लाठियों ने उन्हें पुनर्जीवित कर दिया।

खून से नहाया यह नौजवान जंतर-मंतर का एक प्रतिनिधि चेहरा बन गया। ऐसे ना जाने कितने चेहरे हैं। सिर से खून बह रहा है लेकिन आँखों में वो इरादे हैं जो किसी भी अनैतिक सत्ता की नींद उड़ा दें।

Man with bloodied face and neck, wearing a gray tank top, in an outdoor setting with bystanders nearby

आपने 20 जुलाई को कई ऐसे दृश्य देखे होंगे जब बेरहमी से पिट रहे किसी नौजवान ने डरने से इनकार कर दिया। वो पुलिस वाले की आंखों में आंखें डालकर देखता रहा लेकिन प्रतिरोध में हाथ नहीं उठाया। ऐसा पहले कब हुआ था?

समाज की स्मृतियां वापस लौटीं तो सवाल भी वापस लौटे। हर कोई पूछने लगा कि क्या पहले किसी सरकार ने जायज मांगों को लेकर पहले अनशन और फिर शांतिपूर्ण तरीके से मार्च कर रहे छात्रों पर इस तरह लाठियां चलाई थीं?

क्या पहले किसी सरकार ने पुलिस के साथ अपनी पार्टी के गुंडों को निर्दोष छात्रों पर हमले के लिए मैदान में उतारा था? इमरजेंसी की कथाएं बांचकर सरकारी खैरात ले रहे धूर्त बूढ़े पत्रकार इसका जवाब देंगे? उनसे कोई पूछ भी नहीं रहा है क्योंकि समाज की स्मृति अब वापस लौट चुकी है।

जेन जी के नौजवान यू ट्यूब पर वो तमाम वीडियो निकालकर देख रहे हैं और एक-दूसरे से साझा कर रहे हैं जो ये बताती हैं कि अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान के तात्कालिक सरकार ने क्या किया था। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह देश की संसद को अन्ना हजारे की सेहत पर अपडेट दिया था, उनसे अनशन तोड़ने का आग्रह किया था और सर्वदलीय बैठक बुलाई थी ताकि आम-सहमति से कोई रास्ता निकाला जा सके।

मौजूदा सरकार ने सोनम वांगचुक को अनशन स्थल से उठा लिया। शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट का नेतृत्व कर रही सोनम की पत्नी के साथ पुलिस ने बदसलूकी की। अन्ना हजारे ने इस देश के सामने करप्शन खत्म करने का सपना बेचा था और सरकार की कनपटी पर बंदूक रखकर रातो-रात एक ऐसा कानून बनाने की जिद कर रहे थे, जो उनके हिसाब से देश की सभी समस्याओं का निदान था।

नीट के पेपर लीक 2021 से लगातार हो रहे हैं। धर्मेंद्र प्रधान के शिक्षा मंत्री रहते हुए तीन बार पेपर लीक हुए और इसकी कीमत उन बीस परिवारों ने चुकाई जिनके निराशा में डूबे बच्चों ने आत्महत्या कर ली। ऐसे में शिक्षा मंत्री का नैतिक आधार पर इस्तीफा देना कौन सी बड़ी बात थी? पीड़ित परिवारों का सरकार से जिम्मेदारी लेने का आग्रह करना और शिक्षा मंत्री को हटाने की मांग किस तरह नाजायज था?

इसके जवाब में परीक्षा के दौरान छात्रों को मन की बात सुनाने वाले प्रधानमंत्री ने चुप्पी साध ली और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने छात्रों को देश विरोधी, आतंकवादी और नक्सली जैसे विशेषणों से सम्मानित किया।

सोई हुई स्मृतियां जग चुकी हैं। इस देश इस समाज को याद आ रहा था कि ‘मौन मोहन सिंह’ की सरकार ने मुंबई में हुए आतंकवादी हमलों के बाद केंद्रीय गृहमंत्री को सिर्फ इसलिए पद से हटा दिया था क्योंकि उन्होंने तीन अलग-अलग कार्यक्रमों अलग-अलग पोशाक पहने और राष्ट्रीय सदमे के समय ऐसा करना अंसवेदनशील था।

‘रिमोट कंट्रोल’ से सरकार चलाने वाली सोनिया गांधी ने महाराष्ट्र के ताकतवर मुख्यमंत्री को रातों-रात इसलिए बदला क्योंकि उनके स्टार पुत्र अपने दोस्तों के साथ किसी फिल्म का आइडिया डिस्कस करने होटल ताज का मुआयना करने चले गये और इसे भी सरकार ने असंवदेनशील माना। उत्तरदायी सरकारें ऐसी ही हुआ करती हैं।

क्या आज के जमाने में कोई इस तरह की बातों की कल्पना कर सकता है। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री का बेटा लखीमपुर में सात प्रदर्शनकारियों को गाड़ी से रौंद देता है लेकिन मजाल है कि कोई कार्रवाई हो जाये। मंत्रीजी पूरी अकड़ के साथ सवाल पूछने वालों को धमकाते रहते हैं और न्यू इंडिया की महान न्यायपालिका बाद में मंत्री पुत्र को बरी कर देती है।

नरेंद्र मोदी का पिछले 12 साल का कार्यकाल ऐसी असंख्यक घिनौनी और बजबजाती घटनाओं से भरा है। जिस निर्भया कांड के बाद बीजेपी-आरएसएस समर्थकों ने उपद्रवी भीड़ की शक्ल में इंडिया गेट पर भारी बलवा किया था और एक पुलिस वाले की जान ले ली थी, उस कांड को लेकर यूपीए सरकार का स्टैंड क्या था?

मनमोहन सिंह की सरकार ने एयर एंबुलेंस से निर्भया को इलाज के लिए सिंगापुर भेजा था लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका। जब निर्भया का शव आया तो कड़कती सर्दी में स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी एयरपोर्ट पर मौजूद थे। दुनिया के इतिहास में ऐसे बहुत कम उदाहरण मिलेंगे जब एक नागरिक के शव की अगवानी के लिए देश का प्रधानमंत्री एयरपोर्ट पर खड़ा हो। राहुल गांधी ने निर्भया के भाई की पढ़ाई का पूरा बंदोबस्त किया। ये बात सामने भी नहीं आती, अगर कई साल बाद में निर्भया की मां खुद इसका जिक्र नहीं करती।

अब दूसरी तरफ देखिये। ‘बेटी बचाओ’ नारे के साथ सत्ता में आने वाले नरेंद्र मोदी जब अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी का दौरा कर रहे थे, उसी दौरान यौन उत्पीड़न और फरियाद ना सुने जाने से दुखी बीएचयू हॉस्टल की लड़कियों को पुलिस ने बेरहमी से पीटा। जंतर-मंतर पर यौन उत्पीड़न की फरियाद लेकर धरने पर बैठी महिला ओलंपियन रेसलर को पुलिस ने सड़क पर घसीटा और उनपर लाठियां चलाईं।

अपनी पार्टी के हर बलात्कारी का बीजेपी ने जमकर साथ दिया। जम्मू से लेकर उन्नाव तक बलात्कारियों के समर्थन में रैलियां निकाली गईं, बीजेपी के गुंडों के शक्ति प्रदर्शन हुए। आसाराम से लेकर राम रहीम तक बलात्कार के हरेक सजायाफ्ता स्वयंभू बाबा की सरकार ने जमकर मदद की और उनकी सजा को लगभग अर्थहीन बना दिया।

गोदी मीडिया यह सवाल उठाता है कि मोदी नहीं तो कौन? पिछली किसी भी सरकार और खासकर मनमोहन सिंह सरकार की इस रिजीम से तुलना करना तथ्यों की अवहेलना का पाप ही नहीं होगा बल्कि संपूर्ण मनुष्यता का अपमान होगा। मेंटल कंडीशनिंग इस तरह की थी कि कई नौजवान पूछ बैठते थे कि मोदी नहीं तो फिर विकल्प क्या है?

कैंसर को ऑपरेशन करके हटाया जाता है, उसका विकल्प नहीं ढूंढा जाता है। विकल्प जो भी हैं,इससे लाख दर्जा बेहतर हैं। देश की नौजवान पीढ़ी को अब ये बात समझ में आ चुकी है।

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