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शब्दचर्चा (54) : क्या दीपावली सही है और दिवाली या दीवाली ग़लत हैं?

नीरेंद्र नागर-

परसों दिवाली है… सॉरी, दीवाली है… नहीं-नहीं, दीपावली है!

एक पर्व और तीन-तीन नाम। बहुत कन्फ़्यूश्ज़न है। क्या सही, क्या ग़लत, क्या लिखें, क्या न लिखें?

आइए, आज की शब्दचर्चा 54 में हम यही पता लगाते हैं कि दीपावली, दीवाली और दिवाली में क्या सही है और क्या ग़लत।

चूँकि यह स्तंभ हिंदी मीडिया में इस्तेमाल हो रहे शब्दों से संबंधित है, इसलिए पहले जान लें कि हिंदी मीडिया में क्या लिखा जा रहा है। मैंने नेट पर जो ख़बरें देखीं, उससे पता चला कि दिवाली शब्द का प्रयोग सबसे अधिक हो रहा है, उसके बाद दीवाली का और सबसे कम प्रयोग दीपावली का किया जा रहा है।

यानी जिस शब्द के बारे में कोई संदेह ही नहीं है, उसका प्रयोग सबसे कम हो रहा है। ऐसा क्यों हो रहा है और क्या हमें उसके लिए चिंतित होना चाहिए, उसपर हम अंत में बात करेंगे। पहले जान लेते हैं कि दिवाली और दीवाली में क्या सही है।

अगर लोगों की बात करें तो मेरे हिसाब से कोई आधे लोग दिवाली को सही बताएँगे और आधे दीवाली को। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ कि कुछ साल पहले मैंने इन्हीं दो शब्दों पर फ़ेसबुक पर पोल किया था। तब 57% ने दिवाली को सही बताया था और 43% ने दीवाली को।

कुछ लोग इन दोनों को ही ग़लत बताते हैं यह कहकर कि सही शब्द दीपावली है क्योंकि संस्कृत में यही है। लेकिन यदि हिंदी के किसी शब्द के सही-ग़लत का पैमाना यही हो कि संस्कृत में क्या है तो दूध भी ग़लत है और घर भी। कल से क्या हम दूध को दुग्ध कहना शुरू कर दें और घर को गृह?

इसमें तो कोई संदेह नहीं कि मूल शब्द दीपावली है। दीप का मतलब दीया और अवली का मतलब पंक्ति। इस तरह दीपावली का मतलब हुआ दीयों की पंक्ति। लेकिन यह दीपावली शब्द दीवाली या दिवाली में कैसे बदला, यह कई लोगों को समझ में नहीं आता। वे सोचते हैं कि दीपावली से दीवाली/दिवाली बना तो दीप का ‘प’ कहाँ गया, ‘वली का ‘वाली’ कैसे हो गया। आज हम इसी की पड़ताल करेंगे।

दरअसल हिंदी के कई शब्द संस्कृत से सीधे आए हैं (तत्सम) और कई प्राकृत के मार्फ़त (तद्भव)। दीपावली का दीवाली भी प्राकृत के मार्फ़त ही हुआ है।

प्राकृत में दीप को दीव कहते हैं। यानी दीप से ‘प’ हट गया और वह ‘व’ हो गया। प्राकृत के इस ‘दीव’ का प्रभाव आज भी पश्चिमी भारत में देखा जा सकता है जहाँ दीये को गुजराती में દીવો और मराठी में दिवा कहा जाता है। हिंदी में भी लोक में दीवा का प्रचलन है हालाँकि दीया अधिक चलता है। वैसे दीया भी प्राकृत के माध्यम से ही आया है। प्राकृत में दीप का एक रूप दीऊ भी था जो आगे चलकर दीया में बदल गया।

संस्कृत का ‘दीप’ जब प्राकृत में ‘दीव’ बन गया तो दीपावली का रूप भी बदलना ही था। वह भी दीपावली से दीववली हो गया।

प्राकृत का यह दीववली ही संभवतः आगे चलकर दीवाली बना। भाषाविद् डॉ. सुरेश पंत के अनुसार यह परिवर्तन कुछ इस तरह हुआ होगा – दीप>दीव + अवली>वली= दीववली जो बाद में दीवली > दीवाली हो गया।

दिलचस्प बात यह है कि संधि विच्छेद करने पर दीवाली का भी वही अर्थ निकलता है जो दीपावली का है। दीवा (दीया) + अली (पंक्ति) = दीवाली। चलिए, यह तो हमने जान लिया कि दीवाली दीपावली से ही बना है और संधि विच्छेद से उसका अर्थ भी वही निकलता है जो दीपावली का है। लेकिन दिवाली का मसला तो अभी सुलझा नहीं। यह दीवाली आख़िर दिवाली कैसे हो गया?

मेरी समझ से इसका कारण दीवाली शब्द में मौजूद मात्राएँ हैं जो तीनों की तीनों भारी हैं। तीन वर्ण, तीनों पर दीर्घ मात्राएँ – ई(दी), आ(वा), ई(ली)। ऐसे शब्द बोलने में हमारी जीभ को तकलीफ़ होती है और वह एकाध मात्रा को हल्की कर देती है, ख़ासकर वह जो शुरू में हो।

इस प्रवृत्ति के कई उदाहरण हैं। जैसे शब्द है पीटना लेकिन उससे संज्ञा बनती है पिटाई, न कि पीटाई। इसी तरह शब्द है मीठा लेकिन उससे संज्ञा बनती है मिठाई, न कि मीठाई। महाराष्ट्र में एक ज़िला है सातारा लेकिन हिंदी में उसे सतारा बोलते हैं। इसी तरह उर्दू का आज़ादी पंजाबी में अजादी हो जाता है, लेकिन सिर्फ़ बोलने में, लिखने में नहीं। लिखते हैं आजादी, बोलते हैं अजादी।

हो सकता है, पहले लोग दीवाली लिखते रहे होंगे लेकिन चूँकि तीन दीर्घ स्वर बोलने में परेशानी होती होगी इसलिए आम लोगों के मुँह से उच्चारण दिवाली का ही निकलता होगा। फिर धीरे-धीरे कई लोग लिखने में भी दिवाली का ही प्रयोग करने लगे क्योंकि बोला तो वही जा रहा था।

और इस तरह दीवाली के साथ-साथ दिवाली भी प्रचलित हो गया।

आज की तारीख़ में दीपावली, दीवाली और दिवाली – ये तीनों रूप सही हैं।

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1 Comment

1 Comment

  1. मधु कपूर

    October 23, 2025 at 1:18 pm

    Confusion स्पष्ट हो गया दिवाली और दीवाली को लेकर । धन्यवाद ।

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