उर्मिलेश-
एक पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम के सिलसिले में दिल्ली से तकरीबन हजार किमी दूर होने के कारण आज सुबह जंतर-मंतर या संसद भवन के आस-पास का नज़ारा देखने नहीं निकल सका. एक पत्रकार के लिए ऐसे मौकों पर रहकर माहौल का जायजा लेना जरूरी होता है.
बहरहाल, अब कुछ मित्र-पत्रकारों के वीडियोज, कुछ प्रमुख वेबसाइटों की अपेक्षाकृत तथ्यपरक रिपोर्टिंग और टीवीपुरम की पूर्वाग्रही रिपोर्टिंग की रोशनी में अब तक जो कुछ देखा-समझा; उससे जंतर-मंतर प्रतिरोध के मुझे 5 महत्वपूर्ण पहलू नजर आ रहे हैं:
- वर्षों बाद युवाओं का राष्ट्रीय राजधानी में ऐसा बड़ा शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक-प्रतिरोध दिखा है. निश्चय ही यह सरकार से युवाओं की नाराजगी का नतीजा है. संसद के मॉनसून सत्र के पहले दिन विपक्ष के नेताओं का भी ऐसा ही आकलन रहा.
- इस पूरे प्रतिरोध के पीछे दिल्ली और देश के अन्य हिस्से के कुछ छात्र-युवाओं की मेहनत की उल्लेखनीय भूमिका नज़र आ रही है. 20 जुलाई के प्रदर्शन में आसपास (और कुछ दूर के भी) के इलाकों से भी छात्र-युवा आये हैं.
- अपने दो साथियों Aamin और Manish के साथ 23 दिन का अनशन करने वाली JNU की शोधछात्रा Neha Bora ने ऐसे तमाम युवाओं को अपनी नि:स्वार्थ भूमिका, खासतौर पर जोखिम भरे लंबे अनशन से प्रभावित किया.
- इस बड़े छात्र-युवा प्रदर्शन और लंबे समय से जारी जंतर-मंतर प्रतिरोध को टीवीपुरम सिर्फ CJP और Sonum Wangchuk की कोशिश का नतीजा बता रहा है. निश्चय ही शुरुआत में CJP इस अभियान का प्रमुख किरदार रही. पर बाद के दिनों में उसकी और उसके नेता की काफी आलोचना भी की गई!
- शायद सत्ताधीश भी जंतर-मंतर प्रतिरोध को ‘डिपके-वांगचुक के दायरे’ में देखना चाहते हैं ताकि वे उनके जरिये अतिशीघ्र इसे समाप्त करने के अपनी पसंद के किसी फार्मूले पर सहमति बना सकें!
सत्येंद्र पीएस-
आंदोलन ऐसे ही चूतियापे वाले मसलों पर होता है. बेरोजगार युवाओं को कॉकरोच बोला था सुप्रीम कोर्ट के जज ने. तब तक नीट मामले में धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग शुरू हो गई.
डफली वाले लोग भी गाने बजाने पहुँच गए. तब तक चंद्रशेखर रावण पहुँच गए. डिंपल यादव पहले भी जा चुकी थी और आज अपने दर्जन भर सांसद लेकर संसद से जंतर मंतर तक मार्च कर दिया. यूपी के बच्चे पहले से पेपर लीक और आरक्षण में धांधली से परेशान हैं और डिंपल ने एलान कर दिया कि वह बच्चों के साथ हैं.

मुद्दा मुद्दी कुछ नहीं है. लोग बेरोजगारी कुशासन लूट घूसखोरी से अकबकाए हुए हैं.
कांग्रेस और इसके सपोर्टर गज़ब के चिरकुट हैं. वह अलग ही मानसिक विकलांगता से जूझ रहे हैं कि इस आंदोलन के पीछे कौन है, किसका हाथ है… ब्लां ब्लां. जबकि अभी भी हालत यह है कि अगर सरकार के खिलाफ कोई भी माहौल बनता है तो उसकी सबसे बड़ी लाभार्थी कांग्रेस होगी. जैसे अन्ना का गन्ना भाजपा चूस गई थी.
लेकिन कांग्रेस जैसी नास पार्टी खोजने पर नहीं मिलेगी. जिस अमरिंदर सिंह ने किसान आंदोलन कराकर मोदी की अंतरराष्ट्रीय छीछालेदर करा दी थी, नवजोत सिद्धू नाम के जोकर के चलते उन्हें हटा दिया और पंजाब में कांग्रेस को खुद ही दफन कर दिया.
कांग्रेस की हरकतें ऐसी हैं कि यह मोदी के खिलाफ किसी भी आंदोलन को खत्म करने की पूरी ताकत रखती है.



