पंकज शुक्ला-
पत्रकारिता में ग़लतियां निकालने वाले बहुत मिलते हैं, उन्हें सुधारकर बेहतर कॉपी ख़ुद लिखकर बताने वाले बहुत कम। जुयाल जी इन्हीं कम लोगों में से एक रहे। कानपुर और बरेली में हम दोनों ने साथ काम किया। कानपुर में थे तो टाइम मैगजीन आते ही मेरे हाथ में थमाते।

कुछ पन्ने पहले से मुड़े होते। मुझे पता होता कि अंतर्राष्ट्रीय पेज के लिए मुझे उन आलेखों का हिंदी में अनुकूलन करना है। किसी दैनिक अख़बार में छपी मेरी पहली इन्वेस्टिगेटिव ख़बर की बाईलाइन भी उन्हीं की दी हुई थी और उसका आठ कॉलम का डिस्प्ले भी। जुयाल जी जैसे लोग पहले भी कम होते थे, अब वह नहीं हैं तो कलेजा मुंह को आ रहा है। बहुत याद आओगे जुयाल जी !!
गणेश रावत-
काश यह झूठ हो! बहुत देर से कई पत्रकार साथियों की पोस्ट देख रहा हूं कि बड़े भाई और मार्गदर्शक Dinesh Juyal जी हम सबको छोड़कर अनंत यात्रा में चले गए हैं। सैंतीस साल पहले अमर उजाला बरेली की फ्रंट पेज डेस्क में ट्रेनिंग के दौरान आपका मार्गदर्शन मिला और साथ ही आपका भरपूर स्नेह भी। यह सिलसिला लगातार चलता रहा है और आज इस मनहूस खबर से हतप्रभ हूं। कभी कभी लगता है कि आंखों का देखा, कानों का सुना हुआ सब झूठ हो और एक बुरा सपना साबित हो।
अफसोस है कि आपसे मई 2024 के बाद कोई वार्तालाप नहीं हो पाया और न ही आपकी गंभीर बीमारी की खबर लग सकी।
विनम्र श्रद्धांजलि।
नवनीत द्विवेदी-
कानपुर में संपादक रहते हुए कई बार हरदोई दौरे पर आए सर, हर बार कुछ न कुछ स्पेशल कर जाते ! कभी कंधे पर हांथ रख देते तो कभी पैदल कुछ दूर निकल लेते! इंचार्ज को दरकिनार कर निचले स्तर पर स्नेह और आशीष की बरसात करने वाले जुयाल सर के तमाम संस्मरण हैं। सादर नमन। अब ऐसे संपादक कहां….
अनुपम मार्कण्डेय-
हम लोगों ने लंबे समय तक अमर उजाला बरेली में साथ काम किया. उनसे जुड़ी यादें अनंत हैं. वह एक बेहतरीन इंसान, ईमानदार और लिक्खाड़ संपादक थे.
दयाशंकर राय-
ऐसे कैसे चले गए दिनेश जुयाल भाई..! अमर उजाला और हिंदुस्तान में संपादक रहे और 1988 से मेरठ अमर उजाला के दिनों से साथी रहे अजीज दोस्त, बहुत ही नेकदिल इनसान और रीढ़ वाले पत्रकार भाई दिनेश जुयाल जी के न रहने की तोड़ देने खबर मिल रही है..! शायद कैंसर था जिसकी खबर दोस्तों को भी न लगने दी..! ऐसे कैसे चले गए दाज्यू..! अभी तो मिलने का वादा था..! लेकिन क्या कहूँ अभी तो..!
ज्योति राघव-
मैंने इनके साथ काम नहीं किया सर, लेकिन इनके बारे में बहुत सुना है। मेरी एक दोस्त ने परिवार के खिलाफ जाकर अमर उजाला बरेली में नौकरी की। दोस्त की मम्मी दफ्तर आ गई थीं और कहा कि मेरी बेटी को नौकरी से निकाल दीजिए। हमें नौकरी नहीं करानी और वो बात नहीं सुन रही है। तब जुआल सर वहां संपादक थे। उन्होंने स्थितियों को संभाला। उसकी मम्मी को आश्वासन देकर घर भेजा। दोस्त को नौकरी से भी नहीं निकाला। शुरुआत के कुछ दिन दोस्त को जल्दी घर भेज दिया करते थे। फिर धीरे धीरे उसके परिवार ने भी समझा और सपोर्ट किया। बाद में उसने स्कूटी दौड़कर देर रात तक रिपोर्टिंग भी की। शुरुआत में अगर सर उसकी पारिवारिक स्थितियों को नहीं समझते तो आज वो जहां पहुंची है कभी नहीं पहुंच पाती। आज उसी दोस्त से ये दुखद खबर मिली। बहुत खाली महसूस कर रही है।
राम आसरे यादव-
अमर उजाला कानपुर के लांचिंग से ही जुयाल जी का स्नेहपूर्ण सानिध्य मिला था, बाद में संपादक के रूप में कानपुर में कई वर्षों तक उनका साथ रहा, बहुत ही मिलनसार इंसान थे, छोटे बड़े का कोई भेदभाव नहीं था! जुयाल जी का जाना बहुत ही दुःखद है, ईश्वर उनकी आत्मा की शांति प्रदान करें, विनम्र श्रद्धांजलि!
महेंद्र अवधेश-
जुयाल सर, मैं आज तक अपने मिशन पर अड़ा हूं… साल 1995-96 के सत्र में भारतीय विद्या भवन के कानपुर केंद्र से मैंने भी पत्रकारिता में परास्नातक डिप्लोमा कोर्स किया था, कुछ दोस्तों के कहने पर। वैसे अखबारों-पत्रिकाओं के लिए लिखना 1992 से ही शुरू कर दिया था। 1993 से स्थानीय दैनिकों के लिए रिपोर्टिंग भी शुरू हो गई थी। लेकिन, कुछ अभिन्न मित्रों का कहना था कि पत्रकारिता में डिग्री-डिप्लोमा जैसा भी कुछ जरूर होना चाहिए। दिक्कत यह कि पैसा पल्ले था नहीं।
खैर, छोटी दीदी ने त्याग किया और परम् आदरणीय श्री विष्णु त्रिपाठी जी एवं केंद्र प्रमुख डॉ रमेश चिंतक के स्नेह-संरक्षण तले मेरी यह पढ़ाई येन-केन-प्रकारेण पूरी हुई। लिखित परीक्षा के बाद VIVA का नंबर आया, तो सामने बैठे थे दिनेश जुयाल साहब एवं डॉ. चिंतक। डॉ. साहब तो कुछ बोले ही नहीं। लेकिन जुयाल सर ने मुझे घेर सा लिया। मेरी शक्ल-ओ-सूरत और छोटा कद हमेशा की तरह एक बार फिर चुनौती बनकर विपक्षी नंबर दो के रूप में वहां भी मौजूद था।
जुयाल सर ने पहले औपचारिक तौर पर कुछ सवाल पूछे, तो मैंने अपनी समझ के मुताबिक उचित जवाब देने का प्रयास किया। अचानक उन्होंने कहा कि पत्रकारिता तो मिशन है, लेकिन यह धर्म तो बहुत कम लोग ही निभा पाते हैं; आप क्या करेंगे? मैंने कहा कि मिशन मानकर ही आया हूं। इस पर उन्होंने कहा कि अगर न निभा सके तो? उनके इस सवाल पर मेरा कनपुरिया खून उबाल मार गया। मैंने तड़ से जवाब ठोंक दिया, तो फिर बिक जाऊंगा, जैसे दूसरे बिकते हैं!
हालांकि इस जवाब को लेकर बाद में मुझे जमकर फजीहत झेलनी पड़ी, कहा गया कि वह अमर उजाला के स्थानीय संपादक जी थे। गर्मी दिखाकर तुमने ठीक नहीं किया, एक अच्छी नौकरी का संभावित अवसर गंवा दिया। उसके बाद जुयाल सर से कभी मेरी आमने-सामने की मुलाकात नहीं हुई। हां, अभी कुछ साल पहले से हम दोनों फेसबुक मित्र जरूर बन गए थे।
लेकिन जुयाल सर, आपका यह कनपुरिया ‘महेंद्र कुमार श्रीवास्तव’ अब तक बिका नहीं और न कभी झुका। भले ही आज गुरबत दर गुरबत मुझे रौंदने के लिए बेताब है। देवाधिदेव महादेव मेरी इस बात के साक्षी हैं। आपको शत-शत नमन…


