विश्व दीपक-
जिमखाना क्लब का जिन्न मोदी जी ने अभी बाहर क्यों निकाला?
ठीक उसी वक्त जबकि युवाओं में नीट पेपर लीक को लेकर बेचैनी है, 22 लाख लोगों की ज़िंदगी से खिलवाड़ करने वाला मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान खुद संघी सेना के सवालों के घेरे में है, पेट्रोल 100 रुपये प्रति लीटर हो चुका है, उत्तर प्रदेश के कई इलाके 48 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी अंधेरे में डूबे हुए हैं – मोदी सरकार और उनकी पैशाचिक सेना ने दिल्ली के जिमखाना क्लब का मुद्दा छेड़ दिया.
जानते हैं क्यों? सैडिस्ट प्लेज़र की वजह से. जो सरकार जनता को वास्तव में कोई खुशी नहीं दे सकती, वह उन्हें सैडिस्ट प्लेज़र यानि परपीड़ा की खुशी देती है. यह पुराना लेकिन बेहद सफल फॉर्मूला है.
जॉम्बी बन चुकी पांच किलो राशन पर ज़िंदा रहने वाली जनता को इस बात से खुशी मिलती है कि अब अमीरों की बस्ती भी लुट रही है. उनके घर पानी पहुंचे या न पहुंचे, बिजली आये या न आये – इससे उन्हें खास फर्क नहीं पड़ता. लेकिन एलीट जिमखाना की बत्ती गुल होने वाली है – यह सोचकर वह खुशी से नाचने लगता है.
आपने गौर किया होगा कि जिमखाना को मंडल-कमंडल जैसे घिनौने, अवसरवादी ऐय्याशगाह और दारू पीने के अड्डे के तौर पर प्रचारित कर रहे हैं जबकि वहां एक लाइब्रेरी है, स्वीमिंग पूल है जिसे अरुण जेटली ने बनवाया था, बेहतरीन जिम है और दीवारों पर टंगा भारत का इतिहास भी है.
बीजेपी की तरफ से दिल्ली मुख्यमंत्री का चेहरा रहीं किरण बेदी महामना मोदी के फैसले पर दुख व्यक्त कर रही हैं लेकिन सोशल मीडिया पर सक्रिय मोदी की पैशाचिक सेना जश्न मना रही है. उसका जोर टेकओवर कम, क्लब के चरित्रहनन पर ज्यादा है.
यह इसीलिये क्योंकि पांच किलों राशन पर जिंदा रहने वाला भगवा योद्धा जब मोबाइल पर जिमखाना का वीडियो देखता है और फिर मोदी सरकार की कार्रवाई के बारे में सुनता है तो वह गर्मी में भी मोर की तरह नाचने लगता है.
उसे लगता है कि मोदी जी अमीरों की ऐसी की तैसी कर रहे हैं. कितना महान और जनवादी हैं मोदी जी. उस सूतिये को नहीं पता कि मोदी जी जिमखाना की ज़मीन लेकर एक दिन चुपके से किसी अडानी, अंबानी को बेंच देंगे. उसे यह भी नहीं पता कि उसके दिमाग का सॉफ्टवेयर हैक कर लिया गया है. वह सैडिस्ट प्लेज़र में डूबकर अपने दुख को भूल जाता है. जब वह अपने दुख ही भूल जाता है तो दुख के कारण पर सोचेगा क्यों? तब वह सरकार से सवाल कैसे करेगा? मकसद भी यही है.
दिल्ली के जिमखाना क्लब का जिन्न मोदी सरकार ने इस वक्त इसीलिये बाहर निकाला ताकि जनता के बैचैन दिमाग को सैडिस्ट प्लेज़र की डोज से कुछ देर के लिये ही सही सुन्न किया जा सके.
प्रधानमंत्री मोदी की सुरक्षा पर भारत सरकार ₹1.62 करोड़ प्रतिदिन खर्च करती है. मतलब ₹ 6.75 लाख प्रति घंटा. यानि ₹11,263 प्रति मिनट. सालाना यह खर्चा करीब ₹500 करोड़ बैठता है. यह सिर्फ एसपीजी का बज़ट है.

अगर इसमें सीआरपीएफ, पुलिस इत्यादि का खर्चा मिला लिया जाये तो प्रधानमंत्री की सुरक्षा पर प्रतिदिन हमारी सरकार करीब ₹2 करोड़ रुपये खर्च करती है. यह रकम आसमान से नहीं टपकती. हमारी आपकी जेब से निकाली जाती है. फिर भी जिमखाना क्लब पीएम की सुरक्षा के लिये खतरा है?
शर्म आनी चाहिये उस सरकार को जो इतना खर्च करने के बाद भी प्रधानमंत्री की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकती.
दूसरी बात कि सेंट्रल विस्टा के तहत पीएम का नया आवास अलग बन रहा है. जब पीएम का आवास ही लोककल्याणा मार्ग नहीं रहेगा तो सुरक्षा की चिंता कहां से पैदा हो गई?
असली वजह न तो पीएम की सुरक्षा है न ही उपनिवेशवाद से मुक्ति. वजह है कुंठा. मकसद है गरीब जनता को परपीड़ा का सुख देना ताकि वह अपनी गरीबी और दुर्दशा पर सवाल न कर सके. प्राइम लोकेशन पर मौजूद जमीन हड़पना और उसे अंबानी-अडानी या उनके जैसे किसी दूसरे पूंजीपति लुटेरों को सौंप देना.
जिमखाना क्लब की फीस अगर कम है तो सरकार बढ़ा सकती है लेकिन फीस भी मकसद नहीं है. अगर दारू पीने पिलाने से कोई अय्याश हो जाता है तो फिर अटल जी के बारे में क्या कहेंगे? प्रमोद महाजन, अरुण जेटली के बारे में क्या कहेंगे?
एलीटिज्म का राजनीतिक तौर पर विरोध करना अलग बात है. एलीट संस्थाओं को ध्वस्त करना अलग बात है. यह उस बंदर वाली मानसिकता है जो उस्तरा पाते ही दूसरे का कान काटने लगता है. मैं कोई जिमखाना का समर्थक नहीं हूं लेकिन उसे धवस्त करने का समर्थन कतई नहीं किया जा सकता. वह हमारी विरासत – अच्छी या बुरी – का हिस्सा है.
जो लोग इसके सरकारी टेकओवर को उपनिवेशवाद से जोड़कर पेश कर रहे हैं उनमें एक चीज कॉमन मिलेगी – वो सब कुंठित और नैतिक रूप से भ्रष्ट हैं.
जिन लोगों ने अंग्रेज़ी राज के लिये मुखबिरी की, जिन्होंने अपना राजनीतिक अस्तित्व अंग्रेज़ों की चाकरी करते हुये गढ़ा वो जब औपनिवेशिक सोच निशानियों से मुक्ति की बात करते हैं तो दुख नहीं होता गुस्सा आता है.
जिनका आज़ाद भारत की स्थापना और निर्माण में नाखून कटाने से भी कम योगदान है वो जब भारत को औपनिवेशिक सोच से मुक्ति दिलाने का ठेका ले रहे होते हैं तो उनके बड़बोलेपन पर तरस आता है. जन्मजात कुंठा से पार पाने की प्रतिक्रिया में तैयार किये गये उनके फर्जी ज्ञान-विज्ञान, इतिहासबोध पर दया आती है.


