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साहित्य

प्रभात रंजन की ये किताब मीडिया में ‘हिंदी मीडियम’ वालों का दर्द और इलाज दोनों बताती है!

संजीव पालीवाल-

“हिन्दी माडियम टाइट” पढ़ गया। एक ही सिटिंग में। पढ़ते-पढ़ते मुस्कुराता रहा। दिल्ली जब आया था और यहां की दुनिया में खुद को कैसे स्थापित किया। सारी कहानी प्रभात रंजन जी की किताब पढ़ते हुए आंखों के सामने घूम गयी।

मैंने दिल्ली में कदम 1994 में रखा था। वो दुनिया भी अंग्रेज़ी की दुनिया थी। पढ़ कर ख्याल आया कि मुझे भी वो सब संस्मरण लिखना चाहिये। देश के पहले प्राइवेट टीवी न्यूज़ चैनल की दुनिया की कहानी लिखी जानी चाहिये।

खैर यहां बात प्रभात रंजन जी के तजुर्बे की। इस डायरीनुमा उपन्यास की। उनकी भाषा की। कमाल की रवानगी है उनकी लेखनी में। कसे हुए किस्सागो हैं। लेखक बनने की उनकी ख्वाहिश तो वैसे पूरी हो चुकी है।

तीन किताबें तो मेरी नज़र से गुज़र चुकी हैं। उनके इस तजुर्बे को पढ़ना चाहिये। पढ़ कर शायद आज की पीढ़ी हिन्दी मीडियम वालों का दर्द समझ पाये।

प्रभात जी को बहुत बहुत बधाई। बहुत सारे लोगों को अपना वक्त याद आयेगा इसे पढ़ कर। और जो आज की पीढ़ी है उसके लिये काफी नुस्खे हैं। कैसे लिखना सीख सकते हैं?

कैसे अपनी पहचान बना सकते हैं? कैसे “भैय्या” बनने से बच सकते हैं? कैसे “हाऊ स्टूपिड” और “या या” से बच सकते हैं। ध्यान रखें लड़की अगर “हाऊ लवली” बोले तो उस प्यार का इज़हार ना समझें।

90 के दशक में कैसे हिन्दी बोलने वाला और हाथ जोड़ कर नमस्ते करने वाला संघी समझा जाता था इसका भी दिलचस्प विवरण है।

और इसमें हमारे प्रिय लेखक भगवान दास मोरवाल भी हैं।

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