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साहित्य

फिर ऐसे ‘जन संस्कृति मंच’ में रहने का क्या मतलब है?

मुकुल सरल-

किसी सवाल का जवाब नहीं आया… पहले रवि भूषण पर उठे सवालों का जवाब नहीं दिया गया। अब रामजी राय और गोपाल प्रधान पर उठे सवालों पर भी चुप्पी है। फिर ऐसे संगठन (जसम-जन संस्कृति मंच) में रहने का क्या मतलब है? क्योंकि यह तीनों जसम के वरिष्ठ जन हैं। प्रतिष्ठित लेखक-आलोचक। सवाल उठने के बाद तो रवि भूषण जी को जसम का बाक़ायदा अध्यक्ष बनाकर सम्मानित किया गया।

इस सब पर संगठन के भीतर सवाल पूछने के बाद भी उपेक्षा और चुप्पी का माहौल बनाए रखा गया।

मुद्दा आप सब जानते ही होंगे। इस बार मुद्दा है पीएचडी के एक छात्र की थीसिस चोरी का। लंबे समय से यह विवाद है। इस पर पहले पत्रकार साथी धीरेश सैनी ने समयांतर के फरवरी. 2023 के अंक में विस्तार से लेख लिखा और अब जून, 2023 के अंक में वरिष्ठ कवि-लेखक अजय सिंह ने लेकिन जसम के भीतर कोई जुंबिश नहीं। कोई खंडन नहीं, कोई नोटिस नहीं। इसका क्या मतलब समझा जाए। अगर सब आरोप सच हैं तो कोई खेद, माफ़ी या शर्मिंदगी नहीं।

अजय सिंह के लेख की स्कैन कॉपी साझा कर रहा हूं। मूल लेख पढ़ने के लिए कथाकार पंकज बिष्ट के संपादन में निकलने वाली मासिक पत्रिका समयांतर का जून 2023 का अंक देखें।

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