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आज के अखबार : लुटियन की दिल्ली में लठैती को ‘झड़प’ और ‘मार्च की कोशिश’ बताने की बेशर्मी

Protest banner with the headline 'LASH OF LUTYENS’' and a baton image, plus the subtitle 'Blood, tears and batons, all for seeking education accountability'.

द टेलीग्राफ का शीर्षक – लुटियन की दिल्ली में लठैती। पुलिस वालों की आधुनिक लाठी की तस्वीर के साथ अखबार ने लिखा है कि शिक्षा में जवाबदेही मांगने की कीमत—खून और आंसू से तथा लाठियां मार कर वसूली गई।

संजय कुमार सिंह

दिल्ली में कल जो सब हुआ उसकी खबरों के अनुसार, 118 पुलिस वाले और 60 प्रदर्शनकारी घायल हुए हैं। 70 को डिटेन किया गया है। द हिन्दू ने 138 लोगों के घायल होने की रिपोर्ट दी है। अमर उजाला ने इसे ‘झड़प’ और नवोदय टाइम्स ने ‘मार्च की कोशिश’ कहा है। मेरे 10 अखबारों में अकेले अमर उजाला ने घायल पुलिस वाले की फोटो छापी है और इसकी तस्वीरों से लगता है कि उत्पात कम नहीं हुआ। प्रदर्शनकारी कुछ हासिल नहीं कर पाए और पुलिस ने उन्हें खदेड़ दिया। किसी भी आरएसएस वाले से बात कीजिए, यही कहता मिलेगा। अमर उजाला में एक तस्वीर का कैप्शन है – प्रदर्शनकारी संसद की ओर बढ़े तो जवानों ने संभाला मोर्चा। फोटो, प्रस्तुति और शीर्षक से लग रहा है कि अखबार यह बताने की कोशिश कर रहा है कि मामला नियंत्रण में था। मुख्य शीर्षक में 70 से अधिक हिरासत में तो लिया गया है लेकिन यह नहीं बताया गया है कि 60 प्रदर्शनकारी घायल हुए हैं। यह सरकारी आंकड़ा है, निश्चित रूप से इससे ज्यादा घायल हुए होंगे। फिर भी यह सूचना खबर में अंदर है। अखबार ने यह जरूर बताया है कि प्रदर्शनकारी फिर से जंतर मंतर पर इकट्ठे हो गए हैं। चार में से एक फ्लैग शीर्षक है, रात दो बजे 200 से अधिक सीजेपी समर्थक जंतर मंतर पर फिर जुटे, नया मंच भी बनाया। नवोदय टाइम्स ने पांच कॉलम की लीड का शीर्षक लगाया है, सीजेपी की संसद मार्च की कोशिश। दो उपशीर्षक हैं, पहला आंदोलन हुआ हिंसक, रोकने के लिए आंसू गैस, लाठी चार्ज और दूसरा, लुटियंस जोन और आसपास के इलाकों में अफरा-तफरी।

इन दों अखबारों की तुलना में हिन्दी के ही दैनिक भास्कर में यह खबर बैनर है। शीर्षक है – संसद पर 14 साल का सबसे बड़ा प्रदर्शन। देशबन्धु में भी यह बैनर है। शीर्षक है – संसद चलो मार्च में उमड़ा जन सैलाब। उपशीर्षक संसद चलो का कारण है – शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर मार्च में हजारों प्रदर्शनकारी शामिल हुए। जाहिर है प्रदर्शन जोरदार था। पुलिस ने ज्यादती की और भले बच्चों को गाली देते रिकार्ड हुए – मार भी खाए। अब सरकार चाहे जो करे उसकी लोकप्रियता का अंदाजा लग गया है। आम नागरिकों के साथ पुलिस और मीडिया को भी। यह अलग बात है कि आदतन कुछ लोग इसे कम करके बताएं। सोशल मीडिया पर कुछ लोग सोनम वांगचुक की आलोचना कर रहे थे कि वे अनशन समाप्त कर देंगे और कुछ लोग राहुल गांधी की इस सवाल के साथ कि, कहां हैं? असल में वे जो कह रहे हैं उसका मतलब यही है कि श्रेय क्यों नहीं ले रहे हैं। हालांकि कहने का तरीका अलग-अलग है। आज खबर है कि सोनम वांगचुक ने अनशन जारी रखने का एलान किया है। राहुल गांधी ने वीडियो जारी करके कहा है, धुर युवा-विरोधी हैं प्रधानमंत्री मोदी। यह खबर आज मुझे सिर्फ देशबन्धु में पहले पन्ने पर दिखी। देशबन्धु ने प्रधानमंत्री के भाषण को भी पहले पन्ने पर छापा है जो उन्होंने मानसून सत्र की शुरुआत पर दिया और कहा कि 56 नहीं, 28 साल के युवा बढ़ा रहे हैं देश का मान। 76 साल के बुढ़ऊ जो कर रहे हैं उसका अंदाजा तो उन्हें भी नहीं होगा।  हालांकि कल का पूरा प्रदर्शन और विरोध उन्हीं के खिलाफ था। 

दिल्ली में कल जो सब हुआ उसका सबसे बढ़िया शीर्षक कलकत्ता के अंग्रेजी अखबार द टेलीग्राफ ने लगाया है। हिन्दी में इसका निकटतम अर्थ होगा – लुटियंस की दिल्ली में लठैती। बेशक कल जो हुआ या किया गया वह सरकारी लठैती के अलावा कुछ नहीं है। पुलिस वालों की आधुनिक लाठी की तस्वीर के साथ अखबार ने लिखा है कि शिक्षा में जवाबदेही मांगने वालों को इसकी कीमत खून और आंसू से तथा लाठी की मार खाकर चुकानी पड़ी। इसके तहत दो खबरें, दो शीर्षक हैं। पहला शीर्षक है – पुलिस की ‘बर्बरता’ के बाद सोनम उपवास जारी रखेंगे। दूसरी खबर का शीर्षक है, भविष्य के लिए लड़ते हुए जेन ज़ी का डर खत्म हुआ। दि एशियन एज ने इसे चार कॉलम की लीड बनाया है। मुख्य शीर्षक है, सीजेपी का संसद मार्च रोक देने की अव्यवस्था में दिल्ली ठहरी; कई गिरफ्तार। द हिन्दू की लीड भी चार कॉलम की है। शीर्षक है, सीजेपी के संसद मार्च पर कार्रवाई में कई जख्मी। टूटी हड्डियों के साथ ढेरों अस्पताल में। सिर और आंखों में भी चोट क्योंकि पुलिस ने प्रदर्शन के दौरान लाठी चार्ज कर दी। पुलिस ने कहा, 70 प्रदर्शनकारी डिटेन किए गए। सीजेपी के नेताओं ने नड्डा से मुलाकात की, प्रधान को बाहर करने की मांग की। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर सात कॉलम की लीड है। शीर्षक है, सड़कों पर अव्यवस्था की गूंज संसद में। इसके साथ की एक खबर का शीर्षक है – पुलिस प्रदर्शनकारी भिड़े, राजधानी युद्ध का मैदान बनी। टाइम्स ऑफ इंडिया की चार कॉलम की लीड का शीर्षक है, पुलिस ने प्रदर्शनकारियों का संसद मार्च रोका; नड्डा सीजेपी के प्रतिनिधियों से मिले। दि इंडियन एक्सप्रेस की छह कॉलम की लीड का शीर्षक है,  प्रदर्शनकारियों ने दिल्ली के केंद्र में हंगामा किया, मार्च को रोकने के लिए पुलिस ने लाठियों और आंसू गैस के गोले का इस्तेमाल किया।

स्पष्ट है, आज की खबर का शीर्षक भिन्न अखबारों ने अपने हिसाब से लगाया है। द टेलीग्राफ को छोड़कर बाकी सब ने किसी एक या दो या कुछ और बातों को शीर्षक से रेखांकित किया है। लेकिन द टेलीग्राफ का शीर्षक समग्रता में है जो पूरी खबर का भाव बताता है। पसंद-नापसंद से अलग आज की प्रस्तुति की खासियत यह है कि कुछ अखबारों की खबर पुलिसिया हिंसा और बर्बरता को बहुत कम आंक रहे हैं और ऐसा न सिर्फ खबरों से है, फोटो के चयन में भी है। उदाहरण के लिए, आज खबरों में भले कहा गया है कि 118 पुलिस वाले घायल हो गए लेकिन सोशल मीडिया पर एक ही पुलिस वाला दिखा जिसे खून बह रहा था। अमर उजाला ने उस एक पुलिस वाले की फोटो छापी है और पुलिसिया पिटाई, बर्बरता की कोई फोटो (पहले पन्ने पर) नहीं है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने पहले ही पन्ने पर लिखा है, पूरा कवरेज पृष्ठ 2, 4, 6 और 10। इनमें कई खबरें हैं। एक खबर मानसून सत्र के उद्घाटन पर प्रधानमंत्री का भाषण भी है। देश भर के युवाओं ने जब संसद मार्च की अपील की थी, देश में शिक्षा का बुरा हाल है और निकम्मे शिक्षा मंत्री को हटाने की मांग लंबे समय से की जा रही है तब मार्च रोकने के लिए सरकार ने जो गैर सरकारी व्यवस्था की थी उसपर आज पहले पन्ने पर कुछ खास नहीं दिखा। सिर्फ नवोदय टाइम्स ने पत्थर वाले ट्रक की खबर छापी है। कहने की जरूरत नहीं है कि कल का पूरा हंगामा निकम्मे शिक्षा मंत्री को हटाने की मांग पर हुआ था और उन्हें हटाए जाने की खबर नहीं आई। इसके उलट कल दिन भर खबर रही कि सीजेपी के प्रतिनिधियों से जेपी नड्डा की बात हुई।

Hindi newspaper front page reporting government formation, photo shows three men presenting a document.

भास्कर इनसाइट नहीं, भाजपा का प्लांटेशन लगता है

दि एशियन एज में आज यह खबर चार कॉलम में छपी है। शीर्षक है – सरकार ने पहल की, आंदोलन के बीच सीजेपी से मिली। वैसे तो नड्डा से या उनके सीजेपी वालों से बात करने का कोई मतलब नहीं है लेकिन इसके पीछे की राजनीति ने इसे खबर बना दिया। लोग मिलने वालों को गालियां देने लगे कि दूसरे लाठी खा रहे थे ये मंत्री के ड्राइंग रूम में बैठे थे। पर मंत्री ने बुलाया क्यों और बात क्यों की यह मुद्दा नहीं है। वैसे भी, यह भाजपा सरकार की कार्यशैली है। खबर के अनुसार दिल्ली के डीसीपी ने वार्ता का चैनल शुरू करने के लिए करवाया था। पर गृहमंत्री से क्यों नहीं, राम को लाने वाले जानें। आपने सुना होगा कि तृणमूल के गद्दार सांसदों की बैठक केंद्रीय मंत्री भूपेन्द्र यादव के घर में होती थी। फिर खबर आई कि उनके चार करीबी सहायकों को अचानक हटा दिया गया है। अब सरकार में दल बदल कराने वाला कोई विभाग तो हो नहीं सकता है लेकिन भाजपा में इस काम का श्रेय अमित शाह यानी पार्टी चाणक्य को दिया जाता है। ऐसे में भूपेन्द्र यादव ने दलबदल में क्या भूमिका निभाई और उनके सहयोगियों ने क्या किया कि सबको हटा दिया गया आज तक पता नहीं चला है। इसी तरह मंत्री को हटाने की बात मंत्री क्यों करेंगे समझना मुश्किल है। लेकिन इस सरकार को समझना कब आसान रहा। पारदर्शिता धेले भर की नहीं है लेकिन कांग्रेस की सरकार को भ्रष्ट कहेंगे। रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ कार्रवाई आज तक नहीं कर पाए। स्विस बैंक के काले धन का पता ही नहीं चला। फिर भी आरएसएस के प्रचारक बच्चों को समझाते हैं कि धर्मेंद्र प्रधान की शिकायत हमने बीजेपी, आरएसएस के लेवल पर की है। यह नहीं बताते कि हुआ क्या और कुछ नहीं हुआ तो किस बात का इंतजार कर रहे हैं। जो भी हो आज यह खबर खूब छपी है। जैसे नवोदय टाइम्स ने लिखा है, सीजेपी प्रतिनिधि नड्डा से मिले और धरना स्थगित। अखबारों की खबरों से लगता है कि सूत्र अब सिर्फ खबरें प्लांट करवाते हैं। हमारे समय में सूत्रों की खबर गलत होती थी तो रिपोर्टर की क्लास लग जाती थी और रिपोर्टर यही कहता था कि ये और वो वाली खबर इसी ने दी थी जो सही और हिट थी। अब अच्छे दिन चल रहे हैं। जैसे इसी अखबार में एक खबर है और दोनों की फोटो के साथ छपी है – घर्मेन्द्र प्रधान ने अमित शाह से मुलाकात की। लेकिन क्या बात हुई इसकी जानकारी नहीं मिली। यह पहले पन्ने की खबर नहीं है और है तो क्यों है।

द टेलीग्राफ ने इस खबर का शीर्षक लगाया है, सीजेपी ने सरकार से कहा – प्रधान को इस्तीफा देना ही होगा। देशबन्धु में शीर्षक है -सीजेपी ने तीन मांगों के साथ नड्डा को ज्ञापन सौंपा। आप समझ सकते हैं कि एक ही खबर अलग शीर्षक से अलग प्रभाव छोड़ती है। दैनिक भास्कर में यह चार कॉलम से ज्यादा की खबर है भास्कर इनसाइट के रूप में जैसे पेश की गई है उससे लगता है कि सरकार बहुत चिन्तित है और मामला निपटाने में लगी है जबकि मांग बहुत सीधी-सरल सी है। हिन्दुस्तान टाइम्स में इस खबर का शीर्षक है – शाह, प्रधान ने वार्ता की; नड्डा सीजेपी के प्रतिनिधियों से मिले। स्मृति काक रामचंद्रन की बाईलाइन वाली इस खबर में लिखा है, नड्डा ने यह जानकारी एक्स पर दी। इससे आप समझ सकते हैं कि नड्डा को मीडिया और बवाल संभालने में लगाया गया होगा। इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर फोटो के साथ है, शीर्षक है – नड्डा सीजेपी टीम से मिले, पर सरकार ने संकेत दिया: सुनेंगे पर वादा नहीं। टाइम्स ऑफ इंडिया में तो यह लीड के शीर्षक का हिस्सा है। जाहिर है, सरकारी कोशिश पूरी तरह कामयाब नहीं रही। लेकिन कम भी नहीं है।   

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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