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मंगज जी चले गए; पत्ता टूटा डारि से, ले गइ पवन उड़ाय!

अनिल सिंह-

मंगज जी चले गए; पत्ता टूटा डारि से, ले गइ पवन उड़ाय!

आना-जाना तो लगा ही रहता है। माली आवत देखि के, कलियां करें पुकारि। फूली-फूली चुनि लईं, काल्हि हमारी बारि। लेकिन कुछ लोगों का जाना आपका होना ही बेमानी कर देता है, समूचा वजूद छीनकर ले जाता है। आर.पी. श्रीवास्तव या मंगज जी का जाना मेरे लिए कुछ ऐसा ही विछोह है। उन्होंने ही मुझे दूसरों के लिए, देश-दुनिया व समाज के लिए जीना सिखाया था। उन्होंने अगर मुझे जीवन के नए अर्थ की दीक्षा न दी होती है तो मैं भी आईएएस/ आईपीएस बनकर इस समय रिटायरमेंट के बाद मोटी पेंशन पर सुरक्षित जीवन जी रहा होता। दस साल की उम्र से ही मैंने जिस तरह राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षाएं क्रैक की थीं, उसमें आईएएस बनना मेरे लिए कतई मुश्किल नहीं था। लेकिन उनकी वजह से मैंने लीक छोड़ी तो अभी तक ताजिंदगी असुरक्षा के साये में जीता रहा और आगे भी कोई सुरक्षा नज़र नहीं आती। मेरे माता-पिता और भाई-बहन मेरे ‘पथ-भ्रष्ट’ होने की एकमात्र वजह उन्हें ही मानते और हमेशा उन्हें कोसते रहे हैं।

मंगज जी उस वक्त इलाहाबाद विश्वविद्यालय की आईएएस फैक्टरी कहे जानेवाले म्योर या ए.एन. झा हॉस्टल में मेरे फोर्थ इयर सीनियर थे। मैथ्स में एमएससी करने के बाद उन्होंने इंग्लिश में एमए किया और दोनों में क्लास में टॉपर से ठीक नीचे रहे। हिंदी साहित्य पर उनकी धाकड़ पकड़ थी। उत्तर प्रदेश पीसीएस पहले ही अटेम्प्ट में टॉप किया। उसके बाद आईएएस में चुने गए और खुद इनकम टैक्स ऑफिसर बनना पसंद किया। इसके बाद हॉस्टल आकर हमें (मैं + दो अन्य) को समझाया था कि आप लोग भी राजनीति वगैरह छोड़कर कम्पटीशन दो और सुरक्षित हो लो। हमने कहा कि मंगज जी, आप किसी तरह की ग्लानि मत पालिए। हम जहां हैं, अपनी सोच की वजह से हैं।

फिर मंगज जी अपने रास्ते चले और हम अपने रास्ते। बीच-बीच में कभी-कभी मुलाकात होती रही। वे अपनी नौकरी में परेशान रहे तो फील्ड से हटकर स्वेच्छा से इनकम टैक्स अफसरों के प्रशिक्षण संस्थान में चले गए। सबसे कटे, अलग-थलग जिंदगी। धीरे-धीरे बीमारियां उन्हें घेरती गईं। डायबिटीज़ से लेकर हार्ट और किडनी तक के असाध्य रोग। करीब आठ साल पहले एक बार मुंबई आए तो छोटे बेटे के साथ मुझसे मिलने मेरे घर आए थे। करीब 40-45 मिनट बाद चले गए। फिर मिलना नहीं हुआ।

पांच साल पहले नवंबर 2018 में मैंने उन्हें एसएमएस किया था तो जवाब आया कि स्वास्थ्य ठीक नहीं है। फिर फोन पर बात हुई तो उन्होंने बताया कि हर हफ्ते डायलिसिस करानी पड़ती है। मैंने कहा कि लखनऊ आया तो ज़रूर आपसे मिलूंगा। फिर न ऐसा संयोग आया और न ही मैं उन्हें फोन कर पाया, यह सोचकर कि कहीं ज्यादा बीमार न हों। अंततः 23 अगस्त को डायलिसिस कराने गए तो कुछ कम्प्लिकेशंस डेवलप हो गए और देखते ही देखते चल बसे। उनके छोटे भाई धीरेंद्र बताते हैं कि उनके हार्ट में स्टेंट लग चुके थे और डॉक्टरों के मुताबिक शायद हार्ट-अटैक आ गया होगा। अब तो उनकी बस यादें और बातें ही बची हैं।

उनकी खूबियों के बारे में लिखूंगा तो लम्बी कहानी ही नहीं, लघु उपन्यास बन जाएगा। इलाहाबाद में उन्होंने मुझे मां की तरह पाला और नायाब गुरु की तरह जीवन-दृष्टि दी। उनका ऋण मैं कभी उतार नहीं पाऊंगा। सार-सक्षेप बस इतना कि उनके जैसा निष्छल, निष्कपट व मेधावी इंसान आज तक मैंने नहीं देखा। बचपन से ही सैकड़ों किताबें उन्हें घोख डाली थीं। राजनीति से लेकर दर्शन व साहित्य के गहन जानकार। गणित व विज्ञान में तो मास्टर थे ही।

एक बार अफसर बनने की मजबूरी पर बात करते हुए उन्हें किसी किताब के शुरू में छपी एक पेटिंग दिखाई थी, जिसमें एक महिला ने फांसी पर लटके व्यक्ति का सोने का दांत चुराते हुए अपना मुंह फेर रखा है। उनका कहना था कि मरे हुए सिस्टम से हम भी निर्वाह के लिए सोने का दांत चुराने में लगे हैं। वह पेटिंग मुझे बार-बार हॉन्ट करती रही थी और मंगज जी से मैं उसके बारे में जानना चाहता था। लेकिन पूछ नहीं पाया।

शनिवार, 26 अगस्त को उनकी विदाई की खबर मिलने के बाद मन एकदम डूबने लगा तो मैंने नेट पर वह पेटिंग खोजने की कोशिश और दस मिनट के भीतर ही मुझे वो मिल गई। उस पेंटिंग का शीर्षक है – A caza de dientes और स्पेन के पेंटर Francisco de Goya (1746-1828) ने साल 1797 में कभी इसे बनाया था। आज उसी पेटिंग के ज़रिए मैं मंगज जी को अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। वैसे, उन पर मुक्तिबोध की कविता – ब्रह्मराक्षस की अंतिम पंक्तियां सटीक बैठती हैं:

पिस गया वह भीतरी औ’ बाहरी दो कठिन पाटों बीच,
ऐसी ट्रेजिडी है नीच!!
बावड़ी में वह स्वयं पागल प्रतीकों में निरन्तर कह रहा
वह कोठरी में किस तरह अपना गणित करता रहा
औ’ मर गया…
वह सघन झाड़ी के कंटीले तम-विवर में
मरे पक्षी-सा विदा ही हो गया
वह ज्योति अनजानी सदा को सो गई
यह क्यों हुआ! क्यों यह हुआ!!

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