नेहाल रिज़वी-
मीडिया इंडस्ट्री में जातिवाद का ज़हर कितना भयानक है। इस बात का अंदाज़ा आप मेरे इस छोटे से सर्वे लगा सकते हैं। जो लोग ये कहते फिरते हैं कि खुद में काबिलियत हो तो कोई आपको रोक नहीं सकता है। लेकिन भाई जब किसी को चलने के लिय रास्ता मिलेगा तब ही तो वो उसपर चलकर आगे निकलेगा न।
सबसे पहले मैंने तीन नाम से सेम रिज्युमे बनाए। यूं समझिए कि अनुभव वाला सेक्शन पूरा सेम। शिक्षा वाला सेक्शन पूरा सेम। स्किल वाला पूरा सेम। तीनों में नाम, पता, ईमेल, फोन नम्बर बगैराह अलग रखा। तीनों रिज्युमो में शैक्षणिक योग्ता वाला सेक्शन भी सेम रखा है। यहां तक की स्कूल. कॉलेज और यूनिवर्सिटी भी सेम रखा।
पहले रिज़्युमे को मैंने अपने नाम से यानि मोहम्मद नेहाल से बनाया। दूसरे वाले में धीरज मिश्रा नाम डाला। तीसरे वाले में सौरभ ठाकुर नाम लिखा। तीनों की अलग-अलग मेल आईडी बनाई। तीन सिम खरीद कर तीन फोन नंबर डाले अलग-अलग। इसके बाद अप्रैल से जून 2022 तक मीडिया क्षेत्र के हर छोड़े बड़े संस्थान में नौकरी के रिज्युमें भेजना शुरू कर दिया।
linkedin से लेकर हर वो प्लेटफार्म पर जाकर जॉब के लिय तीनों रिज्युमे सेंड किए। जहां आजकल मीडिया से संबंधित जॉब की सूचना प्राप्त होती है। भेजने का तरीका भी सेम रखा। इन महीनों में जो चीज़ मुझे परिणाम के रूप में मिली। वो इस इंडस्ट्री की सबसे बड़ी सच्चाई है। जिसे लोग मानने को तैयार नहीं है।
तीन महीने में लगभग 100 संस्थानों में तीनों रिज्युमें भेजे। सबका रिकार्ड बनाता रहा। कब किसको कहां से कॉल आई किसका शॉर्टलिस्ट हुआ किसका नहीं हुआ।
तीन महीनों में किसको कितने जवाब आए?
मोहम्मद नेहाल – महज़ 2 जगह से जवाब आया।
धीरज मिश्रा – 19 जगह से जवाब आया
सौरभ ठाकुर 16 जगह से जवाब आया
मुझे नहीं लगता इसके बाद कुछ अधिक लिखने की ज़रूरत है। मुस्लिम समुदाए को समझना होगा कि 2 हज़ार करोड़ का मॉल बना लेने से समुदाए का विकास नहीं होता बल्कि भागीदारी से संभव होता है। मीडिया के क्षेत्र में आपका कितनी हिस्सेदारी है। कितने चैनल आपने राष्ट्रीय स्तर पर खड़े किए हैं। आपको इसपर विचार की ज़रूरत है।


