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सुख-दुख

मीडिया में भी फरेबी/जुमलेबाजी का बढ़ता चलन!

श्रीप्रकाश दीक्षित-

हिन्दी के अखबारों मे खुद के गुणगान की परंपरा नई नहीं है. दिल्ली से प्रकाशित होने वाला हिन्दी दैनिक हिंदुस्तान साठ के दशक मे मत्थे याने पहले पेज पर नाम के ऊपर लिख कर खुद को हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ अखबार घोषित करता था. आज के दौर मे दैनिक भास्कर प्रतिदिन मत्थे के ऊपर लिख कर याद दिलाता है-पढ़ रहे हैं सबसे विश्वसनीय और नंबर-1अखबार…!

यह बात और है कि खबरों के मामले में दैनिक भास्कर अक्सर अंगरेजी के अखबारों से मात खा जाता है. मसलन बीते गुरुवार को अखबार ने फोटो के साथ खबर छाप कर सूचित किया की मेग्डेलेना एंडरसन स्वीडन की पहली महिला प्रधानमंत्री बन गईं हैं. इसी दिन टाइम्स ऑफ इंडिया और इंडियन एक्सप्रेस ने खबर छापी कि प्रधानमंत्री बनने के 12 घंटे के भीतर उन्होंने इस्तीफा दे दिया.

दैनिक भास्कर ने आज इस्तीफे की खबर छाप कर पाठकों को अपडेट किया है पर वह नंबर-1 के दावे पर खरा नहीं उतरा है. ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है. मैं अक्सर इस पर लिखता रहा हूँ।

इसी तरह भोपाल से प्रकाशित प्रदेश टुडे भी रोज मत्थे के ऊपर ‘पूरा सच, बेहिचक’ की घोषणा करता है. तीन दिन पहले उसने प्रदेश के एक सूचना आयुक्त के खिलाफ खबर छापी पर नाम देने से परहेज किया.

उधर नईदुनिया भी रोज ‘नई सोच, नया अंदाज’ का ऐलान करता है. ऐसा नहीं है की अंगरेजी के अखबार ऐसी जुमलेबाजी में पीछे हैं. मसलन टाइम्स ऑफ इंडिया कार्टूनिस्ट आर के लक्ष्मण के पात्र के मार्फत रोजाना खुद को इंडिया का मोस्ट ट्रस्टेड न्यूज़ ब्रांड घोषित करता है. इंडियन एक्सप्रेस के स्लोगन ‘जर्नलिज़्म ऑफ करेज’ पर जरूर थोड़ा-सा यकीन किया जा सकता है. ये अखबार अक्सर बड़े खुलासे करता रहता है.

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