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सियासत

भाजपा और गोदी मीडिया के झूठ के दो किले धराशाई!

डॉ राकेश पाठक-

झूठ के दो किले धराशाई। नेशनल हैरल्ड केस अदालत ने सुनने लायक भी नहीं माना।

PM संग्रहालय से नेहरू की सामग्री भी ग़ायब नहीं। आज बीजेपी और उसके लोगों द्वारा खड़े किए गए झूठ के दो किले धराशाई हो गए।

एक को ढहाने का काम अदालत ने किया और दूसरे झूठ के परखच्चे खुद सरकार के जवाब से उड़ गए हैं।

१. नेशनल हैरल्ड केस

आप जानते हैं कि पिछले दस साल से नेशनल हैरल्ड के मामले में ED ने सोनिया गांधी, राहुल गांधी आदि के खिलाफ़ मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज कर रखा है। आज एक निचली अदालत ने ED के इस मुकदमे को सुनवाई लायक भी नहीं समझा है और इसे ख़ारिज़ कर दिया गया है।
अदालत ने ED के बारे में प्रतिकूल टिप्पणियां भी की हैं।

२. PM संग्रहालय से दस्तावेज गायब

आपको याद होगा कि झूठ और नफ़रत की फैक्ट्री लंबे समय से आरोप लगाती रही है कि ‘प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय’ से पंडित जवाहरल नेहरू से संबंधित दस्तावेज, सामग्री गायब है।

संग्रहालय से 51 बक्से भरकर सामान ले जाने का आरोप सोनिया गांधी पर लगाया जाता रहा है।

भोंपू मीडिया ने इस पर खूब प्रोग्राम बनाए, डिबेट की थी। अब ये सारे आरोप झूठे निकले हैं। केंद्र सरकार ने लोकसभा में एक तारांकित प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया है कि संग्रहालय से एक भी समाग्री गायब नहीं है।

दिलचस्प बात ये है कि संग्रहालय से नेहरू जी के दस्तावेज या सामग्री गायब होने या अवैध रूप से हटाने के बारे में सवाल बीजेपी सांसद डॉ संबित पात्रा ने पूछा था।

जवाब में संस्कृति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने बताया कि वर्ष 2025 के वार्षिक निरीक्षण में प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से संबंधित कोई दस्तावेज गायब नहीं पाया गया।


अरविंद गुनासेकर-

नेशनल हेराल्ड मामले में ईडी की भूमिका पर विशेष अदालत की कड़ी टिप्पणी

नेशनल हेराल्ड मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्यप्रणाली पर विशेष अदालत ने सख़्त सवाल उठाए हैं और यह माना है कि एजेंसी ने 2021 में मनी लॉन्ड्रिंग जांच शुरू करते समय अपनी ही पहले की स्थिति को पलट दिया।

अदालत के सामने रखे गए तथ्यों के अनुसार—

  • जुलाई 2014 में ईडी ने नेशनल हेराल्ड मामले में डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी की शिकायत को सीबीआई को अग्रेषित किया था।
  • अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिस्डिक्शन) से जुड़ी समस्याओं के कारण सीबीआई ने 2014 में कोई एफआईआर दर्ज नहीं की।
  • इसके बाद 2015 में डॉ. स्वामी ने सीबीआई के समक्ष निजी शिकायत दायर की, लेकिन एक बार फिर अधिकार क्षेत्र के मुद्दे को देखते हुए सीबीआई ने एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर दिया।
  • अदालत ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि विधिक राय के आधार पर 2014-15 के दौरान ईडी ने भी मनी लॉन्ड्रिंग की जांच शुरू नहीं की थी।
  • इसके बावजूद, जब सीबीआई नियमों और प्रक्रिया का पालन करती रही, तब ईडी ने अपना रुख बदलते हुए बिना किसी एफआईआर के मनी लॉन्ड्रिंग की जांच शुरू कर दी।
  • विशेष अदालत ने ईडी के इस आचरण को “एक ओर सीबीआई जैसी अन्य कानून प्रवर्तन एजेंसी के अधिकार क्षेत्र में एकतरफ़ा अतिक्रमण और दूसरी ओर पीएमएलए की योजना से आगे निकलने की एक ग़लत सलाह पर आधारित जल्दबाज़ी” करार दिया।

अदालत ने आगे कहा कि पीएमएलए की संरचना के अनुसार पहले निर्धारित अपराध (शेड्यूल्ड ऑफ़ेंस) का दर्ज होना और उसकी जांच शुरू होना आवश्यक है, और उसके बाद ही मनी लॉन्ड्रिंग की जांच का चरण आता है। अदालत की टिप्पणी थी—“शायद ईडी को भी सीबीआई की तरह संयमित और नियमों का पालन करने वाला रुख अपनाना चाहिए था।”

इस फैसले के साथ विशेष अदालत ने साफ संकेत दिया है कि कानून प्रवर्तन एजेंसियों को तय प्रक्रिया और वैधानिक ढांचे से बाहर जाकर कार्रवाई नहीं करनी चाहिए।

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