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न्यूज़क्लिक केस : क्या वे कभी शर्मिंदा होते हैं?

नीरेंद्र नागर-

सुप्रीम कोर्ट ने आज न्यूज़क्लिक के संस्थापक-संपादक प्रबीर पुरकायस्थ की गिरफ़्तारी को इस आधार पर अवैध ठहरा दिया कि उनकी गिरफ़्तारी से पहले उन्हें या उनके वकील को यह नहीं बताया गया था कि उन्हें किस आधार पर गिरफ़्तार किया जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह फ़ैसला उन दलीलों और सबूतों के आधार पर दिया है जो प्रबीर पुरकायस्थ के वकील ने कोर्ट के सामने पेश किए।

यही दलीलें, यही सबूत प्रबीर के वकीलों ने निचली अदालतों और हाई कोर्ट में भी पेश किए होंगे लेकिन वहाँ से उन्हें न्याय नहीं मिला। क्यों नहीं मिला?

क्या इन अदालतों के जजों को नहीं मालूम था कि क़ानूनी प्रावधानों के अनुसार किसी को गिरफ़्तार करने से पहले उसको बताया जाना ज़रूरी है कि उसे किस क़ानून के तहत और क्यों गिरफ़्तार किया जा रहा है? क्या उन सबूतों पर ग़ौर करते समय इन जजों के चश्मे का नंबर बदल गया था और वे ठीक से देख नहीं पाए?

अगर उनको क़ानूनी प्रावधान मालूम था और उनके चश्मे का नंबर भी ठीक था तो क्यों उन्होंने प्रबीर पुरकायस्थ की गिरफ़्तारी को अवैध घोषित नहीं किया?

क्या इसलिए कि वे दबाव में हैं? सत्ता से डरे हुए हैं?

सोचता हूँ कि जब सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट के किसी फ़ैसले को उलट देता है तो क्या वह फ़ैसला देने वाले हाई कोर्ट के जज यह सोचते भी हैं कि उनसे निर्णय करने में क्या गलती हुई? वे कहाँ चूक गए?

क्या वे अपने फ़ैसले पर, अपनी चूक पर कभी शर्मिंदा भी होते होंगे?

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