संजय कुमार सिंह
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बनारस में नामांकन दाखिल करने के साथ कहा था, “जिस दिन मैं हिंदू-मुस्लिम करूंगा, सार्वजनिक जीवन के लिए अयोग्य हो जाऊंगा… मैं ऐसा नहीं करूंगा, यह मेरा संकल्प है”। कहने की जरूरत नहीं है कि नरेन्द्र मोदी हिन्दू मुस्लिम करके ही प्रधानमंत्री बने हैं और 10 साल यही करते रहे हैं। इसीकारण अपनी हालत ऐसी बना ली है कि एक प्रेस कांफ्रेंस नहीं कर पाये। लेकिन वह अलग मुद्दा है। उन्होंने कहा, अखबारों में छप गया, प्रचार हो गया और तमाम लोगों के लिए इतिहास में दर्ज हो गया। इसके तुरंत बाद उन्होंने कहा है, “धर्म के आधार पर बजट चाहती है कांग्रेस, मैं होने नहीं दूंगा” (अमर उजाला)। उपशीर्षक है, 15 फीसदी बजट अल्पसंख्यकों को देने की थी मंशा। यह आज की खबर है आज के अखबार में छपा है। आज इस खबर के साथ यह भी छपा है कि उन्होंने कहा है, “बाबा साहेब धर्म के आधार पर आरक्षण के खिलाफ थे”। कुल मिलाकर, हिन्दू मुसलमान नहीं करने के अपने कथित संकल्प की घोषणा के 24 घंटे के भीतर वे वही सब करने लगे।
आरक्षण मतलब जाति, नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस मुसलमानों को आरक्षण देगी की घोषणा करके इसे भी हिन्दू मुसलमान से जोड़ दिया है। कहने की जरूरत नहीं है कि इस बार के चुनाव में उन्हें कांग्रेस से डर है और वे कांग्रेस को बदनाम करने में लगे हुए हैं। कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं, निराधार आरोप लगा रहे हैं और चुनाव आयोग सब करने दे रहा है। यह उनकी मजबूरी है क्योंकि चुनावी हार से बचने का यही सबसे आसान तरीका है। जमीन पर वोट बटोरू राजनीति और मीडिया में आदर्श – सरकार की तरफ से यही चल रहा है लेकिन इलेक्टोरल बांड के खुलासे से लेकर अरविन्द केजरीवाल की रिहाई और अब प्रबीर पुरकायस्थ की गिरफ्तारी को अवैध बताना औऱ उन्हें रिहा करने का आदेश सरकार की मनमानी कार्रवाई की पोल खोल रहा है। इससे होने वाले नुकसान से बचने के लिए कुछ भी बोला जा रहा है। इसमें हिन्दुस्तान टाइ्म्स का आज का शीर्षक शामिल है। खबर के अनुसार, वे (प्रधान प्रचारक) हिन्दू-मुस्लिम करने वालों का खुलासा कर रहे हैं। कुल मिलाकर, प्रधानमंत्री और गृहमंत्री चुनाव आयोग और चुनाव प्रचार का मजाक बना रहे हैं, अखबार ये नहीं बता रहे हैं और यही मेरा मुद्दा है।
आज के अखबारों में पहले पन्ने की कुछ प्रमुख खबरें हैं
1. मणिपुर में अपहरण के कई मामले, सप्ताह भर में कम से कम 13 की रिपोर्ट
2. कोई कानून नहीं कहता कि हर मामले में आप लोगों को गिरफ्तार करें – सुप्रीम कोर्ट
3. पाकिस्तान के शरणार्थी ने कहा आज मुझे लग रहा है कि मैं इस देश का हूं
(इससे पहले सरकार के खिलाफ लिखने के लिए विदेशी पत्रकारों को देश निकाला दिया जा चुका है और भारतीय पत्रकार को परेशान किया जा चुका है। पाकिस्तान जाने के लिे तो कितनों को कहा जा चुका है। घुसपैठिये कहा जाता है और कई पीढ़ियों से भारत में रह रहे लोगों को पाकिस्तानी कहा जाता है।)
4. सरकार में आये तो मुफ्त राशन दूना कर देंगे – खरगे
5. मारे गये लोगों के रिश्तेदारों का दावा माओवादी नहीं थे।
6. अरुणाचल प्रदेश में बाल वेस्यावृत्ति में 21 गिरफ्तार, इनमें पुलिस वाले भी
7. जंगल की आग बुझाने का रवैया उदासीन, मुख्य सचिव हाजिर हों
8. बंगाल के राज्यपाल के खिलाफ यौन उत्पीड़न की एक और शिकायत
9. चार धाम यात्रा पर श्रद्धालुओं का सैलाब
10. भाजपा को गुजरात में असंतोष का झटका
11. अमित शाह ने ममता के बंगाल को मुल्ला, मदरसा, माफिया के रूप में पारिभाषित किया
इस बार के चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री की राजनीति कांग्रेस को हिन्दू विरोधी साबित करने की है। इतना ही होता तो गनीमत थी, वे कांग्रेस पर तुष्टिकरण का भी आरोप लगाते रहे हैं। अपने बारे में कहते हैं कि वे संतुष्टीकरण करते हैं। ऐसा वे प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद करते हैं और करते रहे हैं। ‘संकल्प’ को छोड़िये वे सार्वजनिक रूप से शपथ ले चुके हैं, “मैं भारत की प्रभुता और अखंडता अक्षुण्ण रखूँगा, मैं संघ के प्रधानमन्त्री के रूप में अपने कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से निर्वहन करूँगा तथा मैं भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना, सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि के अनुसार न्याय करूँगा।” इसमें हिन्दू मुसलमान करने की गुंजाइश ही नहीं है। और गुंजाइश तो अनुराग या द्वेष की भी नहीं है।
दूसरी ओर, विपक्षी दल ने ऐसी कोई शपथ नहीं ली है पर उनका प्रचार देखिये और ढूंढ़िये उसमें हिन्दू मुसलमान कहां है। इसके साथ चुनाव आयोग के नोटिस (और जवाब भी) देखिये। समझ में आयेगा कि कौन क्या कर रहा है। क्यों कर रहा है और इसीलिए कहा जाता है कि नरेन्द्र मोदी की सरकार ने सभी संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जा कर रखा है। और यह चुनाव आयुक्त जैसे लोगों के जरिये है जिनका चुनाव उन्होंने खुद किया है और अब सब सार्वजनिक है। अभी मेरा मुद्दा यह सब नहीं है। मेरा मुद्दा है कि अखबारों ने जब कल उनके ‘संकल्प’ को प्रमुखता से छापा था तो आज जब उनके हिन्दू मुसलमान करने की खबर छापी है तो यह क्यों नहीं कहा कि 24 घंटे भी नहीं लगे पलट गये।
द टेलीग्राफ

मुझे ऐसा कोई शीर्षक नहीं दिखा जबकि यह सामान्य और जरूरी है। मुझे लगता है कि मुख्यधारा की मीडिया के इसी समर्थन के कारण वे यह सब बोल और कर पाते हैं। जो लोग नहीं समझते हैं या इसके बावजूद समर्थन करते हैं उनकी बात अलग है। हालांकि उन्हें समझना चाहिये कि इसके लिए शिक्षा जरूरी है और नरेन्द्र मोदी को यह श्रेय है कि शिक्षा क्षेत्र में सबसे अच्छा काम करने वाला मंत्री (मनीष सिसोदिया) उनके प्रधानमंत्री रहते जेल में है और उन्होंने कुछ नहीं किया। भले ही वे भ्रष्टाचार दूर करने के नाम पर यह सब कर रहे हैं और उनके समर्थक मुसलमानों को कसने के लिए उन्हें पसंद करते हैं लेकिन नुकसान दिल्ली की जनता को हो रहा है। वैसे ही जैसे सभी धर्मों के तमाम लोग महामारी में मर गये किसी को कोई सहायता नहीं मिली। पीएम केयर्स में करोड़ों इकट्ठा किया गया। और जनधन खाता धारकों को मरने पर बीमा का लाभ मिला कि नहीं।
दूसरी ओर, नरेन्द्र मोदी की सरकार ने शिक्षा और शिक्षित करने के लिए क्या किया है यह बताने की जरूरत नहीं है जो किया है उससे साफ है कि वे चाहते ही नहीं हैं कि मतदाता शिक्षित और समझदार हों तथा जानकार निर्णय लें। मीडिया के सहयोग से उनकी ऐसी सरकार चल रही है। तो यह देश का नुकसान है लेकिन देश विरोध का मुकदमा एक ऐसे मीडिया संस्थान पर चल रहा है जो सरकार का विरोध करता है और करने की हिम्मत करता है। आज न्यूजक्लिक के संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ को रिहा करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश की खबर इंडियन एक्सप्रेस में लीड है। लेकिन हिन्दुस्तान टाइम्स ने सिंगल कॉलम में निपटा दिया है। उनपर यूएपीए का मामला बनाया गया है और संस्थान के स्वतंत्र काम को बाधित करने के लिए उन्हें गिरफ्तार कर जेल में रखा गया। यही नहीं, संस्थान के लिए काम करने वाले कई लोगों को परेशान करने की हिमाकत की गई।
कायदे से संस्थान के खिलाफ पुख्ता सबूत मिल जाते तभी देखा जाना चाहिये था कि संस्थान अपने लोगों से क्या काम करा रहा था और इसमें भी काम करने वालों के खिलाफ कार्रवाई तब होती जब यह साबित होने की स्थिति बनती कि काम करने वाले जानबूझकर देश विरोधी काम कर रहे थे। और अगर भारत विरोधी लेख लिखने के पैसे मिलें तो तथ्य लिखना भारत विरोध नहीं है। उसका मकसद हमेशा उन्हें ठीक कराना होगा जिनके लिए विरोध किया जा रहा है या किया जा सकता है। भले इससे भारत की बदनामी होती हो। लेकिन मकसद कुछ और था इसलिए डराया गया, परेशान किया गया, कंप्यूटर जब्त कर लिये गये आदि आदि। यह सब प्रेस की स्वतंत्रता का मामला है जिसका काम है कि प्रधानमंत्री हिन्दू मुसलमान करे तो उनकी खबर ले, जनता को बताये।
देश भक्त मीडिया नहीं बताता है कि प्रधानमंत्री चुनाव के दौरान आदर्श व्यवहार करता दिखने के लिए बयान देते हैं। मीडिया उसका प्रचार करता है और 24 घंटे के अंदर संकल्प तोड़ देते हैं तो चर्चा भी नहीं करता है, आलोचना तो दूर। आचार संहिता के उल्लंघन के लिए कार्रवाई होनी नहीं है, नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह यूएपीए के मामले की योग्यता पर गये बिना न्यूज क्लिक के संस्थापक को रिहा करने का आदेश दे रहा है। मुझे लगता है कि बहुत बड़ा मामला है। और इसी रूप में गंभीरता से व विस्तार से जनता को बताये जाने की जरूरत है। इसलिए भी कि सरकारी और पार्टी स्तर पर मीडिया को बदनाम करने का काम किया गया है पर मीडिया का ही एक भाग अमर उजाला का शीर्षक सरकार को बचाने वाला है। ठीक है कि यह जनता को उसके अधिकार के प्रति जागरूक करता है।
अमर उजाला में यह खबर है तो लीड लेकिन शीर्षक है, “अभियुक्त को गिरफ्तारी का आधार जानने का मौलिक व वैधानिक हक”। मुझे नहीं लगता कि यह कोई नई बात है या कोई इससे अनजान था। यहां यह भी दिलचस्प है कि निचली अदालत ने जमानत नहीं दी है और इन मामलों पर गौर नहीं किया। अमर उजाला ने खबर में लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी और रिमांड को अवैध बताया। यह एक मीडिया संस्थान के बुजुर्ग पत्रकार के मामले में हुआ। अगर रिमांड अवैध है तो रिमांड देने वाले ने गलती की। अपने यहां इस गलती पर किसी कार्रवाई का रिवाज अमूमन नहीं है। मैं इस गलती या कार्रवाई पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहा लेकिन मीडिया को कम से कम मीडिया के लिए तो यह मांग करनी चाहिये कि उसे ऐसी गलतियों से मुक्त रखा जाये। या बचाया जाये या किसी को गलती से पीड़ा हुई है तो उसे गंभीरता से लिया दिखाया जाये।
वैसे भी मीडिया सरकार के खिलाफ रहता है और सरकार मीडिया के खिलाफ ऐसी मनमानी कार्रवाई करे तो अदालत का काम है कि वह मीडिया को राहत दे। पर कम से कम इस मामले में ऐसा नहीं हुआ। स्थिति ऐसी हो गई है कि निचली अदालत के फैसले में राजनीति दिखती है और इस कारण न्याय मिलने में तो देरी हो ही रही है सुप्रीम कोर्ट पर अनावश्यक भार भी है। जो भी हो, अमर उजाला में उपशीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा, न्यूजक्लिक के संपादक पुरकायस्थ की गिरफ्तारी अवैध, शाम को जेल से रिहा हुए। यह मुख्य शीर्षक होना चाहिये था। कई अखबारों में है। मुद्दा यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार विरोधी संपादक की गिरफ्तारी को अवैध कहा है। यह मीडिया की आजादी और इतने दिनों तक जेल में रहने के कारणों पर भी टिप्पणी है। पर यह शीर्षक छोटे फौन्ट में है।
बेशक यह एक उदाहरण है और चूंकि मैं अमर उजाला पढ़ता (खरीदता) हूं इसलिए उसका जिक्र किया है। वरना नवोदय टाइम्स (इंटरनेट पर फ्री है) में सिंगल कॉलम की यह खबर ढूंढ़नी पड़ी। हिन्दी के अखबार पाठकों को सही जानकारी दे रहे होते तो कोई कारण नहीं है कि हिन्दी पट्टी में नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता होती। जहां तक मंदिर बनाने की बात है तो वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जनता के पैसे से बना है। सुप्रीम कोर्ट में फैसला आने से पहले जज पर आरोप और फिर फैसला तथा जज साहब को ईनाम मामले को संदिग्ध बनाता है और सुप्रीम कोर्ट के फैसले की निष्पक्षता पर बड़ा धब्बा है। यह पुरानी बाती है लेकिन सुप्रीम कोर्ट का सम्मान और उसकी साख का तो ख्याल रखा ही जाना चाहिये। आज के अखबारों में खबर है। अमर उजाला में भी है और फैसले पर केंद्रीय गृहमंत्री पूर्व तड़ी पार (इनके मामले में भी जज को ईनााम दिया गया था) अमित शाह ने जो कहा है वह शीर्षक है, “केजरीवाल की अंतरिम जमानत का फैसला सामान्य नहीं”।
मुझे लगता है कि गृहमंत्री को ऐसा नहीं कहना चाहिये खासकर तब जब वे खुद सुप्रीम कोर्ट के फैसले के लाभार्थी हैं और जज लोया की संदिग्ध मौत के मामले में भी शक की सुई उनकी तरफ है और इसकी जांच सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ही नहीं हुई है। जाहिर है, सप्रीम कोर्ट के विशेषाधिकार हैं और ये वैसे ही हैं जैसे सरकार के या गृहमंत्री के रूप में उनके हैं जिससे सीएए कानून बना है। उसकी भी खबर आज ही है उसपर आने से पहले बता दूं कि केजरीवाल के मामले में गृहमंत्री ने कहा है, कई लोग मानते हैं कि उन्हें विशेष तवज्जो मिली है। अगर केजरीवाल के मामले में ऐसा कहा जा सकता है, गृहमंत्री उसे प्रचारित कर रहे हैं तो मंदिर के मामले में फैसले पर ऐसा ही कहा जाये तो भगवान राम और सरकार की साख का क्या होगा। सुप्रीम कोर्ट का तो जो होना है कर दिया गया।
सीएए का मामला सबको पता है और ज्यादा बच्चा पैदा करने वाले तथा घुसपैठियों को भी लोग जानते हैं। सीएए भी धर्म के आधार पर ही है और आज ही छपा है। ऊपर मैं चर्चा कर चुका हूं कि प्रधानमंत्री के अनुसार कांग्रेस धर्म के आधार पर बजट चाहती है (और वे जानते हैं)। कैसे यह कोई पूछता नहीं है, वे बतायेंगे नहीं और शायद इसीलिए प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते हैं। जहां तक सीएए की खबर का मामला है, अमर उजाला में शीर्षक है – सीएए हकीकत … पहली बार 14 शरणार्थियों को नागरिकता, 31 हजार गैर मुस्लिम शरणार्थियों को मिलेगी राहत, चुनाव में है बड़ा मुद्दा। यह सुविधा मुसलमानों के लिए नहीं है, (शायद) वे घुसपैठिये हैं और प्रधानमंत्री का संकल्प है कि वे हिन्दू-मुसलमान नहीं करेंगे। नवोदय टाइम्स में इस खबर का शीर्षक है, सीएए के तहत पहली बार लोगों को नागरिकता। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर लीड है। शीर्षक है, 300 की पहली खेप को सीएए के तहत नागरिकता दी गई। कुछ आवेदकों को प्रमाणपत्र सौंपे गये।
इन सबसे अलग, द टेलीग्राफ ने प्रधानमंत्री के, जिस दिन मैं हिंदू-मुस्लिम करूंगा … वाले बयान का जिक्र किया है और खबर दी है कि उनके पसंदीदा नेता और नंबर टू या केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने ममता के बंगाल को मुल्ला, मदरसा, माफिया के रूप में पारिभाषित किया है। अखबार ने इसके साथ प्रधानमंत्री के हिन्दू मुसलमान करने वाले बयानों का एक संकलन तारीख और अन्य विवरणों के साथ पेश है। इसके साथ यह बताना जरूरी है कि यह भी कबीर पुरकायस्थ को सुप्रीम कोर्ट से रिहा किये जाने की खबर सिंगल कॉलम में है। उम्मीद है पाठक अंतर समझेंगे। यहां यह बताना जरूरी है कि अखबार के पहले पन्ने पर आा विज्ञापन है और इसके अलावा जो दूसरी खबर है उसका शीर्षक है, भाजपा को गुजरात में असंतोष का झटका। यह सहकारी समिति इफ्फको के चुनाव में अमित शाह के करीबी के हार जाने की खबर है। ऐसे में न्यूजक्लिक की खबर सिंगल कॉलम होना समझ में आता है। दूसरे अखबारों के साथ ऐसा नहीं है। द हिन्दू में भी यह खबर लीड है।



