लक्ष्मण सिंह बिष्ट बटरोही-
थानवी का अल्मोड़ा आना : अल्मोड़ा में ओम थानवी का आना और मीडिया के वर्तमान चरित्र पर करीब घंटे भर से अधिक समय तक गंभीर विचारशील विमर्श करना इस पहाड़ी इलाके के लिए पहली बड़ी घटना थी। अल्मोड़ा अपने जन्म से ही उत्तर भारत का एक बड़ा सांस्कृतिक केंद्र रहा है। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर का कोई व्यक्ति ऐसा नहीं होगा जो कभी-न-कभी पहाड़ों की यात्रा पर न निकला हो और अपनी यात्रा के दौरान अल्मोड़ा न आया हो। ऐसा हो नहीं सकता कि अल्मोड़ा आकर उसने यहाँ के सांस्कृतिक चरित्र के साथ संवाद करके शेष विश्व के मनीषियों के साथ उसे न जोड़ा हो। ऐसे लोगों की लंबी फेहरिस्त तो है ही, महान अन्वेषकों, सन्यासियों और घुमक्कड़ों की तो गिनती ही क्या?

पहाड़ की जिन स्थानीय प्रतिभाओं के साथ संवाद के बाद मुख्यधारा के साहित्य, पत्रकारिता और मीडिया में अपना दखल दर्ज किया, अनायास नहीं कि उनमें से सभी अल्मोड़ा से ही थे। हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता के तो सभी युग-प्रवर्तक चेहरे इसी कसबेनुमा छोटे-से शहर ने पैदा किए। यह कोई नोस्टालजिया या गर्वोक्ति नहीं, इतिहास का सच है।
थानवी ने अपने व्याख्यान की शुरूआत ‘उदंत मार्तंड’ और प्रेमचंद-गणेशशंकर विद्यार्थी की सोद्देश्य पत्रकारिता से की और सहज ढंग से उन सूत्रों की चर्चा की जिनके जरिए क्षेत्रीय जन और आकांक्षाओं के संदर्भ राष्ट्रीय चिंता का हिस्सा बनते चले गए। उन्होंने किसी स्थानीय पत्रकार या लेखक का नाम तो नहीं लिया, फिर भी उनके व्याख्यान के जरिए वे सारे स्थानीय दबाव सामने आते चले गए, जिन्होंने यहाँ की संस्कृति-चेतना को देश की मुख्यधारा का अनिवार्य हिस्सा बना डाला था।
थानवी के भाषण में इस बात का भी साफ संकेत था कि धीरे-धीरे पहाड़ी शहर अल्मोड़ा में जो नया सांस्कृतिक परिदृश्य उभरा उसमें अजीब अंतर्विरोध सामने आ गए। जहां एक ओर पुराने लोग अपने प्रवास की मजबूरियों का दुखड़ा रोते रहे, दूसरी ओर यहाँ के आमजन अपने बुजुर्गों के द्वारा अर्जित की गई राष्ट्रीय स्तर की उपलब्धियों को अपने लोगों की विजय मानते हुए उनका सनातन गुणगान करने लगे। मानो हिन्दी कविता, नाटक, पत्रकारिता, मनो-उपन्यास लोक-संगीत और दूसरी विधाओं के इस इलाके के सूत्रधार पितांबरदत्त बड़थ्वाल, इलाचन्द्र जोशी, सुमित्रानंदन पंत, गोविंदबल्लभ आदि हिन्दी के युगनिर्माता साहित्यकार नहीं, यहाँ के आम लोग थे। इसी ने अनपढ़ समाज के बीच यहाँ के स्थानीय आमजन के मन में बौद्धिक वर्ग के प्रति उपेक्षाभरी दूरी पैदा कर दी और अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को लेकर सवाल उठते चले गए। वास्तविकता के इस द्वैध ने खाई बढ़ा दी और धीरे-धीरे दो समानांतर धाराएं विकसित होने लगी।
आज जब कि उत्तराखंडी बुद्धिजीवियों की भारतीय समाज में एक खास और विशिष्ट छवि बन चुकी है, पीछे लौटकर उसका पुनर्मूल्यांकन करने की जिद करना मुश्किल है। जन-सामान्य के मानस में बैठ चुकी छवि को, जबकि सब कुछ खास लोगों के गिर्द सिमटा हुआ लोगों के दिमाग में दर्ज हो चुका हो, उसे नए सिरे से परिभाषित कर सकना मुश्किल ही नहीं, लगभग असंभव है। मसलन हिन्दी के आदि प्रकृति-चितेरे कवि सुमित्रानंदन पंत, जो मूलतः सामंती परिवार से थे, जिनके पिता गंगाधर कौसानी के चाय-बागानों के मैनेजर थे; बड़े बेटे देवीदत्त पंत आजाद भारत में उत्तराखंड से पहले लोकसभा सदस्य थे और सैकड़ों की संख्या में नौकर-चाकर उनके निर्देशन मे काम करते थे, एक पहाड़ी आदमी की भावनाओं का कैसे प्रतिनिधित्व कर सकते थे! छोटे बेटे गुसाईंदत्त, जो बाद में महाकवि सुमित्रानंदन के नाम से प्रसिद्ध हुए, उनके साम्राज्य में नियुक्त एक माली गुसाईं सिंह की ठाकुर माँ का दूध पीकर बड़े हुए थे। इस सबके बावजूद पंत का उल्लेख आज भी एक कुलीन ब्राह्मण के रूप में किया जाता है, हिन्दी बिरादरी में भी वह इसी रूप मे एक शास्त्रीय पुरोहित के रूप में विख्यात हैं जिन्होंने अमिताभ बच्चन का नामकरण अपने ज्योतिष ज्ञान के जरिए किया।
हिन्दी के पहले मनोवैज्ञानिक कथाकार इलाचंद्र जोशी और धर्मयुग के प्रथम संपादक जोशीबन्धु (हेमचन्द्र और इलाचन्द्र), जिन्होंने कलकत्ता से विशाल भारत का भी सम्पादन किया, आज तक हिन्दी पत्रकारिता में अपने कालजयी योगदान के लिए याद किए जाते हैं। हिन्दी के पहले बड़े अखबार ‘अल्मोड़ा अखबार’ में पत्रकार सदानंद सनवाल के योगदान से कौन अपरिचित है, खड़ी बोली, नेपाली और संस्कृत में एक साथ छंद लिखने वाले कवि गुमानी पंत का अलग से परिचय देने की जरूरत नहीं है। कौन नहीं जानता कि गोविंद बल्लभ पंत हिन्दी में थियेटर की अपेक्षाओं को लेकर सामने आए पहले एकांकीकार थे, उनका ज्यादातर लेखन उनके पड़ोसियों के साथ मिलकर लोक-शैली में निर्मित रचनाएं हैं। मगर उनके आम जनता से प्रेरणा लेकर लिखे गए साहित्य के बारे कौन जानता है?
इन अनेक बड़ी, युग-प्रवर्तक रचनाकारों के पक्ष के बारे में आज कोई बात नहीं करता, न वास्तविकता जानता। यह कम आश्चर्य की बात नहीं है कि इस बात को कभी याद नहीं किया जाता कि उनका संबंध उत्तराखंड की सांस्कृतिक चेतना को रेखांकित करने या उसे पहचान देने में कोई योगदान है, सिवा इसके कि इनका जन्म इसी धरती में हुआ था और वे हिन्दी के महान कालजयी लेखक थे। धरती के एक खास टुकड़े में जन्म लेना एक संयोग हो सकता है, जिस पर आदमी का कोई वश नहीं होता। अमूमन आदमी जिसे अपना कर्मक्षेत्र बनाता है, उसी के माध्यम से ही तो वह जाना जाता है। कालिदास के जन्मस्थान के बारे में तो आज तक पता नहीं की कि वह कहाँ के मूल निवासी थे, हालाँकि पहाड़ी परिवेश की गवाही के लिए हमारे पास उनके अलावा का कोई अन्य रचनाकार नहीं है।
अतीत की बातें छोड़कर अपने समकालीनों की बात करना ज्यादा उपयुक्त हैं क्योंकि उनके बारे में हम उनकी एक-एक बारीकी जानते हैं। पचास के दशक में पहाड़ी समाज की अपनी अलग पहचान लेकर सामने आए शैलेश मटियानी पहली बार यहाँ के सांस्कृतिक अंतर्विरोधों की पहचान को लेकर उभरते हैं। वो पहले लेखक थे जो वर्चस्ववादी कुलीन ब्राह्मणों की छवि को अपदस्त करके अपने बूते पर उभरे। मामूली थोकदार परिवार के ऐसे परिवार से उठे, जिसके चाचा मीट का व्यापार करते थे और पिता ईसाई बन गये थे। वर्चस्ववादियों को उन्हें अस्वीकार करना ही था। अद्भुत लेखकीय जिजीविषा के चलते उन्होंने अपने समाज से लगातार लोहा लिया, मगर अंततः हारकर उन्हें अपना शहर छोड़ना पड़ा। पग-पग पर किए गए अपमान को उन्होंने आखिरी दम तक झेला; जब बुरी तरह टूट गए तो विक्षिप्त हालत में अपने अंतिम दिन गुजारे। जीवन भर सर्वहारा समाज की पैरवी करने वाले इस लेखक को हिंदूवादी लेखक के रूप में पहचान मिली। कोई भी मूल कारणों को जानने की कोशिश नहीं करता, हमारे यहाँ जो लेबल एक बार चिपका दिया गया, बुद्धिजीवियों ने उसी के जरिए उनकी पहचान तय कर दी।
उनकी समकालीन पहली बड़ी स्त्री-कथाकार शिवानी छठे दशक में सामने आईं, जिन्होंने पहाड़ी स्त्रियों की विडंबना को पहली बार अपनी कहानियों में रेखांकित किया मगर ज़्यादातर चर्चाकारों ने उनका उल्लेख एक कुलीन पुरोहित-पुत्री गौर पंत के रूप में ही किया है। एक जुझारू युवती का बिम्ब, जिसने अपनी कहानियों में पहली बार खलनायक पिता का नया मिथक रचा, जातिवाद की बलि चढ़ गया। हिन्दी का कोई भी लेखक-आलोचक अपना अध्ययन करके लेखन का मूल्यांकन नहीं करता, शायद उसके लिए संबंधित रचनाकार के साहित्य के साथ ही उसके समाज को भी नए सिरे से पढ़ने की आवश्यकता होती है और मगर फतवे देने के अभ्यासी हिन्दी समाज को इतनी फुरसत होती ही कहाँ है कि वह अध्ययन के जरिए अपनी स्थापनाएं निर्धारित करे?
जरा गौर करें, जोशी-कथाकारों की तो पूरी पलटन हिन्दी में मौजूद है। शेखर, हिमांशु, मनोहरश्याम से लेकर दर्जनों नए लोगों तक। इनमें से सबके अलग रंग हैं, खासकर मनोहर श्याम तो हिन्दी का ऐसा निराला गद्यकार है जो खुद में एक अजूबा है, और जिसे नकल कर पाना असंभव है। हिन्दी में जिस तरह के भाषिक और शिल्पगत प्रयोग उन्होंने किए हैं, ज्ञान-विज्ञान की नई उपलब्धियों को पहली बार जिस तरह हिन्दी के कोटरबद्ध समाज के सामने प्रस्तुत किया है, वह हिन्दी साहित्य के लिए कभी न भूली जा सकने वाली घटना है। उनको भी हिन्दी अध्यापकों की परिभाषाप्रिय पंडिताऊ सनातनी परंपरा द्वारा पंडित बनाकर छोड़ दिया गया है। इसका ताज़ा उदाहरण है, ‘कसप’ बनाम ‘क्याप’ की चर्चा। कसप पण्डितवादी वर्णवाद की वकालत करता है जब कि क्याप वर्णवादी समाज की शब्दावली का पहली बार विखंडन करता है। वह पहली रचना है जो उत्तर-संरचनावादी विचारकों की तरह पहाड़ी समाज को डी-कंस्ट्रक्ट करती है। मजेदार बात यह है कि वर्णवादी उपन्यास ‘कसप’ की तो हिन्दी और पहाड़ी समाज में खूब चर्चा होती है, ‘क्याप’ की लोग चर्चा तक नहीं करते, न हिन्दी वाले और न स्थानीय लेखक।
कवियों का तो यह जमाना ही है। जिस तरह पंत में अपना परिवेश एक पर्यटक की निगाह से देखा गया पहाड़ चुना, चंदरकुंवर बर्तवाल को छोड़ दें तो बाकी सारे पहाड़ी कवियों-लेखकों में पहाड़ महज फूल, वनस्पतियों और रहस्यमय परिवेश का ग्लैमर-भर दिखाई देता है। हालाँकि इस क्षेत्र के पास एक ज्ञानपीठ और चार साहित्य अकादमी सम्मान प्राप्त कवि हैं, दर्जनों पद्मश्री और पद्मभूषण हैं और जमाने से मौजूद राष्ट्रीय मुख्यधारा के सांस्कृतिक सलाहकार हैं। साहित्य ही नहीं, राजनीति, सुरक्षा और अन्य क्षेत्रों में भी। मगर ये सब लोग अपनी जन्मभूमि में रहे ही कितने हैं? वे लोग यहाँ के लोगों की भावुकता के प्रतिनिधि-मात्र पहाड़ी थे, जिन्होंने सिर्फ यहाँ की प्रकृति का दोहन किया है, सिर्फ बाहर से अर्जित अनुभवों के आधार पर उसे तराशा है। इस बाहरी शब्दाडंबर से रचना की जमीन तो निर्मित नहीं हो सकती है! कला तो जन्म तो इससे नहीं ले सकता है।
विद्यासागर नौटियाल जैसा जनोन्मुख कथाकार हमारे पास मौजूद है, मोहन थपालियाल, पंकज बिष्ट और मृणाल पांडे जैसे अपने परिवेश की बारीकियों को रेखांकित करने वाले महीन शिल्पकार हैं, मगर वहाँ भी समग्र रूप में पहाड़ मौजूद कहाँ है! छिटपुट एकाध किताबों के जरिए लेखक और उसके परिवेश की संगति निर्मित नहीं होती, न हो सकती है। कुछ नए रचनाकारों में सामाजिक अंतर्विरोधों के स्वर उभरे हैं, मगर वे अभी छोटी-छोटी चिंगारियों के रूप में ही सामने आए हैं। कभी-कभी लगता है, वर्णवादी आग्रह आज भी मुख्यधारा की चर्चा में आ गया है। स्त्री और दलितवादी पक्ष भी बड़ी मात्रा में उभरे हैं हालाँकि वहाँ रचनाकार बेहद व्यक्तिनिष्ठ हो गया है, अपने तक ही सिमटा हुआ अपनी निजी व्यथा बयान करता नेरेटर। साहित्यकार से पक्षधरता के दुराग्रहों से मुक्त होने की तो अपेक्षा की ही जाती है, खासकर ऐसे समाज में जो अपने जन्म से ही जाति, वर्ण, लिंग और सामाजिक असंगतियों का बार-बार शिकार रहा हो। इस जनतान्त्रिक दौर में, जहाँ उत्तर-संरचनावाद और विखंडनवाद के जरिए एक आम आदमी के चेहरे पर असंख्य नई आँखें अंकुरित हो गई हों, सोचने-विचारने की नई दृष्टियाँ उभर आई हों, कुलीनता और छद्म दंभ की बदौलत समाज को देखना आमानवीय ही नहीं, अश्लील भी है। किसी एक पक्ष को अंतिम मान लेना आज के दौर में कामअक्ली ही कही जाएगी। जब भाषा, परंपरा और शब्द के दूसरे अछूते आयाम उजागर हो चुके हों, शोषण-अवगुंठन की दुहाई देकर एक कोने मे दुबककर अपनी खिचड़ी का स्वाद लेना जड़ता ही कही जाएगी।
जाहिर है, इस नए संसार में आपको सार्वजनिक होना ही पड़ेगा, और संवाद को सबकी शर्तों पर साझा करना भी करना ही पड़ेगा।
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