कृष्णन अय्यर –
आज सुबह सोशल मीडिया के एक दोस्त ने मुझे मेल भेजा कि 20 अक्टूबर 2022 को मैंने लिखा था कि मार्च 2024 तक डॉलर 90 रुपये का होगा। मैं दंग रह गया कि लोग कितना याद रखते हैं और ट्रैक करते हैं। उन्होंने कहा कि मैंने गलत लिखा था। मैंने जवाब दिया कि मैं खुद की गलती क़बूल करता हूं। मैंने गलती की कोई वजह नहीं बताई, बस गलती मानकर सॉरी बोला। मार्च 2024 में डॉलर लगभग 83.50 रुपये का था, मगर अब मेरी गलतियों की एनालिसिस कर कुछ हासिल नहीं होगा। डॉलर 90 रुपये के नीचे जा चुका है, यह सच्चाई है। वक्त गलत लिखा था मगर 90 सही निकला।

अब सवाल यह है कि रुपये को बचाया जा सकता था? और अगर बचाया जा सकता था, तो बचाया क्यों नहीं गया? रुपये को बचाने का सबसे अच्छा तरीका यह था कि सस्ते रूसी तेल का फायदा जनता को मिलता, RBI इंटरेस्ट रेट में कटौती नहीं करता, कैपिटल गेन टैक्स हटा लेना चाहिए था, MSME और किसानों का 50% कर्ज माफ कर, कांग्रेस के ऑयल बांड की तर्ज पर “कर्ज माफी बॉन्ड” जारी करना चाहिए था। यह आज भी किया जा सकता है। इससे “लो इन्फ्लेशन हाई इंटरेस्ट रेट” का माहौल बनता, अवाम के हाथों में कुछ पैसे आते और विदेशी निवेशक शायद कम पैसा निकालते।
लेकिन हुआ यह कि सस्ता रूसी तेल अंबानी जैसे उद्योगपतियों की जेब में चला गया। भारत की इकॉनमी “हाई इन्फ्लेशन और लो इंटरेस्ट” में फंस गई। भारत का पैसा लूट लिया गया। एक फैक्टर और भी है—केंद्र सरकार ने विपक्षी राज्यों का पैसा रोक दिया। यानी भारत की 60% आबादी की डिमांड खत्म कर दी। सवाल यह है कि 40% आबादी से 100% देश कैसे चलेगा? यह खुदकुशी है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों को पैसा देंगे मगर बंगाल, केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक का पैसा रोक देंगे। उत्तर प्रदेश और बिहार सरकार बना सकते हैं मगर अर्थव्यवस्था नहीं बना सकते। इकॉनमी चलाने के लिए बड़ा दिल और ऊंची सोच चाहिए। सारे प्रॉजेक्ट गुजरात, महाराष्ट्र और साउथ में गए और उत्तर भारत मस्जिदों के सामने नाचता रह गया।
अभी परसों ही भारत सरकार ने बताया है कि अक्टूबर 2025 में भारत में ग्रोथ और मैन्युफैक्चरिंग शून्य है। यानी गुजरात, महाराष्ट्र और साउथ की हालत भी खराब हो रही है। गुजरात में तो हालात दिखने भी लगे हैं। अक्टूबर तो त्योहारों का मौसम था। टीवी बता रहा था कि भारतीयों ने लाखों करोड़ की खरीददारी की है, तो फिर ग्रोथ शून्य क्यों? मैंने लिखा था कि त्योहारों में खरीददारी पिछले 30 साल के निम्नतम स्तर पर है, बाकी सब फर्जी प्रचार है। अब सरकार ने भी मेरी बात पर मोहर लगा दी।
भारत का विदेशी व्यापार लगभग कोलैप्स कर चुका है। सर्विसेज सेक्टर का कोलैप्स बहुत नज़दीक है। हाई वैल्यू एडिशन प्रोडक्ट और सर्विसेज 10% लेवल पर हैं, ट्रेडिशनल एक्सपोर्ट 50% के आसपास है। इनफॉर्मल सेक्टर को बुलडोज़र से रौंदकर वोट तो मिल सकता है, लेकिन इनफॉर्मल सेक्टर का खत्म होना सीधे-सीधे रुपये को कमजोर करता है। जितना बुलडोज़र चलेगा, रुपया उतना ही कमजोर होगा। बुलडोज़र चलाना भारतीय रुपये का कत्ल करने जैसा है।
इस वक्त भारतीय अर्थव्यवस्था एक ब्लैक होल है। ऐसा समझिए कि ब्रिटिशों ने भारत को 200 साल में जितना लूटा था, उसका पांच गुना लूटा जा चुका है। हम सब सम्मोहन में ज़िंदा हैं। अब सवाल है कि रुपये का क्या होगा? मान लीजिए 2029 तक डॉलर 100 रुपये के नीचे भी चला गया तो आप क्या कर लेंगे? जब आप को कुछ करना ही नहीं है, तो सोचकर क्या फायदा?


