Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सुख-दुख

पत्रकार सुरक्षा कानून, पत्रकार आयोग और फर्जी पत्रकारिता पर अब निर्णायक लड़ाई का समय

सुरेश गांधी-

लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि उस सच से चलता है जो जनता तक पहुंचता है, और उस सच को जनता तक पहुंचाने का काम पत्रकारिता करती है। यही कारण है कि मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। लेकिन आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र का यह चौथा स्तंभ स्वयं सुरक्षित है?

देश के विभिन्न हिस्सों से लगातार ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं, जहां पत्रकारों को धमकियां दी जा रही हैं, उन पर हमले हो रहे हैं, झूठे मुकदमों में फंसाया जा रहा है और आर्थिक-सामाजिक दबाव बनाकर उनकी आवाज दबाने की कोशिश की जा रही है। गांवों और कस्बों में काम करने वाले पत्रकारों की स्थिति और भी अधिक चिंताजनक है। वे सीमित संसाधनों, कानूनी संरक्षण के अभाव और संस्थागत सहयोग के बिना केवल अपने साहस और प्रतिबद्धता के बल पर जनहित की पत्रकारिता कर रहे हैं।

विडंबना यह है कि एक ओर वास्तविक पत्रकार असुरक्षा और उत्पीड़न झेल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर फर्जी पत्रकारिता का जाल तेजी से फैलता जा रहा है। सोशल मीडिया, यूट्यूब चैनलों और अपंजीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्मों की बाढ़ ने पत्रकारिता की साख और मर्यादा दोनों को चुनौती दी है। ऐसे में पत्रकारों की सुरक्षा, सम्मान और पत्रकारिता की विश्वसनीयता बचाने के लिए ठोस कानूनी एवं संस्थागत व्यवस्था की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है।

पत्रकार पर हमला, लोकतंत्र पर हमला

पत्रकार किसी व्यक्ति, संस्था या दल का प्रतिनिधि नहीं होता, बल्कि वह समाज और जनता की आवाज होता है। जब कोई पत्रकार भ्रष्टाचार, घोटाले, अवैध कारोबार या सत्ता के दुरुपयोग को उजागर करता है, तो वह केवल खबर नहीं लिखता, बल्कि लोकतंत्र को मजबूत करता है।

आज अनेक राज्यों में पत्रकारों पर हमले, उत्पीड़न और यहां तक कि हत्याओं की घटनाएं भी सामने आ चुकी हैं। ग्रामीण और छोटे शहरों में कार्यरत पत्रकार सबसे अधिक जोखिम में हैं। उनके पास न बड़े मीडिया संस्थानों का संरक्षण होता है और न ही लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने की क्षमता। इसलिए पत्रकार सुरक्षा कानून केवल पत्रकारों की मांग नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा का प्रश्न है।

जिस प्रकार डॉक्टरों या स्वास्थ्यकर्मियों पर हमला गंभीर अपराध माना जाता है, उसी प्रकार पत्रकारों पर हमले को भी विशेष श्रेणी का अपराध घोषित किया जाना चाहिए। क्योंकि पत्रकार पर हमला वास्तव में जनता के जानने के अधिकार पर हमला है।

हर जिले में बने पत्रकार सुरक्षा सेल

कानून तभी प्रभावी होता है जब उसका क्रियान्वयन मजबूत हो। इसलिए केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं होगा। प्रत्येक जिले में “पत्रकार सुरक्षा सेल” की स्थापना की जानी चाहिए, जिसमें पुलिस, प्रशासन और विधिक अधिकारियों का समन्वित तंत्र हो।

यदि किसी पत्रकार को धमकी मिले, हमला हो या उसे फर्जी मुकदमे में फंसाया जाए, तो उसकी शिकायत पर तत्काल कार्रवाई सुनिश्चित हो। प्रत्येक जिले में एक नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाए, जो पत्रकारों से जुड़े मामलों की निगरानी करे। साथ ही पत्रकारों के लिए हेल्प डेस्क की व्यवस्था हो, जहां उन्हें कानूनी सहायता, प्रशासनिक मार्गदर्शन और आपातकालीन सुरक्षा उपलब्ध कराई जा सके।

स्वतंत्र पत्रकार आयोग की जरूरत

देश में महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग, अनुसूचित जाति आयोग और अन्य कई वैधानिक आयोग कार्यरत हैं। ऐसे में पत्रकारों के लिए स्वतंत्र और प्रभावी पत्रकार आयोग की स्थापना भी समय की मांग है।

यह आयोग पत्रकारों के उत्पीड़न, फर्जी मुकदमों, प्रशासनिक दबाव और पेशेगत विवादों की जांच कर सकेगा। साथ ही पत्रकारिता के नैतिक मानकों और आचार संहिता को मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। स्वतंत्र पत्रकारिता जितनी आवश्यक है, उतनी ही जिम्मेदार पत्रकारिता भी जरूरी है।

फर्जी पत्रकारिता : बढ़ता हुआ खतरा

डिजिटल क्रांति ने सूचना के प्रसार को आसान बनाया है, लेकिन इसके साथ कई चुनौतियां भी पैदा हुई हैं। आज सोशल मीडिया पर कोई भी व्यक्ति कैमरा और माइक लेकर स्वयं को पत्रकार घोषित कर देता है। अनेक अपंजीकृत पोर्टल और चैनल पत्रकारिता की आड़ में ब्लैकमेलिंग, दबाव और निजी हितों का कारोबार चला रहे हैं।

इसका सबसे बड़ा नुकसान उन ईमानदार पत्रकारों को हो रहा है, जिन्होंने वर्षों की मेहनत और संघर्ष से अपनी विश्वसनीयता अर्जित की है। इसलिए डिजिटल मीडिया के लिए भी स्पष्ट पंजीकरण और जवाबदेही की व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। इससे फर्जी पत्रकारिता पर अंकुश लगेगा और मीडिया की साख मजबूत होगी।

पत्रकारिता के लिए प्रशिक्षण और पेशेवर मानक

पत्रकारिता केवल माइक पकड़ लेने या कैमरा चला लेने का नाम नहीं है। यह संविधान, कानून, समाज, राजनीति और नैतिक मूल्यों की गहरी समझ का पेशा है। इसलिए पत्रकारिता के क्षेत्र में न्यूनतम शैक्षिक योग्यता, प्रशिक्षण और पेशेवर दक्षता के मानक तय किए जाने चाहिए।

इससे पत्रकारिता की गुणवत्ता बढ़ेगी, जवाबदेही मजबूत होगी और समाज का मीडिया पर विश्वास भी बढ़ेगा।

एक देश, एक पत्रकार पहचान पत्र

आज विभिन्न संस्थानों, संगठनों और मंचों द्वारा अलग-अलग पहचान पत्र जारी किए जाते हैं, जिनका दुरुपयोग भी होता है। इस स्थिति को देखते हुए एक समान और प्रमाणित राष्ट्रीय पत्रकार पहचान पत्र की व्यवस्था पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

ऐसी व्यवस्था से वास्तविक पत्रकारों की पहचान सुनिश्चित होगी, सुरक्षा बेहतर होगी और फर्जी पत्रकारों पर प्रभावी नियंत्रण लगाया जा सकेगा।

अब निर्णय का समय

पत्रकारिता केवल एक पेशा नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है। यदि पत्रकार सुरक्षित नहीं होंगे, तो स्वतंत्र और निष्पक्ष सूचना का प्रवाह भी बाधित होगा। इसलिए पत्रकार सुरक्षा कानून, स्वतंत्र पत्रकार आयोग, डिजिटल मीडिया की जवाबदेही, पेशेवर प्रशिक्षण और एकीकृत पहचान व्यवस्था जैसे मुद्दों पर अब केवल चर्चा नहीं, बल्कि ठोस निर्णय लेने का समय आ गया है।

लोकतंत्र को मजबूत रखना है तो पत्रकारिता को सुरक्षित, स्वतंत्र और विश्वसनीय बनाए रखना होगा। यही समय की सबसे बड़ी मांग है।

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन