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सुख-दुख

दो पत्रकारों की गिरफ्तारी का प्रकरण : ये न्यू इंडिया का न्यू नॉर्मल है, शर्मनाक!

अनुराग द्वारी-

इस दौर में पत्रकार बने रहना ही सबसे मुश्किल काम है।
सच लिखना जोखिम है, सवाल पूछना अपराध।
आज सत्ता को “खबर” नहीं, “ख़ामोशी” चाहिए।
जब सच बोलना अपराध बन जाए और सवाल पूछना “ब्लैकमेलिंग” कहलाने लगे, तो समझ लीजिए लोकतंत्र सांस तो ले रहा है, पर आज़ाद नहीं है।

भोपाल के दो वरिष्ठ पत्रकार Anand Pandey sir और Harish Divekar भाई जिन्होंने कई संस्थानों में संपादक रहते हुए पत्रकारिता को नई दिशा दी, लेकिन जिनके डीएनए में अब भी एक सच्चे रिपोर्टर की बेचैनी है, उन्हें राजस्थान पुलिस ने जयपुर ले जाकर गिरफ्तार कर लिया।

ना कोई नोटिस ऑफ़ अपीयरेंस ऐसे में इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला मानने की सारी वजहें हैं … अगर वीडियो प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने वाला था तो साक्ष्यों के साथ टेकडाउन का नोटिस भेज सकते थे, अगर आरोप सही थे, तो पारदर्शिता क्यों नहीं?

आधा दर्जन धाराएं लगाईं बीएनएस 353(2), 356(2), 356(3), 308(6), 61(2), 66(D) लगाई गईं, लेकिन अगले ही दिन उन्हें सम्मानपूर्वक रिहा कर दिया गया।

अगर मामला इतना गंभीर था, तो यह जल्दबाज़ी क्यों?

अगर सवाल पूछने की कीमत गिरफ्तारी बन जाए,
तो संविधान सिर्फ़ किताबों में बचेगा, ज़मीन पर नहीं।
एक और सवाल — क्या सरकारों में इतना नैतिक साहस बचा है कि जिस नेता पर आरोप लगें, उसकी भी ईमानदारी से जांच हो जाए?

सवाल बस इतना है … क्या सत्ता को हर बार इतनी ही जल्दी “अपना सच” साबित करने की ज़रूरत पड़ती है?
क्या किसी सरकार में इतना आत्मविश्वास है कि पत्रकारों की बात भी सुनी जाए, न कि सिर्फ़ दबाई जाए?

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