राजकुमार सिंह-
दर्दनाक घटना. वैसे लखनऊ के हर मुहल्ले में कुछ कुत्ता स्वामी परेशानी का सबब हैं. ये कुत्ता स्वामी लोगों की सुरक्षा का ध्यान नहीं रखते. खुले में गंदगी फैलाते हैं. नियम नहीं मानते.
मैं कुत्तों का नहीं कुत्ता स्वामियों के ग़लत रवैए का विरोधी हूँ. अपने शौक़ के लिए दूसरों को परेशान करते हैं.

सुधीर मिश्रा-
पिटबुल डॉबरमैन जैसे कुत्ते पड़ोसियों को डराने और झूठी शान बघारने के लिए पाले जाते हैं,वरना रखवाली तो सड़क के उस कुत्ते से बेहतर कोई नहीं करता जो बासी रोटी खाकर घर के बाहर बैठकर चौकीदारी करता है। खौफ पैदा करने का धंधा आखिरकार खुद पर ही भारी पड़ता है।

निशिकांत मिश्रा-
कुत्ता एक वफादार जानवर होता है , इसका प्रमुख गुण मालिक के प्रति वफादारी है । पर यदि वफादार जानवर ही मालिक को मार डाले तो वफादारी पर से विश्वास उठना लाजमी है।
खबर है लखनऊ के कैसर बाग में एक पिट बुल डॉग ने अपनी मालकिन को नोच – नोच कर मार डाला।
पर इसमें जानवर की गलती नही है गलती आदमी की ही है । पिट बुल डॉग घर के लिए नही है , यह कुत्ता बड़े – बड़े फार्म की रखवाली के लिए है और बहुत ही एग्रेसिव होता है । दुनिया के बहुत से देशों में इसको रखने पर पाबंदी है।
रोज सड़क पर टहलते समय देखता हूँ लोग खतरनाक किस्म के कुत्ते जैसे पिट बुल , रॉट व्हीलर बड़ी शान से टहलाते हैं , ध्यान दें यह डॉग होमली डॉग की श्रेणी में नही आते , यह शिकारी कुत्ते हैं , इनके लिए बड़ी जगह चाहिए होती है।
कहीं दिखावे के चक्कर में कोई दुर्घटना न घट जाए , इसलिए हमेशा विशेषज्ञ से राय लेकर और अपने घर का क्षेत्रफल देख कर ही कुत्ता पालें।
नीरेंद्र नागर-
नवभारत टाइम्स में आज एक हत्यारे कुत्ते की खबर छपी है जिसने अपनी मालकिन की ही जान ले ली। वह कुत्ता पिट बुल नस्ल का था।
पूरी ख़बर में कुत्ते/कुत्तों की जगह डॉग/डॉग्स लिखा गया है। क्या हिन्दीभाषी अब कुत्ता शब्द का इस्तेमाल नहीं करते या ऊँची नस्ल का कुत्ता होने के कारण इसे सम्मान देते हुए डॉग लिखा गया है? क्या अमेरिकी नस्ल के इस पशु के लिए कुत्ता (जो कई बार गाली के रूप में इस्तेमाल किया जाता है) लिखने से पालकों की श्वानिक भावना के आहत होने का ख़तरा था?


पुतान सिंह-
यह खबर दिल दहला देने वाली है। लेकिन रिपोर्टिंग देखिये। एनबीटी लिख रहा कि घटना के वक्त बेटा जिम गया था, दैनिक जागरण ने गोलमोल कर दिया है। जागरण के मुताबिक बेटा घर पर ही अपने कमरे में था। एनबीटी की खबर में सत्यता नजर आ रही । जागरण की खबर लिखने वाले ने उल्टा पुल्टा कर दिया। दोनों अखबार पढ़ने वाले लोग भौचक हैं…

निशांत-
मेरे घर के पास कुछ कुत्ते टहलते हैं। देख कर पूंछ हिलाते हैं। कभी घर में कुछ उनके मतलब का बना तो दे देता हूं। बस, यूं ही अब जानवर प्रेम दिखा देता हूं।
बचपन में पोमेरेनियन और स्पिट्ज दो ही पालतू ब्रीड्स हुआ करती थीं। हर घर में उसी ब्रीड के कुत्ते होते थे। हमारे घर में भी। कहीं कहीं एलसेशियन और जर्मन शेफर्ड दिख जाते थे। सबसे खतरनाक के रूप में डॉबरमैन मशहूर था। लेकिन ज़्यादातर घरों में वही सफेद रूई के गोले जैसे पोमेरेनियन और स्पिट्ज मिलते थे। खिलौना होते थे वो प्यारे कुत्ते। जीवन सरल था।
मगर एसयूवी के दौर में जीवन की सरलता कहीं चली गई।
शिकारी नस्ल के खतरनाक हमलावर कुत्ते पाले जा रहे हैं। पशु प्रेम या वफादारी या खेलने के लिए नहीं। शो ऑफ की ब्रांडेड दुनिया में अब कुत्ता भी ऊंची नस्ल और शो ऑफ वाला पालना है सबको।
नतीजा सामने है।
सनद रहे कि जानवर अंततः जानवर ही रहेगा। कुत्ते में मानवीय प्रेम की झलक ज़रूर मिलती है, लेकिन उसकी शारीरिक बनावट और प्राकृतिक उद्देश्य हमारी सेवा और हमसे प्रेम करना नहीं है।



madan kumar tiwary
July 13, 2022 at 2:39 pm
इसमे कुत्ते की क्या गलती है ?गले मे चैन डालकर गुलाम बनाकर सिर्फ शान और ओहदा के लिये कुत्ते रखने वाले और इनकी ब्रीडिंग खरीद बिक्री करने वालों का मर जाना ही ठीक है, कभी मेरे बच्चों को देखिए आसपास लिपटे रहते हैं कोई चैन पट्टा नही, जर्मन शेफर्ड भी था वह भी आजीवन बिना पट्टा चैन के रहा,मरने पर उसकी समाधि घर के आगे बनाकर फूल का पौधा लगाया है जहां से फूल तोड़कर मन्दिर में चढाते हैं लोग
Dr Ashok Kumar Sharma
July 13, 2022 at 7:10 pm
पिटबुल ने अपनी मालकिन का पेट फाड़ दिया। इसे एक अप्रत्याशित घटना के तौर पर देखा जा रहा है, परंतु खतरनाक प्रजाति के कुत्ते ही ऐसा आचरण नहीं करते। खुद मेरे निजी जीवन में इस प्रकार की एक घटना हुई। जब पामेरियन हाइब्रिड कुत्ते ने हमारा जीना हराम कर डाला। कारण ना समझ में आने के कारण वजह से हमने उस कुत्ते को ही घर से हटा दिया था। यह बात और है कि दया के रूप में उस कुत्ते को हमने अंत तक जिंदा रखा। उसे दफ्तर में ले जाकर, पिछवाड़े में बाद कर, बढ़िया खाना खिलाते रहे।
जैकी, अल्सेशियन और पामेरियन हाइब्रिड कुत्ता था। बहुत सुंदर था। उसका पूरा शरीर सफेद था। केवल बायां कान और आंख तक का हिस्सा काला था। इसके अतिरिक्त उसके शरीर पर कोई भी ऐसा निशान नहीं था जिससे यह पता चलता कि वह एक हाइब्रिड कुत्ता था।
जैकी को हम दस दिन के पिल्ले से पाल रहे थे। उबले अंडे उसे भाते थे। पता नहीं क्या बात थी कि छह सात महीने का होने तक उसे गिलहरियों के शिकार का शौक हुआ। गिलहरी को मारने के बाद वह उसे सामने रख कर बैठा रहता। जब मरी गिलहरी हटाई जाती तो कूंकुंकूंकूंकुंकूं करके उसे ना हटाने की करुण मिन्नत करता।
उसमें दूसरा बदलाव दिखा, बंदरों के शिकार की कोशिश। वह किसी बंदर को वह कभी मार तो नहीं पाया लेकिन बंदरों ने अवश्य उसे पीटा और वह उसके बाद से झुलाने लगा बंदर देखकर इतना ऊंचा उछलता था कि हम लोग हैरत में रह जाते थे। बंदरों से हर बार पिट जाने के बाद चार छह बंदरों से एक साथ लड़ता और मार खाता। बंदर थक कर चले जाते तब वह बेहाल लेट जाता। खाना नहीं खाता।
साल भर का होने पर उसमें तीसरा परिवर्तन आया। वह मेरे अत्यंत वृद्ध, अस्सी वर्षीय पिता और माता पर गुर्राने लगा। एक बार जब उसने घर के आंगन में ढेर सा पखाना करन दिया। तो मेरे पिता ने उसे छोटी सी छतरी से मारने का अभिनय करते हुए धमकाया। इससे पहले कि मेरे पिता समझ पाते वह बिजली की गति से छपरा और उनकी कलाई को दांतो में भर लिया। पापा जैसे ही चिल्लाए पापा का उसने हाथ छोड़ दिया और एक तरफ सहमा हुआ जमीन पर मूर्ख कर केवल आंखों से ऐसे देखने लगा जैसे उसे बड़ा दुख हो रहा है हम सभी को दया आ गई और उस घटना को हम लोगों ने माफ कर दिया परंतु पापा को इंजेक्शन लगवाने पड़ गए।
हमने अपनी जान पहचान से उसे सैनिक पशु चिकित्सालय में दिखाने का प्रबंध कर लिया।
सैनिक पशु चिकित्सालय में सेना के एक विशेषज्ञ डॉक्टर निहाल सिंह ने जैकी की जांच करने के बाद कहा कि कुत्ते में इसकी पिछली पुश्तों से कुछ आक्रामक जींस आए हैं। जो एक प्राकृतिक पृथकीकरण फिनोमिना के कारण इस समय अपना वजूद दिखा रहे हैं। अब यह निरंतर शिकारी कुत्ते में तब्दील होता जाएगा। इसे पालना खतरनाक है अब यह किसी काम का नहीं है यदि आपकी अनुमति हो तो हमेशा इंजेक्शन लगा कर मौत की नींद सुला देते हैं। इस निर्णय को हमारे घर में से किसी ने स्वीकार नहीं किया और जैकी जिंदा बच गया।
कुछ समय बाद सूचना विभाग ने मुझे कुमायूं मंडल का भी प्रभार दे दिया जिस वजह से मुझे बरेली से अक्सर कुमायूं मंडल के दौरे पर जाना पड़ता था। लौटने में मुझे देर हो जाती थी और एक बार मैं रात के लगभग 10 बजे जब घर आया, तो जैकी बाथरुम के पास लेटा हुआ था। उसे बंधा देखकर जैसे ही मैंने उसे प्यार से पुकारा, वह चेन में बंधा हुआ ही, मुझ पर बिना कारण झपट पड़ा। गनीमत थी, उसकी चेन बहुत मोटी और मजबूत थी और फर्श के अंदर गहरे तक गाड़े गए, अलमुनियम के खूटें से इंटरलॉक्ड थी।
उस घटना में मैं बाल-बाल बचा मगर मेरी पैंट का जितना हिस्सा उसके दांतों में आया था वह घुटने के पास से हट कर उसके मुंह में पहुंच गया इसकी कल्पना की जा सकती है कि उसने मुंह को कितना कस कर बंद किया होगा।
इस प्रकार मेरा कुछ नुकसान नहीं हुआ परंतु अगले ही दिन मैने जैकी को घरवालों के रोने धोने के बावजूद, दफ्तर के पिछवाड़े चौकीदार के रिहायशी हिस्से में छोड़ दिया।
वहां उसने किसी पर हमला नहीं किया मगर, दफ्तर के पिछवाड़े पड़े तमाम कबाड़ फर्नीचर, पुरानी जंग लगी अलमारियों और कूलरो के ऊपर वह चढ़कर किसी राजा की तरह बैठा रहता था। अंत तक वह आती-जाती चिड़ियों पर झपटने का असफल और कभी-कभी सफल प्रयास भी करता।
हां, जैकी कभी कभार रातों में आसमान की ओर मुंह उठाकर रोया करता था। एक दिन वह उसी ढेर पर मरा पाया गया। चौकीदार का अनुमान था कि उसे किसी सांप ने काट लिया होगा।
चौकीदार सही था। कुछ दिन बाद मुझे दफ्तर के सूचना केंद्र वाले हिस्से में किताबों की अलमारी में शीशे के पीछे एक सांप दिखा दो पुस्तकों के पीछे छुप रहा था।
कलेक्ट्रेट के पीछे जिसे हिस्से में हमारा दफ्तर था, उस बिल्डिंग का पूरा पिछला हिस्सा बहुत कच्चा था। जिसमें अक्सर बरसात में पानी भर जाता था। संभव है वहीं से किसी बिल में पानी भर जाने के कारण सांप भीतर चले आए होंगे।
तत्काल सपेरों को बुलवा कर दो सांपों को पकड़वाया गया। उनके हवाले कर दिया दोनों ही सांप जहरीले थे। उनमें से एक की पूंछ पर घाव थे, जिस में लाल चींटियां भरीं थी।