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प्रधानमंत्री के भाषण का संदर्भ : अखबारों में दिख रहा है संपादकीय विवेक का उपयोग

प्रधानमंत्री का भाषण इंडियन एक्सप्रेस में लीड है और हिन्दुस्तान टाइम्स में सिंगल कॉलम। कुल मिलाकर, अब विपक्ष प्रधानमंत्री की बराबरी में आ गया लगता है और इसका कारण प्रधानमंत्री का घटिया भाषण हो सकता है। अखबारों की मजबूरी है कि जो प्रधानमंत्री ने कहा उसे क्यों नहीं छापें और छापें तो कैसे या किसलिये छापें। मेरा मानना है कि प्रधानमंत्री को शुरू में विशेष सुविधा नहीं मिली होती तो अभी यह हाल नहीं होता। पर यही तो मजा है।

संजय कुमार सिंह

कई लोगों ने कई बार कहा है कि इस बार नरेन्द्र मोदी जीत गये तो फिर चुनाव नहीं होंगे। यह ऐसे ही नहीं है और इस बार भाजपा हार सकती है इसके कई कारण और सबूत हैं। ज्यादातर भाजपा ने ही दिये हैं। पहले ही चरण के मतदान के बाद भाजपा के लिए यह स्थिति आ गई – इससे उसकी हताशा और मजबूरी का पता चलता है। दूसरी ओर सच्चाई यह भी है कि ऐसा भाषण अंतिम चरण से पहले भी दिया जाता तो भाजपा को फायदा होता। अभी ही ऐसा घटिया भाषण देने से शायद नुकसान हो। पर वह अलग मुद्दा है। मेरा मामला राजनीति नहीं, उसकी रिपोर्टिंग या प्रस्तुति है। उस लिहाज से मु्ददे को ठीक से समझने के लिए इंडियन एक्सप्रेस की प्रस्तुति का ही सहारा लेना पड़ेगा वरना संपादकीय विवेक ने प्रधानमंत्री की कही बात को शीर्षक से गोल भी कर दिया है।

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इंडियन एक्सप्रेस का फ्लैग शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने राजस्थान में कहा, जब सत्ता में थे तब उन्होंने कहा था, मुसलमानों का अधिकार पहला है। मुख्य शीर्षक है, प्रधानमंत्री मुसलमानों पर : कांग्रेस आपकी संपत्ति उन्हें देगी ‘जिनके ज्यादा बच्चे हैं’। इस मुख्य शीर्षक के तहत प्रधानमंत्री का भाषण और कांग्रेस अध्यक्ष का उसका जवाब अलग-अलग दो हिस्सों में है। प्रधानमंत्री ने जो कहा उसका एक अंश इंडियन एक्सप्रेस ने रोमन हिन्दी में छापा है। मुख्य शीर्षक एक सवाल है, “क्या आपकी मेहनत की कमाई घुसपैठियों को दी जानी चाहिये, क्या आप इससे सहमत हैं?” अखबार ने लिखा है, बांसवाड़ा में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, पहले जब उनकी सरकार थी, उन्होंने कहा था कि देश की संपत्ति पर पहला अधिकार मुसलमानों का है। इसका मतलब, ये संपत्ति इकट्ठी करके किसको बांटेंगे? जिनके ज्यादा बच्चे हैं, उनको बांटेंगे। क्या आपकी मेहनत की कमाई का पैसा घुसपैठियों को दिया जायेगा? आपको मंजूर है यह?” सोशल मीडिया पर घूम रहे वीडियो के अनुसार उन्होंने आगे कहा, …. ये कांग्रेस का मैनिफेस्टो कह रहा है।

यहां यह दिलचस्प है कि प्रधानमंत्री ने, जिनके ज्यादा बच्चे हैं’ मुसलमानों के लिए कहा है वरना वे खुद छह भाई हैं और इनमें तीसरे हैं। खबरों के अनुसार प्रधानमंत्री की एक बहन भी है वसंतीबेन। यानी उनके माता-पिता ने सात बच्चे पैदा किये थे। यह सार्वजनिक है, सर्वविदित है। यही नहीं, प्रधानमंत्री, नेहरू-गांधी परिवार पर वंशवाद का आरोप लगाते हैं लेकिन नेहरू की एक ही बेटी थीं, इंदिरा गांधी, उनके दो ही बेटे थे राजीव और संजय। राजीव के दो बच्चे हैं और संजय का एक बेटा है वरुण। इस लिहाज से नेहरू-गांधी परिवार का आधा वंश भाजपा में है फिर भी वे जब जैसी जरूरत हो आरोप लगाते रहते हैं और अब मुसलमानों के लिए जिनके ज्यादा बच्चे हैं कहा है लेकिन हिन्दुओं में कम लोग नहीं हैं जिनके बच्चे ज्यादा है और मुसलमानों में भी बहुत हैं जिनके बच्चे कम हैं। पर अभी यह मुद्दा नहीं है। अभी तो मुद्दा प्रधानमंत्री के आरोप और जवाब की प्रस्तुति है।

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इंडियन एक्सप्रेस की खबर का शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने जो कहा वह हेट स्पीच है (घृणा फैलाने वाला भाषण है) हमारा घोषणापत्र सबके लिए न्याय की बात करता है। उपशीर्षक है, तमिलनाडु के मंत्री ने कहा, भारत के चुनाव आयोग को सदगति मिले। प्रधानमंत्री के भाषण के वीडियो के अनुसार, “…. यह अर्बन नक्सल की सोच ….. मेरी माताओं और बहनों, ये आपका मंगल सूत्र भी बचने नहीं देंगे। यहां तक जायेंगे ….।” मुझे लगता है कि यह किसी पर (चुनाव के समय प्रतिद्वंद्वी दल पर तो अति है) आरोप लगाने की पराकष्ठा है उस व्यक्ति द्वारा जो प्रधानमंत्री बनकर भी अपनी मां को साथ नहीं रखता था और जब भी गया फोटोग्राफर लेकर। यह तो स्पष्ट हो गया है कि प्रधानमंत्री के भाषण का स्तर गिरने से विपक्षी नेताओं का भाषण प्रधानमंत्री के बराबर में छपने लगा है। आइये देखें कि ऐसे प्रधानमंत्री या प्रधान प्रचारक या प्रधान सेवक अथवा चौकीदार के भाषण को दूसरे अखबारों ने कैसे छापा है।

टाइम्स ऑफ इंडिया

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यह खबर लीड है। शीर्षक है, कांग्रेस की योजना ‘घुसपैठियों’ को संपत्ति का पुनर्वितरण करने की है। मुझे लगता है कि कांग्रेस की योजना कांग्रेस को ही बताना चाहिये। अगर घोषणा पत्र में कुछ गलत या अटपटा लगता है तो कांग्रेस से पूछा जाना चाहिये और तब उसका जवाब सार्वजनिक किया जा सकता है। इतनी नैतिकता किसी आम प्रचारक और अखबार में होनी चाहिये। प्रधानमंत्री में तो होनी ही चाहिये। चूंकि प्रधानमंत्री खुद प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते हैं, जवाब नहीं देते, सवाल पसंद नहीं है इसलिए बिना जवाब के एक तरफा आरोप लगा देते हैं। ऐसी हालत में अखबारों को स्वनियंत्रण रखना चाहिये और अगर बहुत महत्वपूर्ण लगे तो जिसके बारे में है उसका पक्ष भी साथ ही छापना चाहिये। यहां एक्स (ट्वीटर) पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का पक्ष दो लाइन के शीर्षक और आठ लाइन की खबर के रूप में छापा गया है। बाकी अंदर के पन्ने पर है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपनी इस खबर के साथ बताया है कि मोदी ने सोनिया गांधी की भी आलोचना की और कहा कि वे (रायबरेली से) भाग गईं, राज्यसभा का रास्ता अपनाया। भाजपा ने राज्यसभा के जरिये भाग कर आये कितने लोगों को मंत्री बनाया उसकी गिनती नहीं होगी और ज्योतिरादित्य सिंधिया इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। इससे भी दिलचस्प यह है कि सिंधिया को हराने वाले भाजपा नेता को आप शायद ही जानते हों। हालांकि यह उनका और उनकी पार्टी का सिरदर्द है।

हिन्दुस्तान टाइम्स

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यह खबर पहले तो दिखी ही नहीं। फिर ढूंढ़ने पर सिंगल कॉलम में मिली। यहां इसका शीर्षक है, कांग्रेस लोगों का सोना छीन लेगी, पुनर्वितरण करेगी। छपी हुई यह खबर हिन्दी में कुछ इस तरह होगी। निश्चित रूप से यह एक किस्म का संपादन है और संपादकीय विवेक का उपयोग किया गया है। जयपुर  डेटलाइन से खबर इस प्रकार है (अनुवाद मेरा) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को कहा कि कांग्रेस अर्बन नक्सल्स और वामपंथियों से प्रभावित है और वह लोगों का सोना तथा  संपत्ति छीनकर उनका पुनर्वितरण करेगी। बांसवाड़ा में एक चुनावी सभा में मोदी ने कहा, “तो वे यह संपत्ति किसे देंगे? जिनके अधिक बच्चे हैं…अवैध घुसपैठियों को … क्या आपकी मेहनत से कमाई गई संपत्ति घुसपैठियों को दी जा सकती है? क्या आप कांग्रेस के घोषणापत्र से सहमत हैं?” उन्होंने आगे कहा, “जिन लोगों ने कांग्रेस छोड़ी है वे कहते हैं कि पार्टी पर अर्बन नक्सलियों और वामपंथियों ने कब्जा कर लिया है। मैंने एक दोस्त से पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया तो उसने कहा कि कांग्रेस के घोषणापत्र को देखो… वे माओवादी विचारधारा को बढ़ावा दे रहे हैं।” मोदी की टिप्पणियों का सीधा संदर्भ दिए बिना, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि भाजपा नेता पहले चरण के मतदान के संकेतों के बाद घबरा गए हैं। “…नरेंद्र मोदी के झूठ का स्तर इतना गिर गया है कि वह अब डर के मारे जनता का ध्यान भटकाना चाहते हैं।”

द हिन्दू

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यहां यह खबर लीड नहीं है। लीड के बराबर में है और शीर्षक है, “कांग्रेस निजी संपत्ति मुसलमानों को सौंप देगी : प्रधानमंत्री”।

द टेलीग्राफ

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फ्लैग शीर्षक है, कांग्रेस के घोषणापत्र को मंगलसूत्र के लिए डराने का ट्विस्ट। मुख्य शीर्षक है, प्रधानमंत्री गीयर बदलकर बंटवारे के पिच पर पहुंचे। मोदी के इस भाषण पर कांग्रेस की प्रतिक्रिया को अखबार ने कांग्रेस ने तेजी से पलटवार किया। शीर्षक से छापा है। 

अमर उजाला

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अमर उजाला  में आज शायद पहली बार भाजपा और इंडिया गठबंधन की खबरों को एक साथ, लगभग बराबर में छापा है। सियासी वार के तहत फ्लैग शीर्षक है, राजस्थान में पीएम मोदी ने कांग्रेस को घेरा …. झारखंड में विपक्षी गठबंधन ने किया पलटवार। इस खबर के साथ एक खबर का शीर्षक है, जेल में मेरे पति को मारने की चल रही साजिश : सुनीला केजरीवाल।” मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री ने जिन बेटियों के लिए बेटी बचाओं, बेटी पढ़ाओ को नारा दिया था और फिर इस नारे का जो हुआ उसमें कांग्रेस मुक्त भारत की उनकी अपेक्षा में ऐसी महिलाओं का भाषण देना उन्हें हिला देता है और फिर वे जो कुछ बोलते करते हैं वह बिल्कुल नया या उनके हिसाब से नवोन्मेषी होता है। हालांकि अखबारों की मजबूरी है कि दोनों को समान महत्व देते हुए बराबर में छाप दें। आज के दो शीर्षक हैं, कांग्रेस घुसपैठियों में बांट देगी आपकी संपत्ति : मोदी। पीएम बोले – बहनों का मंगलसूत्र तक नहीं रहने देगी कांग्रेस। (दूसरी खबर का शीर्षक है) भाजपा ने डराना नहीं छोड़ा तो पराजय निश्चित : खरगे। कांग्रेस अध्यक्ष बोले – आदिवासियों को अछूत मानती है भाजपा।

नवोदय टाइम्स

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अखबार ने रांची में इंडिया गठबंधन की रैली और राजस्थान में प्रधानमंत्री की रैली को समान महत्व दिया है। इसमें प्रधानमंत्री की घटिया बातों को गोल कर दिया गया है और वह शीर्षक में नहीं है। लेकिन कितनी खबरें छोड़ी जायें? और इसी का नतीजा है कि मोदी बोले शीर्षक से दो घटिया खबरें छप ही गई हैं। एक शीर्षक है जो प्रधानमंत्री का स्तर बताता है। जो चुनाव नहीं जीत सकते वे राज्य सभा में आये। दूसरी खबर, भ्रष्टों को सजा की गारंटी घटिया नहीं है पर मोदी के मामले में ठीक नहीं है बशर्ते भाजपा में मंत्री बनकर रहना सजा न हो। पहली खबर सोनिया गांधी की है जो पार्टी का आंतरिक मामला है। भाजपा ने किसी लोकसभा से संसद में पहुंचाया और किसे राज्यसभा से इसकी चर्चा कांग्रेस ने शायद ही की हो। भाजपा ने तो रंजन गोगोई को भी राज्यसभा में भेज दिया है और यह बाबरी मामले में उनके फैसले के लिए नहीं है तो किसलिए है, कोई नहीं जानता। अभी उसे रहने देता हूं।

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