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सुख-दुख

फोन घनघनाता रहा नहीं पहुंची एंबुलेंस, वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद शर्मा ने दम तोड़ा

सरकार मंचों से स्वास्थ्य सेवाओं के दुरुस्त होने का दावा करती है, लेकिन हकीकत में आपात स्थिति में ज़िंदगी बचाने वाली 108 एंबुलेंस तक समय पर नहीं पहुंचती। वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद शर्मा (नवभारत) इसका ताज़ा उदाहरण बन गए।

शनिवार देर शाम उनकी तबीयत अचानक बिगड़ी तो परिजनों ने 108 नंबर पर एंबुलेंस बुलाई। कॉल दर्ज होने के बावजूद गाड़ी मौके पर नहीं पहुंची। मजबूरी में परिजनों ने निजी कार से उन्हें अस्पताल पहुंचाया, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया।

यह घटना न केवल एक संवेदनशील पत्रकार की असमय मृत्यु की कहानी है, बल्कि सिस्टम की नाकामी पर भी करारा तमाचा है। सवाल यह है कि जब सेकंड ही किसी की जान बचाने में निर्णायक होते हैं, तब सरकार की तमाम घोषणाओं और विज्ञापनों के बावजूद जमीनी हकीकत क्यों इतनी भयावह है?

प्रमोद शर्मा का निधन पत्रकारिता जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। उन्हें हमारी भावभीनी श्रद्धांजलि।

वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद शर्मा (नवभारत) का स्वास्थ्य खराब होने पर 108 में कॉल किया गया लेकिन गाड़ी नहीं पहुंची, उन्हें एक कार से हॉस्पिटल लाया गया, जहां उनका निधन हो गया…हम शर्मिंदा हैं।


सुनील प्रकाश-

वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद भैया के निधन की खबर सुनकर बहुत दुख हुआ। यह जानकर और भी तकलीफ हुई कि जब उनकी तबीयत खराब हुई तो 108 नंबर पर कॉल करने के बावजूद भी एंबुलेंस समय पर नहीं पहुंची।

यह घटना एक गंभीर सवाल खड़ी करती है कि क्या हमारी स्वास्थ्य व्यवस्थाएं वाकई आपातकालीन स्थितियों के लिए तैयार हैं? एक ऐसे समय में जब हर सेकंड कीमती होता है, एंबुलेंस का समय पर न पहुंचना, जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर बन जाता है।

यह सिर्फ एक व्यक्तिगत क्षति नहीं, बल्कि पूरे समाज और सिस्टम पर एक सवाल है।

प्रमोद भैया को हमारी भावभीनी श्रद्धांजलि। पत्रकारिता जगत में उनका योगदान हमेशा याद रहेगा।

पिछले तीन दिनों से छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर के सिम्स हॉस्पिटल के icu में पिताजी को भर्ती करवा कर इलाज करवा रहा हूं, इसलिए स्वास्थ्य व्यवस्था को बहुत करीब से देख भी रहा हूं.इसी बीच अभी कुछ देर पहले वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद शर्मा (नवभारत) को लेकर सिम्स पहुंचे…वे पहुंचे तो उनका निधन हो चुका था…

वरिष्ठ प्रेस फोटोग्राफर पवन सोनी जी ने बताया कि वे लगातार 108 पर कॉल करते रहे पर गाड़ी आई ही नहीं…हो सकता था कि 108 के पहुंचने पर उनकी जान बच जाती…भैया का जाना बहुत अखर गया और उस पर दुखद 108 का न आना…सवाल यह है कि 108 योजना का मकसद क्या है…क्या शर्म बिल्कुल समाप्त हो चुकी है या फिर यह सिस्टम पूरी तरह सड़ चुका है…108 के प्रति यह मेरा यह पहला अनुभव नहीं है…इससे बिलासपुर के पत्रकार साथी Vedula Venkat Ramana Kiran भैया के छोटे भाई के लिए गाड़ी 5 घंटे में आई थी…क्या स्वास्थ्य व्यवस्था इतनी खराब हो चुकी है?या फिर हम इतने असंवेदनशील हो चुके हैं?

क्या आम आदमी जिसमें पत्रकार भी शामिल हैं कि स्थिति कभी नहीं सुधरेगी. आखिर जिम्मेदार क्या चाहते हैं?

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