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प्रोफेसर हिमांशु पंड्या के साथ हुए दुर्व्यवहार पर एकजुट हुए ये संगठन

मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय उदयपुर में 8 जून को हिंदी के जाने-माने आलोचक प्रोफेसर हिमांशु पंड्या के साथ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े असामाजिक तत्वों ने घोर अपमानजनक व्यवहार किया। हम सभी शिक्षक, लेखक, कलाकार, कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी इस घटना की भर्त्सना करते हैं और विश्वविद्यालय प्रशासन से मांग करते हैं कि वह इस घटना के लिए ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ समुचित दंडात्मक कार्रवाई करे और आमंत्रित प्रोफेसर के सम्मान और सुरक्षा का ख़याल न रख पाने के कारण उनसे सार्वजनिक रूप से क्षमा याचना करें।

हिमांशु पंड्या वहां आमंत्रित प्रोफेसर के रूप में शोध-पद्धति विषयक एक विशेष कक्षा संचालित करने के लिए पहुंचे थे। कक्षा के दौरान अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े नौजवान बिना इजाज़त वहां पहुंचे। उन्होंने प्रोफेसर को क्लास छोड़ने पर मजबूर किया। उनके ख़िलाफ़ अपशब्द कहे। उन पर गालियों की बौछार की और अपमानजनक नारे लगाते हुए एक जुलूस की शक्ल में कैंपस के बाहर दूर तक उनका पीछा किया। उसके बाद वे लोग कोर्स कोआर्डिनेटर प्रो. सुधा चौधरी और संकाय अध्यक्ष प्रोफेसर हेमंत द्विवेदी के पास पहुंचे और वहां भी अपना तथाकथित प्रदर्शन जारी रखा।

असामाजिक तत्वों ने यह बताया कि वे प्रोफेसर हिमांशु की 6 महीने पुरानी एक फेसबुक पोस्ट से आहत हैं, जिसमें प्रोफ़ेसर हिमांशु ने बाबरी मस्जिद के विध्वंस की घटना से उपजी अपनी पीड़ा जाहिर की थी। ध्यान रहे कि अयोध्या से संबंधित अपने महत्वपूर्ण निर्णय में स्वयं माननीय सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद के विध्वंस को संविधान के विरुद्ध एक अक्षम्य अपराध माना है।

बाद में आरोपियों ने यूट्यूब और सोशल मीडिया पर इस घटना को एक अलग ही मोड़ देने की कोशिश की है। इन प्रस्तुतियों में प्रोफेसर हिमांशु को फिलिस्तीन समर्थक बताते हुए कहा गया है कि यही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के आक्रोश का मूल कारण था। इस संबंध में यह उल्लेखनीय है कि स्वयं भारत सरकार ने फिलिस्तीन के प्रति अपने निरंतर समर्थन को जारी रखने की बात बार-बार कही है।

एक लोकतंत्र में किसी भी विषय पर विरोध और समर्थन हो सकता है। महत्वपूर्ण यह है कि भारतीय संविधान किसी भी विषय के विरोधियों और समर्थकों के बीच खुले संवाद और बहस का पक्षधर है। इसी कारण अभिव्यक्ति की आजादी को मूल अधिकारों में शामिल किया गया है। चिंता की बात है कि दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी संगठनों ने अपने हिंसक व्यवहार से विश्वविद्यालय तक में संवाद और बहस की गुंजाइश समाप्त कर दी है। वे चाहते हैं कि कक्षा के भीतर भी शिक्षक और छात्र वही पढ़ें/पढ़ायें जो हिंदुत्ववादियों के पक्ष में हो। यह भारतीय संविधान के विरुद्ध है। हालांकि जिस कक्षा के दौरान उपरोक्त घटना हुई, उसका इन विषयों से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं था। ज़ाहिर है कि हमलावरों का उद्देश्य यही था कि विश्वविद्यालय परिसर में ऐसे किसी शिक्षक को प्रवेश ही न करने दिया जाए जो उनके सांप्रदायिक राष्ट्रवादी नज़रिए से सहमत न हो।

यह घटना हमें याद दिलाती है कि लोकसभा चुनावों में मतदाताओं द्वारा हिंदुत्ववादी राजनीति के व्यापक निषेध के बावजूद भारत में फासीवाद का दौर अभी ख़त्म नहीं हुआ, बल्कि वह एक नए चरण में प्रवेश कर गया है। इससे यह आशंका प्रबल होती है कि घायल हिंदुत्ववादी राजनीति आने वाले समय में और अधिक खूंखार और बर्बर रूप में सामने आएगी।

यही समय है जब लोकतंत्रप्रेमी व्यक्तियों को ऐसे प्रत्येक हमले के विरुद्ध एकजुट और मुखर होना चाहिए। यह भारत में लोकतंत्र की रक्षा के लिए चल रहे संघर्ष का ज़रूरी हिस्सा है और हम सब इस संघर्ष में शामिल थे और हमेशा रहेंगे।

ये संगठन एकजुट हुए
जन संस्कृति मंच (जसम), जनवादी लेखक संघ (जलेस), दलित लेखक संघ (दलेस), न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव (एनएसआइ), अखिल भारतीय दलित लेखिका मंच (अभादलम), प्रतिरोध का सिनेमा, प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस)

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