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सुख-दुख

वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने सार्वजनिक मंच से ‘मोदी-मार्ग’ की थीसिस देकर इंदिरा के चापलूस देवकांत बरुआ की यादें ताज़ा कर दी हैं!

राजेश जोशी-

सन १९७४ में काँग्रेस के अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने इंदिरा गाँधी को भारत का पर्याय बताया और ज़िंदगी भर के लिए अपने माथे पर ‘चापलूस’ का दाग़ लगवा लिया. उन्होंने कहा था – India is Indira, and Indira is India. (भारत ही इंदिरा है, और इंदिरा ही भारत है). हमारे अग्रज और सम्माननीय पत्रकार रामबहादुर राय इमरजेंसी के ख़िलाफ़ लड़े, जेल गए और सत्ताधीशों की चापलूसी के ख़िलाफ़ हमेशा खड़े रहे. पर उन्होंने सार्वजनिक मंच से ‘मोदी-मार्ग’ की थीसिस देकर देवकांत बरुआ की यादें ताज़ा कर दी हैं.

इस जुमले के कारण रामबहादुर राय की तीखी आलोचना हो रही है. मैं नहीं जानता कि सार्वजनिक मंच से मोदी की तारीफ़ करना उनकी मजबूरी थी या ‘मोदी-मार्ग’ पर वाक़ई उनका दृढ़ विश्वास है, पर अचानक याद आ गया कि राय साहब का गर्भनाल का संबंध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम के उस संगठन से है जो भगवा ध्वज को गुरू मानता है किसी व्यक्ति को नहीं. संघ के लोग बहुत गर्व से कहते हैं कि हमारा स्वयंसेवक ध्वज-प्रणाम करता है पद-प्रणाम नहीं.

अचानक ये भी याद आया कि अभी कुछ साल पहले राय साहब ने एक बार सार्वजनिक मंच से ही पत्रकारों को उनकी “औक़ात” याद दिलाई थी. मैं उस सभा में मौजूद था.

चूँकि मैंने जनसत्ता अख़बार में राय साहब के साथ काम किया है. उनसे काफ़ी कुछ सीखा. सहमति-असहमति रही. अब भी है. अस्तु, जब हमारे मित्र Hemant Sharma ने ‘अस्सी के राय साहब’ पुस्तक के लिए मुझसे भी लिखने को कहा तो मैंने लिखा. फ़ेसबुक पर उसे जारी करने का कोई औचित्य नहीं समझा इसलिए वो यहाँ नहीं आया. पर अब जब वो आलेख छप गया है और ‘मोदी-मार्ग’ और ‘गाँधी-मार्ग’ को सुविचारित ढंग से गड्ड-मड्ड करने के लिए रामबहादुर राय की फिर से परख की जा रही है तो मुझे लगा कि किताब में संकलित मेरा लेख कुछ और मित्रों तक पहुँचे. पत्रकारों को औक़ात याद दिलाने का प्रसंग उस लेख में है. अगर आपके पास वक़्त हो तो पढ़िए:

वही पुराने रामबहादुर राय चाहिए!

Portrait of an elderly man with a gray beard on a book cover, with bold Hindi title lettering beneath him.

रामबहादुर राय: मैं इस नाम के दो लोगों को जानता हूँ: एक हैं पत्रकार जिनके साथ मैंने जनसत्ता अख़बार में काम किया, और दूसरे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक रामबहादुर राय.

पत्रकार राम बहादुर राय संघ के सरसंघचालक कुप्प. सी. सुदर्शन से उग्र स्वर में सवाल पूछने का माद्दा रखते हैं – “आप लोग राम का नाम लेते हैं तो फिर राम के विपरीत काम कैसे कर सकते हैं?” वो रामबहादुर राय भारतीय राजनीति में भूचाल ला देने वाली जैन हवाला डायरी को उजागर करते हैं और लालकृष्ण आडवाणी का नाम आने के बावजूद ये ख़बर लिखते वक़्त उनकी विचारधारात्मक प्रतिबद्धताएँ आड़े नहीं आतीं. जनसत्ता में ख़बर छपने के बाद आडवाणी को घोषणा करनी पड़ती है कि वो लोकसभा से इस्तीफ़ा दे रहे हैं और तब तक दोबारा लोकसभा नहीं जाएँगे जब तक वो इस रिश्वत-कांड से पाक-साफ़ निकल नहीं आते.

मुझे याद नहीं पड़ता कि राय साहब ने कभी किसी ख़बर को लेकर किसी रिपोर्टर पर दबाव डाला हो या किसी ख़बर को प्रकाशित होने से रोका हो.

सिर्फ़ एक बार ऐसा हुआ. स्मृति के आधार पर लिख रहा हूँ कि राय साहब ने शायद 1993 में मुझे भारतीय नौसेना की पासिंग आउट परेड कवर करने के लिए जामनगर (गुजरात) भेजा. एडमिरल लक्ष्मीनारायणन रामदास तब नौसेना से रिटायर नहीं हुए थे. वो धर्मनिरपेक्षता और संविधान के प्रबल समर्थक थे और उन्होंने मरते दम तक सेना को ग़ैर-राजनीतिक बनाए रखने की हिमायत की.

उस दिन भी जामनगर में परेड के बाद कडेट्स को संबोधित करते हुए एडमिरल रामदास ने खुले शब्दों में धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में पुरज़ोर तरीक़े से कुछ बातें कहीं. ये वो दौर था जब उत्तर भारत की राजनीति रामजन्मभूमि आंदोलन के बवंडर में फँस चुकी थी. बाबरी मस्जिद को ध्वस्त किया जा चुका था. ऐसे में भारतीय नौसेना के पदासीन प्रमुख का ये बयान मेरे हिसाब से बड़ी ख़बर थी. मैंने इस ख़बर को अलग से एक बॉक्स आइटम के लिए लिखा. पर जनसत्ता में ये ख़बर नहीं छपी. मैंने राय साहब से दूसरे दिन ज़िक्र किया तो उन्होंने जवाब दिया – ‘नौसेना प्रमुख होने के नाते उन्हें ऐसा कहने का कोई अधिकार नहीं है.’ मैं असहमत था क्योंकि नौसेना प्रमुख को अधिकार हो या न हो, अगर उन्होंने एक ‘विवादास्पद’ बात कही है तो वो अख़बार में छपनी चाहिए थी.

लेकिन सिर्फ़ इसी एक दृष्टांत को राय साहब की पत्रकारिता पर उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता के असर का अकाट्य प्रमाण नहीं माना जा सकता. ऐसे बेशुमार मौक़े आए जब उन्होंने ख़ुद भी भारतीय जनता पार्टी और उसके नेताओं के ख़िलाफ़ कसकर क़लम चलाई. ख़ास तौर पर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान. उस समय आरएसएस और विश्व हिन्दू परिषद ने वाजपेयी के ख़िलाफ़ लगभग खुली जंग का ऐलान कर रखा था. संघ परिवार के अंदरूनी हिस्सों में कानाफूसी होने लगी थी कि मोरोपंत पिंगळे ने बीजेपी को तिलांजलि देकर नया संगठन शुरू करने तक की बात कह दी है. यही वो दौर था जब वाजपेयी ने ‘मुखौटा कांड’ के बाद के. एन. गोविन्दाचार्य को बाहर का रास्ता दिखा दिया था. एक ओर वाजपेयी सरकार संघ के तीरों से बिंधी जा रही थी तो दूसरी ओर तहलका पत्रिका ने ऑपरेशन वेस्ट-एंड करके सरकार में ऊपर से नीचे तक फैले भ्रष्टाचार को उजागर किया था. बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को वीडियो में लाख रुपए के नोटों की गड्डियाँ लेकर अपने ड्रॉअर में डालते हुए पूरे मुल्क ने देखा. रक्षामंत्री जॉर्ज फ़र्नांडिस की संगिनी जया जेतली को भी हथियारों के दलाल का भेस बनाकर गए पत्रकार के हाथों मोटी रक़म लेते हुए दिखाया गया था.

ऐसे में रामबहादुर राय की क़लम आग उगल रही थी.

ऑपरेशन वेस्ट एंड रिश्वत कांड का भंडाफोड़ होने पर राय साहब ने अटल बिहारी वाजपेयी सरकार पर प्रहार करने में कोताही नहीं की. उन्होंने लिखा – ‘अटल बिहारी वाजपेयी नैतिक ज़िम्मेदारी लें और इस्तीफ़ा दें’. इसी लेख में उन्होंने कहा, “वाजपेयी सरकार में पहली हत्या ईमानदारी की हुई है…. खोजी पत्रकारिता की जब संभावनाएँ सिकुड़ने लगे तो जासूसी से ही सत्यान्वेषण संभव है. वाजपेयी सरकार के किसी मंत्री को यह अधिकार नहीं है कि वह पत्रकारिता का पाठ पढ़ाए.”

इस अंतिम वाक्य को याद रखिएगा. इसी संदर्भ में आगे कुछ और बातें कही जाएँगी.

तीन सितंबर 2000 को छपे अपने एक कॉलम में राय साहब ने लिखा – “अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार इस नए व्याकरण के लिए इतिहास में नफ़रत से याद की जाएगी.” मार्च 2002 में वे लिख रहे थे – ‘राह से भटकी भाजपा के प्रतीक वाजपेयी-आडवाणी’. इस लेख की शुरुआती पंक्तियाँ ही पढ़ना काफ़ी है: “राह से भटकी भाजपा के ये (वाजपेयी-आडवाणी) प्रतीक हैं और ‘हम दो हमारे दो’ का संदेश दे रहे हैं. भाजपा सामूहिक नेतृत्व की पार्टी मानी जाती थी. उसने व्यक्ति केंद्रित राजनीति की राह पकड़ ली है.”

जून 2002 को उन्होंने लिखा – ‘जय-जयकार के जमावड़े से ‘निंदक’ को दूर रखो’. तब भी राय साहब के.एन. गोविन्दाचार्य को भारतीय जनता पार्टी से बाहर कर दिए जाने से आहत थे. उनका घाव भरा नहीं था. इस लेख में उन्होंने एक तरह से वाजपेयी-आडवाणी की भारतीय जनता पार्टी के अध:पतन का श्वेत-पत्र लिख दिया था. पर उतने बरस पहले पार्टी में फैली बीमारी के जिन शुरुआती लक्षणों के ख़िलाफ़ राय साहब की क़लम चलती थी, आज 2026 में नरेंद्र मोदी-अमित शाह की बीजेपी उसी बीमारी से पूरी तरह ग्रसित हो चुकी है. लेकिन शायद अब राय साहब को ये चीज़ें तकलीफ़ नहीं देतीं क्योंकि अब वो ख़ुद उस सत्ता-प्रतिष्ठान का हिस्सा हैं.

उन्होंने अपने एक लेख में बहुत बेबाकी से बीजेपी में फैली बीमारी की चीरफाड़ की थी. उन्होंने लिखा: “संगठन और विचार को जहाँ सबसे ऊपर माना जाता था वहाँ क्रम बदल जाने वाला है. व्यक्ति और सरकार सबसे ऊपर हो जाएँगे. जो नया संगठनशास्त्र रचने की जाने-अनजाने कोशिश है उसको फॉर्मूले में इस तरह रखा जा सकता है. फॉर्मूला नंबर एक – पार्टी में ऊपर से नीचे तक किसी नेता को अपनी रीढ़ यानी मेरुदंड को सीधा नहीं रखना है. फॉर्मूला नंबर दो – उसे अपनी सूझबूझ का उपयोग नहीं करना है. फॉर्मूला नंबर तीन – हम दो और हम ही दो के आदेश को पूरी तरह मानना है. फॉर्मूला नंबर चार – जब तक आदेश न हो, उसका इंतज़ार करो. अपनी पहल पर कोई काम मत करो. फॉर्मूला नंबर पाँच – राजनीति को देश, विचार और दुनिया के संदर्भ में देखने-समझने की गलती मत करो. फॉर्मूला नंबर छह – अपने राजनीतिक करियर का ख्याल कर चाटुकारिता के नए पाठ रोज़ अपने जीवन में उतारो. फॉर्मूला नंबर सात – मन से यह पुराना विचार हमेशा के लिए निकाल दो कि भाजपा सामूहिक नेतृत्व की विचार आधारित पार्टी है. इसका नया मंत्र है – राजग सरकार के हर ग़लत फ़ैसले का गुणगान करो.” लेख की अंतिम पंक्ति है – “वे (जना कृष्णामूर्ति) हटाए इसलिए जाएँगे क्योंकि निंदक नियरे राखिए का सिद्धांत वाजपेयी-आडवाणी को पसंद नहीं है.”

इस लेख को 2026 में पढ़ने से भ्रम होने लगता है कि कहीं रामबहादुर राय ये बात आज की मोदी-शाह वाली बीजेपी के लिए तो नहीं लिख रहे! लेकिन फिर समझ में आता है कि ये लेख पत्रकार रामबहादुर राय ने जून 2002 में लिखा था, मोदी-शाह के दौर में सत्ता-प्रतिष्ठान का हिस्सा बन चुके रामबहादुर राय ने नहीं.

ये सब पिछली सदी के आख़िरी दशक और मौजूदा सदी में नरेंद्र मोदी-अमित शाह युग के उदय से पहले की बातें हैं. इक्सीसवीं सदी के चौदह बरस बीतने पर रामबहादुर राय विचारधारा से प्रेरित स्वयंसेवक के अवतार में हमारे सामने हैं.

अब आते हैं सन 2015 में.

दिल्ली का कॉन्स्टीट्यूशनल क्लब. राजधानी में नरेंद्र मोदी की सरकार स्थापित हो चुकी है. डिप्टी स्पीकर हॉल (या शायद मावलंकर हॉल) में पत्रकारिता की दशा-दिशा विषय पर हो रही संगोष्ठी में रामबहादुर राय को मुख्य वक्ता के तौर पर आमंत्रित किया गया है. राय साहब की गरिमा, गंभीरता और उनकी पत्रकारिता का सम्मान करने वाले लोगों से हॉल खचाखच भरा है. मंचासीन लोगों में टीवी एंकर पुण्य प्रसून वाजपेयी भी मौजूद हैं. रामबहादुर राय अपने वक्तव्य में कुछ ऐसा कहते हैं पूरे हॉल में सन्नाटा छा जाता है. इमरजेंसी की सेंसरशिप का विरोध करते हुए जेल जाने वाले धुरंधर ने खुले मंच से पत्रकारों को चेतावनी के स्वर में समझाया और कहा: “पत्रकारों को अपनी औक़ात में रहना चाहिए. औक़ात में रहने का अर्थ ये है कि वो दायरे में रहें और नरेंद्र मोदी जो कर रहे हैं उन्हें करने दें.”

ये बात कहने वाले रामबहादुर राय मेरे लिए अजनबी थे. ये वो राय साहब नहीं थे जिन्होंने इमरजेंसी की सेंसरशिप और तानाशाही के ख़िलाफ़ लड़ते हुए 19 महीने इंदिरा गाँधी की जेल में काटे थे. ये वो रामबहादुर नहीं थे जिन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे कद्दावर नेताओं को भी अपनी क़लम की कसौटी पर कसने में गुरेज़ नहीं किया. महज़ ज़बानी जमाख़र्च से नहीं बल्कि असल में उन्होंने करके दिखाया कि ‘डेमॉक्रेटिक न्यूज़रूम’ वास्तव में कैसा होता है. ये वो रामबहादुर भी नहीं थे जो लिखते थे – “वाजपेयी सरकार के किसी मंत्री को अधिकार नहीं है कि वो पत्रकारिता का पाठ पढ़ाए.”

मैंने राय साहब के साथ जनसत्ता ब्यूरो में कई बरस तक साथ काम किया. उसके बाद आउटलुक और बीबीसी जैसे संस्थानों से भी जुड़ा, लेकिन अख़बार – ख़ास तौर पर हिंदी अख़बार – या मीडिया के दफ़्तर में जो खुला माहौल होना चाहिए वैसा जनसत्ता के बाद मुझे कहीं नहीं मिला. रामबहादुर राय की मित्रमंडली के एक छोर पर आरएसएस-विहिप-विद्यार्थी परिषद के लोग होते थे तो दूसरी ओर प्रतिबद्ध गाँधीवादी-सर्वोदयी कार्यकर्ता और बीच में हर रंग के समाजवादी और कुछ वामपंथी भी. शाम होते ही हम रिपोर्टर लोग अपनी-अपनी ख़बरें लिखने में जुट जाते थे और हमारे आसपास एक शाश्वत मेला सा लगना शुरू हो जाता. राय साहब का कमरा हमेशा खुला रहता था और वहाँ जुटते थे तमाम तरह के राजनीतिक कार्यकर्ता, टिकटार्थी, छोटे-बड़े ट्रेड यूनियन वाले, झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों की आवाज़ उठाने वाले, छात्र नेता, विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता, समाजवादी और सर्वोदयी नेता और कभी-कभी देबब्रत मजुमदार और लालमुनि चौबे जैसे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पुराने खग्गाड़!

आज क्या आप इस बात की कल्पना कर सकते हैं कि नक्सली पार्टी का एक कार्डहोल्डर नेता और भारतीय जनता पार्टी के सांसद एक ही घर में नीचे दरी बिछाकर बैठें और साथ भोजन करें?

ये बात शायद 1998 की है. मैं जनसत्ता छोड़कर आउटलुक जा चुका था, लेकिन जनसत्ता से गर्भनाल का संबंध बना हुआ था. एक दोपहर राय साहब ने फ़ोन करके कहा – ‘शाम को विश्वम्भरदास मार्ग वाले वीरेंद्र सिंह के मकान पर आ जाइए. वहीं मछली बनाकर खाई जाएगी. और मछली आपको बनानी है’. मैं पहुँचा तो घोषित नक्सलवादी चितरंजन सिंह, बीजेपी सांसद लालमुनि चौबे, वीरेंद्र सिंह और रामबहादुर राय पहले से ही बैठे थे. मैंने मछली बनाई और लालमुनि चौबे के गगनभेदी ठहाकों (और कदाचित् अ-प्रकाशनीय बनारसी बतरस) के बीच सबने एक साथ नीचे दरी पर बैठकर भोजन किया.

उस दौर में राजनीतिक विरोधियों को ‘अरबन नक्सल’ नहीं कहा जाता था. जनता के मुद्दों पर आंदोलन करने वाले लोगों को ‘आंदोलन जीवी’ कहकर अपमानित नहीं किया जाता था. उस दौर में पत्रकारों को पत्रकारिता करने के लिए जेल नहीं भेजा जाता था और खुले आम पुलिस अफ़सर को क़ानून अपने हाथ में लेने की धमकी देने और फिर दंगा फैलाने वालों को मंत्री नहीं बनाया जाता था. और उस दौर में पत्रकारों को उनकी औक़ात बताने वालों को भी अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता था.

तथ्यों की पड़ताल करते हुए ख़बर तह तक पहुँचना राय साहब का जुनून हुआ करता था. हमने दिल्ली आने से पहले इलाहाबाद और लखनऊ में उनकी पत्रकारिता और उनके आदर्शों के कई क़िस्से सुन रखे थे. ये कहा जाता था कि कई लोगों ने कोशिश की लेकिन नोटों के बंडलों के सहारे रामबहादुर को कोई नहीं ख़रीद पाया. हमें बताया गया था कि उन्होंने जनसत्ता के शुरुआती दिनों में डीडीए में हुए घोटाले पर एक ज़बरस्त खोजी रिपोर्ट की थी. जनसत्ता को तब प्रतिष्ठान विरोधी पत्रकारिता का प्रतीक माना जाता था. (हालाँकि बहुत बाद में हमारी आँखें खुलीं कि जिसे हम प्रतिष्ठान-विरोधी पत्रकारिता समझते थे दरअसल वो काँग्रेस-विरोधी पत्रकारिता था क्योंकि उस वक़्त काँग्रेस ही प्रतिष्ठान का पर्याय हुआ करती थी.)

शायद ये बात सितंबर 1993 की है. मैं तब जनसत्ता में ही था. एक दोपहर राय साहब बाहर से दफ़्तर आए और मेरी डेस्क पर एक मोटी फ़ाइल रखते हुए कहते हैं – ‘ये जैन डायरी है, इसे पढ़ लीजिए. इस पर एक ख़बर करनी है.’ विस्फोटक जैन डायरी की भनक मिलते ही रामबहादुर राय ने ख़ामोशी से पड़ताल शुरू कर दी थी और जब तक वो डायरी हासिल नहीं कर ली किसी को ख़बर नहीं होने दी. मेरी भूमिका वहाँ से शुरू हुई. मैंने सीबीआई के अपने सूत्रों की मदद से तथ्यों की ताईद की, सीबीआई के डाइरेक्टर से इंटरव्यू किया जिसमें उन्होंने पहली बार जैन डायरी के अस्तित्व को स्वीकार किया और ये भी बताया कि मामले की जाँच सीबीआई करने वाली है. ये बहुत बड़ी ख़बर थी.

जिन्हें जैन डायरी कांड की जानकारी नहीं है उनके लिए इस ख़बर की पृष्ठभूमि बताना ज़रूरी है. सन 1991 में एक कश्मीरी नौजवान की गिरफ़्तारी से ये बात सामने आई कि हवाला के जिस चैनल से कश्मीरी चरमपंथियों की फंडिंग हो रही थी उसी चैनल से लालकृष्ण आडवाणी, देवीलाल, बलराम जाखड़, विद्याचरण शुक्ल, मदनलाल खुराना और शरद यादव आदि जैसे देश के नामी-गिरामी नेताओं को भी कथित तौर पर पैसा दिया जा रहा था. (बाद में सुप्रीम कोर्ट ने जाँच की और सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया गया.)

जनसत्ता में पहले इस बात को लेकर थोड़ी असमंजस थी कि डायरी के आधार पर नेताओं का नाम छापा जाए या नहीं. जब राय साहब ने मुझसे कहा कि नेताओं का नाम नहीं छापा जा रहा है, तो मैंने कहा कि फिर इस ख़बर का कुछ अर्थ नहीं रह जाएगा. ख़बर इसलिए महत्वपूर्ण है कि देश के बड़े-बड़े नेताओं का नाम इस डायरी में है. अगर नाम ही नहीं छापे जाएंगे तो ख़बर निरर्थक हो जाएगी.

दो मिनट सोचकर राय साहब ने तत्काल वहीं निर्णय किया कि डायरी में दर्ज सभी नाम अख़बार में छापे जाएँगे. दूसरे दिन ख़बर छपने पर तहलका मच गया. मामला सुप्रीम कोर्ट में गया और बाक़ायदा एक विशेष जाँच टीम का गठन किया गया. मगर आख़िरकार, जैन डायरी कांड हो या तहलका का ऑपरेशन वेस्ट-एंड – सत्ता-प्रतिष्ठान दोनों को अच्छी तरह से ज़मींदोज़ करने में सफल रहा.

मैं राम बहादुर राय को हिंदी पत्रकारिता की उस निडर परम्परा का वाहक मानता रहा हूँ जिसने सत्ता से सवाल पूछे हैं और उन अँधेरे कोनों में रोशनी डाली है जहाँ ताक़वर लोग अपने कुकर्मों का ब्यौरा छिपाकर रखते हैं. इसीलिए पिछले बरस जब मुझे आउटलुक पत्रिका से फ़ोन आया कि 1997 में छपी मेरी एक रिपोर्ट पर पत्रिका का मौजूदा मैनेजमेंट उत्तर प्रदेश के एक दबंग नेता से माफ़ी माँगने को तैयार है, तो मैंने सीधे रामबहादुर राय से संपर्क किया. मैं पहले ही तय कर चुका था कि मैं किसी माफ़ीनामे पर दस्तख़त नहीं करूँगा. लेकिन मामला क़ानूनी था तो मैंने राय साहब से सलाह लेना उचित समझा. तब मुझे एक बार फिर उन्हीं रामबहादुर राय की झलक मिली जिनसे हमने सीखा था कि ताक़तवर लोगों के दबाव की परवाह किए बिना पत्रकारिता कैसे की जाती है. उन्होंने पूरा मामला समझा और एक संक्षिप्त वाक्य में अपनी राय दी: “आपको किसी माफ़ीनामे पर दस्तख़त करने की ज़रूरत नहीं है. आउटलुक जो चाहे करे!”

हम चाहते हैं कि सत्ताधीश हमें हमारे वही पुराने रामबहादुर लौटा दें.

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