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आयोजन

राम बहादुर राय को लेकर न पहले भ्रम था न अब, गांधी मार्ग के बरक्स मोदी मार्ग की बात करना कितना अश्लील है‌!

Panel of men seated on a stage during a book launch, with large posters of the author behind them.

यशवंत सिंह-

मोदी मार्ग! आज “अस्सी के राय साहब” वाले राम बहादुर राय ने ‘मोदी मार्ग’ का दर्शन सामने रखा। गांधी मार्ग के समानांतर ‘मोदी मार्ग’ को आज लॉन्च कर दिया गया। ग़ज़ब है कि वे गांधी मार्ग के कई गुण गिना गए लेकिन मोदी मार्ग की कोई व्याख्या नहीं किए। मुझे तो लगता है गांधी मार्ग को लिंच करने वाले मोदी मार्ग दर्शन को लांच करने के लिए आज का दिन इतिहास में राम बहादुर राय जी को याद रखेगा।

राय साहब हमारे ग़ाज़ीपुर के हैं। बहुत सहज हैं। वैचारिक असहमतियों को स्पेस देने वाले व्यक्ति हैं। इसलिए मुझे उनसे प्रेम है। वे मोदी जी के सत्ता में आने के बाद से क्रांति मोड से अपग्रेड होकर शांति मोड में आ गए हैं। ढेर सारे सरकारी संस्थाओं के हेड हैं। उनका गांधी मार्ग और मोदी मार्ग के दो खाँचे में सौ साल के भारत को बाँटना अचंभित कर गया।

राय साहब ने ‘मोदी मार्ग’ की जो बैटिंग की, उसको सुन कर लग गया, बहुत बड़ा तेलू आदमी है! राम बहादुर राय ने जो कहा, उसे शब्दशः पढ़िये-

“मैं अपनी बात समाप्त करने से पहले यह कहना चाहता हूँ कि आज भारत मोदी-मार्ग पर है। गांधी-मार्ग से स्वाधीन संग्राम की यात्रा प्रारम्भ हुई थी। मोदी-मार्ग और गांधी-मार्ग जहाँ मिलते हैं और जो मिलाता है उनका 110वाँ जन्मदिवस, पंडित दीनदयाल उपाध्याय का, आज है।”

गांधी मार्ग क्या है, इसके बारे में तो पूरी दुनिया जानती है। ये मोदी मार्ग क्या है, इसके बारे में विस्तार से राय साहब को बताना चाहिए। कल से दिमाग़ दौड़ा रहा हूँ, मोदी मार्ग में क्या होगा क्या हो सकता है, समझ नहीं पा रहा। इस नाम से एक किताब लिखना चाहिए राय साहब को। ताकि मोदी मार्ग के बारे में दुनिया भर के लोग जान पायें।

अगर मोदी मार्ग को कोई अंधभक्त अच्छे से समझता हो तो वही मुझे समझा दे। गांधी मार्ग में ग्राम स्वराज की बात थी। इसी तरह मोदी मार्ग को एक लाइन में कैसे समझा जाये?


सुदीप ठाकुर-

राम बहादुर राय को लेकर न पहले भ्रम था न अब। गांधी मार्ग के बरक्स मोदी मार्ग की बात करना कितना अश्लील है‌। जनसत्ता के नाम पर पुराने जनसत्ताई इनको पत्रकारिता का शिखर पुरुष साबित करने में जुट गए हैं। बीते दस बारह सालों में लिंचिंग, दलित उत्पीड़न, लोकतांत्रिक संस्थाओं की तबाही, मणिपुर की बदतर हालत, अडानी की लूट जैसे मामलों में इनकी एक टिप्पणी देखने नहीं मिली। मोदी की चापलूसी करते राय साहब बहुत दयनीय लग रहे हैं


शम्भू दयाल वाजपेयी-

आपको पता नहीं है किशोर अवस्था से संघ- संस्कारित हैं, गणवेश वाले स्वयं सेवक। नौकरी के शुरुआती दिनों में, 35- 36 साल पहले मैं एक साल गुवाहाटी था, पूर्वांचल प्रहरी और उत्तर काल में। उत्तर काल का मालिक मारवाड़ी सेठ संघ से जुडे था ,वह राय साहब का चेला था। पूर्वोत्तर की विशेष स्टोरी करने को राय साहब जनसत्ता से उड़ कर गुवाहाटी जाते और उसी सेठ के घर एकाध हफ्ते को डेरा डालते । उत्तर काल के आफिस या उससे जुड़े सेठ के आफिस में बैठे रहते। सारे लोकल अखबारों की फाइलों से संबंधित खबरों की कटिंग निकलवाते। दो- चार दिन में जोड़- गांठ कर भेज देते, अक्सर पेज 1 बाटम छपते। लिखते अच्छा थे ,छोटे- छोटे वाक्यों में ।


अस्सी की उम्र में अडानी के पव्वे को ऐसा गाढ़ा तेल लगा रहा है यह आदमी, और पढ़े-लिखे लोग इसे हिंदी पत्रकारिता का संत-महात्मा बता रहे हैं! क्या होना है हिंदी का और क्या पत्रकारिता का? -चंद्र भूषण


मुझे भी हैरानी हुई: गांधी मार्ग के बरक्स मोदी मार्ग! किसी अर्थ में (शायद दोनों मार्ग उनके हिसाब से जहाँ मिलते हैं) तीसरा नाम दीनदयाल उपाध्याय का लिया, जिनका कल जन्मदिन पड़ता था। -ओम थानवी


ओम थानवी-

जब मैं जनसत्ता का संपादन करने को चंडीगढ़ से दिल्ली आया, रामबहादुर राय जनसत्ता की समाचार सेवा के संपादक थे। उनकी विचारधारा अलग थी। पर वह उनके काम या व्यवहार पर हावी नहीं थी। वे जनसत्ता सहकारी आवास समिति के अध्यक्ष थे। देर के बावजूद मुझे उसका सदस्य बना दिया। जीवन में पहली बार कोई घर अपना हो गया।

कल शाम उनके 80 वर्ष पूरे होने पर आम्बेडकर भवन सभागार में भव्य आयोजन था। मैं भी हो कर आया। कई पत्रकार मित्रों से बरसों बाद मिलना हुआ। Hemant Sharma ने सुंदर किताब संपादित की है — अस्सी के राय साहब (प्रभात प्रकाशन) — जिसका लोकार्पण रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने किया। पर्यावरण मंत्री भूपेन्द्र यादव विशेष अतिथि थे और जनसत्ता के स्थानीय संपादक रहे बनवारीजी ने अध्यक्षता की।

रक्षा मंत्री की लिखी हुई तक़रीर अच्छी थी। उन्होंने पत्रकारिता की साख बिगड़ने की बात की। लेकिन ऐसा क्यों हुआ, इस पर नहीं बोले।

राय साहब ने अपने भाषण में बहुत चौंकाने वाली स्थापना की। गांधी, मोदी और दीनदयाल। वह समीकरण मुझे क्या, मौजूद अनेक लोगों को नहीं जँचा होगा। हालाँकि तालियाँ भी बहुत बजीं।

उन्होंने कहा — “मैं अपनी बात समाप्त करने से पहले यह कहना चाहता हूँ कि आज भारत मोदी-मार्ग पर है। गांधी-मार्ग से स्वाधीन संग्राम की यात्रा प्रारम्भ हुई थी। मोदी-मार्ग और गांधी-मार्ग जहाँ मिलते हैं और जो मिलाता है उनका 110वाँ जन्मदिवस, पंडित दीनदयाल उपाध्याय का, आज है।” (देखें वक्तव्य का वीडियो)

अस्सी के राय साहब का संदेश किसे है और वह क्या संदेश है?


मोदी मार्ग तो २००२ में ही दिख गया था, गुजरात दंगों के दौरान। राम बहादुर राय उसी मार्ग पर चलने वाले सिपाही हैं। पत्रकारिता तो एक मुखौटा था, है। -मुकेश कुमार


एक संपादक की तरह खुलकर आप नहीं बोल (लिख) रहे। गनीमत है, उन्होंने या उन जैसों ने गोडसे मार्ग का उल्लेख नहीं किया। आप अनुभवी पत्रकार हैं। गांधी और मोदी की तुलना हो सकती है क्या, सिवाय इसके कि दोनों ने गुजरात में जन्म लिया। -श्याम किशोर चौबे


शम्भूनाथ शुक्ला-

किसी पुस्तक के विमोचन में पूरा हाल खचाखच भर जाए और हज़ार के ऊपर लोग आ जाएँ, यह बड़ी उपलब्धि है। पद्म भूषण श्री राम बहादुर राय के 80 वर्ष पूरे होने पर एक पुस्तक ‘अस्सी के राय साहब’ का विमोचन अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर, जनपथ पर संपन्न हुआ। यह Hemant Sharma का ही दम था कि राय साहब को, बनवारी जी को और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और भूपेंद्र सिंह को मंच पर लाये। प्रोग्राम में मैं भी यह सोच कर गया, सभी पुराने जनसत्ताई मिलेंगे। और ऐसा हुआ भी।

Group of four men posing for a selfie in an auditorium, smiling at the camera; one wears a yellow scarf, another a green checkered shirt, and another a maroon shirt with a pocket notebook visible.",

मन प्रसन्न हो गया जब ऋषि रूप में ब्रजेन्द्र पांडेय को देखा और सर्वदा ऋषि राजेश जोशी को भी। हरिद्वार से सुनील पांडेय आए, वसुंधरा एनक्लेव से नीलम गुप्ता, मनोज चतुर्वेदी, आर्येन्द्र उपाध्याय, प्रदीप श्रीवास्तव, कुमार संजॉय सिंह भी। साथ ही अनंत मित्तल, मनोज मिश्र, संदीप जोशी, ओम प्रकाश सिंह से मिलना सुखद रहा। अनेक साथी मिले, फ़ोटो खिंची और चाय पान हुआ। आज की यह भी एक बड़ी उपलब्धि है।

पुनश्च- एक ख़ास बात यह रही कि इस समारोह फेसबुक से जुड़े सैकड़ों मित्र मिले। वे मुझसे कभी मिले नहीं पर यह कहते हुए वे उत्साहित हो जाते कि हम रोज़ फेसबुक पर मिलते हैं। कई ने बताया कि वे लाइक भी करते हैं और कॉमेंट भी।


यहां ‘मोदी मार्ग’ के लिए क्या बात हुई, यह नहीं मालूम। इसलिए आज के प्रसंग से सिर्फ इस शब्द को ले रहा हूँ। मुझे लगता है कि ‘गोडसे मार्ग’ ही ‘मोदी मार्ग’ है। गांधी की दुनिया भर में इतनी ख्याति न होती, तो यह लोग ‘गोडसे मार्ग’ को ही आधिकारिक घोषित कर चुके होते। उसमें दिक्कत है। इसलिए गांधी मार्ग के समानांतर मोदी मार्ग की बात आसान होगी। -विष्णु राजगढ़िया

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