
गणेश पांडेय-
साहित्य आजतक ने गौहर रजा को भी बुलाया, नरेश सक्सेना से लेकर बोधिसत्व तक को बुलाया। मुझे भी बुलाया। साहित्य आजतक की टीम ने मुझे क्यों बुलाया, बेहतर तो वही लोग बता सकते हैं, लेकिन मैंने इस आमंत्रण को किस रूप में देखा और अपने पन्द्रह साल से कहीं न जाने के निर्णय को क्यों बदला, बता रहा हूँ।
साहित्य में भी राजनीति की तरह सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष है। साहित्य के सत्ता पक्ष में मुख्यधारा के सभी लेखक, सभी गुट, सभी लेखक संगठन और सभी चर्चित-प्रतिष्ठित, नामी-इनामी, वरिष्ठ और युवा लेखक शामिल हैं। जो अपवाद हैं, वे साहित्य के प्रतिपक्ष की भूमिका में हैं। साहित्य की सत्ता और उसके शक्तिकेंद्रों की तीव्र आलोचना करते हैं। साहित्य में मूल्यों और आदर्श की सिर्फ़ बात ही नहीं करते, जीवन जीते हैं। मैं साहित्य में इस प्रतिपक्ष में अकेला नहीं हूँ। कुछ और भी मित्र हैं।
साहित्य आजतक ने साहित्य में लोकतंत्र की खिड़की खोली है। साहित्य के सत्ता पक्ष से जुड़े लेखकों के साथ साहित्य के प्रतिपक्ष के लेखक को भी आमंत्रित करके अपने आयोजन को लोकतांत्रिक स्वरूप दिया है। क्या देश का कोई भी मंच, उत्सव, लेखक-संगठन और प्रकाशन-गृह ऐसा करता है? यह कितनी अच्छी बात है कि साहित्य की राजधानी दिल्ली की आलोचना करने के लिए मैं दिल्ली गया। उनके शहर में पहुँचकर साहित्य का सच कहा। यह अवसर उपलब्ध कराना शुभ लक्षण है। इस तरह के आयोजनों में लोकतंत्र की खिड़की खोलने के लिए साहित्य आजतक की टीम को धन्यवाद। स्वास्थ्य अनुकूल रहे और मुझे आमंत्रित किया जाए, तो मैं दिल्ली के सभी मंचों पर अपनी बात रखूँगा। क्योंकि कहना ज़रूरी है।
मार्क्सवादी धुरंधर, जिन्हें साहित्य के प्रतिपक्ष में होना चाहिए, हिन्दी के पूँजीपतियों से लड़ना चाहिए था, वे भी साहित्य की सत्ता के साथ हैं। गोरखपुर से आवाज़ नहीं पहुँचेगी, तो दिल्ली जाकर, साहित्य का सच फटकार कर कहूँगा।
जिसे साहित्य आजतक के इस संस्करण की आलोचना मेरे जाने को लेकर करनी हो, पहले साहित्य का सच फटकारकर कहना सीख लें, फिर मुँह खोलें। स्वागत करूँगा।



